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एनएमसी बिल का विरोध जारी, मरीज परेशान, डॉक्टर भी संकट में

राज्यसभा ने  मेडिकल कमीशन बिल पारित कर दिया है। केंद्र के अनुसार ये बिल भारत में चिकित्सा शिक्षा में सबसे बड़े सुधार लाने के उद्देश्य से लाया गया है। राज्यसभा में इस विधेयक के पारित होने से पहले एक लंबी बहस हुई।इसके अंतर्गत चिकित्सा शिक्षा को विनियमित करने वाली केंद्रीय मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया(एमसीआई) को रद्द करके इसकी जगह पर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग(एनएमसी) का गठन किया जाएगा।अब देश में मेडिकल शिक्षा और मेडिकल सेवाओं से सम्बंधित सभी नीतियों  को बनाने की कमान इस कमीशन के हाथ में होगी। जिसका एम्स के डॉक्टरों के साथ-साथ देशभर के कई अस्पतालों के डॉक्टरों ने जमकर विरोध कर रहे हैं।खासकर एमबीबीएस की शिक्षा प्राप्त कर रहे छात्रों ने इसके विरोध में रैलियां भी निकाली और उनका यह प्रदर्शन निरंतर जारी है। उनका कहना है कि इस बिल के तहत 6 महीने का कोर्स लाया गया है जिसके तहत प्राइमरी हेल्थ में काम करने वाले भी मरीजों का इलाज कर पाएंगे। तो हम जो इतने सालों की पढ़ाई क्यों करने के बाद मेडिकल प्रैक्टिस का लाइसेंस प्राप्त करते हैं।उसके आगे सिर्फ 6 महीने के कोर्स करने वाले को यह प्रावधान कैसे दिया जा सकता है। हड़ताल करने वाले डॉक्टर इस बिल का विरोध इसलिए भी कर रहे हैं जिसमें कहा जा रहा है कि इसके तहत ग्रेजुएशन के बाद डॉक्टरों को एक परीक्षा देनी होगी और उसके बाद ही मेडिकल प्रैक्टिस का लाइसेंस मिल सकेगा। इसी परीक्षा के आधार पर पोस्ट ग्रेजुएशन के लिए दाखिला होगा।सरकार का कहना है कि अगले 3 वर्षों में यह परीक्षा प्रणाली लागू कर दी जाएगी। हड़ताली डॉक्टरों को इस बात पर भी आपत्ति है कि एनएमसी निजी मेडिकल संस्थानों की फीस भी तय करेगा लेकिन 60 फ़ीसदी सीटों पर निजी संस्थान तो खुद ही फैसला ले सकते हैं। इन सबके बीच
एम्स में डॉक्टरों और प्रोफेसरों की समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। वहां के प्रोफेसर एवं डॉक्टरों को लगातार भेदभाव का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि हम संविदा संकाय सदस्य हैं, यहां हमारे लिए कोई समान अधिकार  मौजूद नहीं है। एम्स में फैकल्टी के लोग बहुत ही कम वेतन पर हैं, उनके लिए कोई भत्ता भी नहीं और न ही कोई उनका साथ देने वाला है। हम लगातार भेदभाव के शिकार हो रहे हैं पर हमारी परवाह कौन करता है। सरकार हमें किसी भी शोध के लिए आवेदन करने भी नहीं दे रही है।
फॉरेंसिक मेडिसिन में कार्यरत  एक सहायक प्रोफेसर का कहना है कि “एम्स में रजिस्ट्रार पद के प्रतिनियुक्त के हर दो साल में  बदला जाना चाहिए लेकिन किसी को भी नियम कायदे की कोई परवाह नहीं है, क्या नियम सिर्फ अनुबंधित कर्मचारियों और संकाय सदस्यों के लिए ही है।इसके उलट यहां पर रजिस्ट्रार हम सभी को अपनी औकात दिखाने में अड़े हुए हैं।”
डॉक्टर विजय गुर्जर,असिस्टेंट प्रोफेसर(जेरिएट्रिक मेडिसिंस)
एम्स, नई दिल्ली में भेदभाव की ऊंचाई चरम पर है।मुझे एमडी के छात्रों  के सह मार्गदर्शक बनने की अनुमति नहीं दी जा रही है। तो फिर मुझे यहां किस लिए नियुक्त किया गया है।यदि मैं किसी रिसर्च में भाग नहीं ले सकता तो मैं अपेक्स अकादमिक संस्थान में भी भाग नहीं ले सकता हूँ फिर यहां समय बर्बाद करने का कोई मतलब नहीं है।मैं इन सबका विरोध करते हुए अगले सोमवार से भूख हड़ताल पर रहूंगा, बिना भोजन के काम करूंगा।अगर इस आदेश को प्रशासन वापस नहीं लेता तो भी मैं निरंतर संघर्ष करूंगा,मुझे आप सबकी आवश्यकता है।
डॉ विजय गुर्जर ने इस बिल पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कुमार विश्वास के स्टाइल में कहा कि
कोई दीवाना कहता है
कोई पागल समझता है
कोई भगवान कहता है
 कोई डाकू समझता है
मगर डॉक्टर की बेचैनी को
 बस डॉक्टर समझता है।।
मैं तुझसे दूर कैसा हूं
 तू मुझसे दूर कैसी है
यह तेरा दिल समझता है
या मेरा दिल समझता है।।
डॉक्टरी एक एहसासों की पावन सी कहानी है
कोई एमडी का दीवाना है
कोई डीएम की दीवानी है
यहां सब लोग कहते हैं मेरी आंखों में लालच है
जो तू समझे तो नॉलेज है
जो ना समझे तो सब हवा पानी है।।
 समंदर पीर का अंदर है
लेकिन रो नहीं सकता
 यह डिग्री सालों बाद पाई है
इसको खो नहीं सकता
मेरी डिग्री का ब्रिज कोर्स तू बना लेना मगर सुन ले
जो मेरा हो नहीं पाया
वो तेरा हो नहीं सकता ।।
 मेडिकल की सारी सीट्स बिक गई तो न्याय का क्या होगा,
 जब झोलाछाप को लाइसेंस मिलेंगे तो क्या होगा,
अभी तक 6 साल की मेहनत से बनते थे यहां डॉक्टर ,
जो 6 महीने के ब्रिज कोर्स से बनेंगे डॉक्टर
तो क्या होगा।।

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