[gtranslate]
Country

अब गोरखा रेजिमेंट में उत्तराखंड के कुमाऊंनी-गढ़वाली !

गोरखा

आजादी के पहले से लेकर अब तक इंडियन आर्मी की 200 साल से भी ज्यादा पुरानी गोरखा रेजिमेंट के बहादुरी के किस्से दुनिया भर  में उन्हें एक अलग पहचान दिलाते हैं। गोरखा रेजिमेंट जिसके लिए भारतीय सेना के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ फील्ड मार्शल ने भी कहा था कि अगर कोई व्यक्ति कहता है कि उसे मौत से भय नहीं है तो वह या तो झूठ बोल रहा है या फिर गोरखा रेजिमेंट में है।

गोरखा समुदाय के लोग हिमालय की पहाड़ियों, खासकर नेपाल और उसके आसपास के इलाकों के निवासी होते हैं। लेकिन इन्हें नेपाली ही माना जाता है। इनकी बहादुरी की मिसालें दी जाती है। इतना ही नहीं भारत में कई जगहों पर तो गोरखाओं को बहादुर कह कर भी पुकारा जाता है। लेकिन अब इन गोरखा जवानों की जगह गोरखा रेजिमेंट में कुमांऊनी और गढ़वाली युवकों की भर्ती भी होने लगी है। जिसका कारण है भारतीय सेना में गोरखा जवानों की बढ़ती कमी।

दरअसल भारतीय सेना में पैदल सेना यानी कि इंफ्रेट्री बटालियन में 800 जवान और जेसीओ गोरखा ही होते हैं। पर इस वक्त भारतीय सेना में हर बटालियन में करीबन 100 गोरखा जवानों की कमी है। अगर टोटल देखा जाए तो फिलहाल इंडियन आर्मी में लगभग साढ़े चार हजार गोरखा जवानों की कमी सामने आ रही है। जवानों की कमी पिछले एक दो साल से देखने को मिल रही है।

गोरखा जवानों की कमी को पूरा करने के लिए सेना में सैनिकों की भर्ती में एक बार छूट दी गई और उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के युवाओं को गोरखा रेजिमेंट में भर्ती किया गया। कुमाऊं और गढ़वाल के युवाओं की भर्ती इसलिए क्योंकि वे गोरखाओं से काफी मिलते-जुलते हैं। संस्कृति की दृष्टि से दोनों का खान-पान और रहन-सहन भी एक ही है। भौगोलिक स्थिति में कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं है। सेना को उम्मीद है कि जल्द ही गोरखा सैनिकों की कमी दूर कर दी जाएगी। सेना के एक अधिकारी ने कहा कि गोरखा रेजीमेंट में गोरखा सैनिकों की कमी नेपाल से नहीं बल्कि भारत से है।

संडे स्पेशल : अमेरिका के अफगानिस्तान से सेना वापस लेने का फैसला सही या गलत ?

गोरखा जवानों की कमी का कारण भी बेहद दिलचस्प है। गौरतलब है कि गोरखा की भारतीय सेना में 7 रेजिमेंट हैं। 10 गोरखा रेजिमेंट आजादी के वक्त तक थी। उन्हीं का भारत और ब्रिटेन के बीच बंटवारा हुआ। 3 ब्रिटेन के हिस्से आई और 6 भारत के पास और एक डिसबैंड की गई। अब भारत के पास 6 रेजिमेंट थी और एक गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना ने आजादी के बाद बनाई।

आजादी के समय गोरखा रेजीमेंट में 90 फीसदी तक गोरखा सैनिक नेपाल से थे और करीब 10 फीसदी भारतीय गोरखा सैनिक थे। लेकिन धीरे-धीरे इस अनुपात को बदलने का प्रयास किया गया और भारतीय गोरखाओं की संख्या में वृद्धि की गई। फिलहाल भारतीय सेना में गोरखा रेजीमेंट में 60 फीसदी गोरखा नेपाल डोमिसाइल के और 40 फीसदी आईडीजी यानी इंडियन डोमिसाइल गोरखा हैं। सेना के एक अधिकारी के मुताबिक- नेपाल डोमिसाइल गोरखाओं की संख्या में कोई कमी नहीं आई है, लेकिन पिछले एक-दो साल से भारतीय डोमिसाइल गोरखाओं की संख्या में कमी आई है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय गोरखा भर्ती के लिए कम आ रहे हैं। भर्ती रैली में भारतीय गोरखाओं की संख्या कम नहीं हो रही है, बल्कि मानकों पर खरे उतरने वालों की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही है। भारतीय सेना अपने भर्ती मानकों से कभी समझौता नहीं करती है। मानकों को पूरा करने वाले भारतीय गोरखाओं की कमी के कारण, वर्तमान में भारतीय सेना को केवल 25-30% भारतीय गोरखा मिल रहे हैं। जबकि 40 प्रतिशत भारतीयों को गोरखा होना चाहिए। इसलिए कुछ हद तक इस कमी को पूरा करने के लिए भारतीय गोरखाओं के स्थान पर कुमाऊंनी और गढ़वाली युवाओं की भर्ती की जा रही है।

फिलहाल अब भारतीय सेना के गोरखा रेजिमेंटल सेंटर में करीब 600 कुमाऊंनी-गढ़वाली युवक प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इससे पहले कभी ऐसा नहीं हुआ है इसलिए ये हैरानी की बात है कि गोरखा रेजिमेंट की कमी को कुमाऊंनी-गढ़वाली जवानों से पूरा किया जा रहा है।  क्योंकि अब तक तो गोरखा रेजिमेंट में गोरखा ही होते थे , वो चाहे नेपाल के हो या भारत के। भारत में 4 गोरखा रेजिमेंटल सेंटर है जहां गोरखा जवानों को ट्रेनिंग दी जाती है। 5 वीं और 8 वीं गोरखा रेजिमेंट की ट्रेनिंग शिलांग के सेंटर में होती है। पहली और चौथी गोरखा रेजिमेंट की ट्रेनिंग हिमाचल प्रदेश के सबातू सेंटर में, तीसरी और 9 वीं गोरखा रेजिमेंट की ट्रेनिंग वाराणसी में होती है। ये सभी गोरखा रेजिमेंट आजादी से पहले की हैं। 11 वीं गोरखा रेजिमेंट आजादी के बाद बनाई गई जिसका रेजिमेंटल सेंटर लखनऊ में है। गोरखपुर गोरखा रेजीमेंट का प्रमुख भर्ती केंद्र है। लेकिन भारत, नेपाल और ब्रिटेन के अलावा ब्रुनेई और सिंगापुर में किसी न किसी रूप में गोरखा रेजिमेंट हैं।

You may also like

MERA DDDD DDD DD