[gtranslate]
Country

दिल्ली पर नीतीश की निगाहें

भाजपा और पीएम मोदी से वर्ष 2024 में चुनावी लड़ाई लड़ने के लिए विपक्षी एकता एक बार फिर कमर कसने लगी है। एक तरफ तृणमूल नेता ममता बनर्जी विपक्षी दलों का नेतृत्व करने की जुगत भिड़ा रही हैं तो दूसरी तरफ नीतीश कुमार ने भी खुद के लिए कवायद शुरू कर दी है। नीतीश ने जब से भाजपा से नाता तोड़ महागठबंधन में वापसी की है तब से वह लगातार अन्य दलों के साथ भाजपा की मोर्चेबंदी में जुटे हैं। इस दौरान नीतीश ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कुमार स्वामी, सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं से मुलाकात की है। उनकी इन मुलाकातों को लेकर कहा जा रहा है कि नीतीश की निगाहें दिल्ली पर है। राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो भाजपा के खिलाफ कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है। कांग्रेस के बगैर कोई गठबंधन बनता भी है तो भाजपा को देशभर में चुनौती नहीं दे पाएगा। विपक्ष में कांग्रेस ही एकलौती पार्टी है, जि स्वीकार कर सकती है

लोकसभा चुनाव 2024 में अभी काफी समय है लेकिन भाजपा और पीएम मोदी से चुनावी लड़ाई लड़ने के लिए विपक्षी दल एक बार फिर कमर कसने लगे हैं। एक तरफ नीतीश ने जब से भाजपा से नाता तोड़ महागठबंधन में वापसी की है तब से वह लगातार अन्य दलों के साथ पीएम मोदी की मोर्चेबंदी में जुटे हैं। इस दौरान नीतीश ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी, कुमार स्वामी, सीताराम येचुरी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं से मुलाकात की है। उनकी इन मुलाकातों को लेकर कहा जा रहा है कि नीतीश की निगाहें दिल्ली पर है।
राजनीतिक पंडितों का कहना है कि नीतीश कुमार का दिल्ली दौरा राजनीतिक रूप से काफी अहम है। बिहार में राजनीतिक बदलाव के बाद नीतीश कुमार के सियासी दोस्त और दुश्मन दोनों ही बदल गए हैं। नीतीश कुमार के निशाने पर अब भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं तो सहयोग के तौर पर आरजेडी और कांग्रेस है। लालू यादव से लेकर सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक उनके खासम-खास बन गए हैं। हालांकि नीतीश खुद को सीधे तौर पर प्रधानमंत्री पद के दावेदारी करने से हिचकिचा रहे हैं, लेकिन इशारों-इशारों में वे बहुत कुछ कहने का प्रयास भी कर रहे हैं। उनकी मंशा तो इस ओर भी इशारा कर रही है कि उनके सिवा भाजपा से कोई और नहीं लड़ सकता है। इसलिए वह बार-बार विपक्षी एकता पर जोर देते हुए यह कहते नजर आ रहे हैं कि सभी दलों को आपसी मतभेद भुलाकर जनता की भलाई के लिए आगे आना चाहिए। इसी सिलसिले में नीतीश कुमार गत् सप्ताह तीन दिनों तक दिल्ली में विपक्षी नेताओं संग मेल- मुलाकात करते रहे।

इस दौरे से पहले ही नीतीश कुमार ने जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी बैठक में सारे संशय दूर करने की कोशिश की। नीतीश कुमार ने 4 सितम्बर को बैठक में कहा कि वह अब कभी भी भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। वर्ष 2017 में एनडीए में दोबारा से वापस जाना एक बड़ी गलती थी। माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने इस बात का जिक्र करके विपक्षी दलों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की है कि अब दोबारा से भाजपा से हाथ नहीं मिलाएंगे। यहां बताना जरूरी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भले ही सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता है, लेकिन उनकी छवि पलटी मारने वाले नेता की भी रही है। वह भाजपा और महागठबंधन के पाले में आते-जाते रहे हैं, लेकिन इस बार नीतीश कुमार ने वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से डेढ़ साल पहले पाला बदला है। ऐसे में नीतीश और उनकी पार्टी जेडीयू के बयानों को मिला दें तो नीतीश कुमार की सियासी महत्वाकांक्षा का एक बार फिर से परवान चढ़ना स्पष्ट नजर आने लगा है। नीतीश कुमार जानते हैं कि उनकी महत्वाकांक्षा बगैर कांग्रेस संभव नहीं है इसलिए उन्होंने एक बार फिर से कांग्रेस को साधने की कवायद शुरू कर दी है। जेडीयू राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि बिना कांग्रेस और वामदल के भाजपा के खिलाफ मजबूत लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। इसलिए विपक्षी पार्टियों को आपसी मतभेद मिटाकर एक साथ आना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव चाहते हैं कि भाजपा के खिलाफ जो गठबंधन बने, उसमें कांग्रेस को शामिल नहीं किया जाए, लेकिन जेडीयू इससे सहमत नहीं है। जेडीयू का मत है कि देश में कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है। केसी त्यागी ने हालांकि यह स्पष्ट कर दिया कि जेडीयू ने वर्ष 2024 के चुनावों में नीतीश कुमार को प्रोजेक्ट करने के बारे में कभी बात नहीं की है। बकौल त्यागी ‘हमने केवल नीतीश कुमार को विपक्षी एकता की दिशा में काम करने के लिए अधिकृत किया है।’

नीतीश की राह में कई अड़चनें

क्या नीतीश कुमार पूरे विपक्ष को एक साथ ला पाएंगे! यह बात इसलिए अहम है कि नीतीश कुमार ही नहीं बल्कि ममता बनर्जी से लेकर केसीआर और अरविंद केजरीवाल तक 2024 के चुनाव में विपक्ष का चेहरा बनने की कवायद में जुटे हैं और वह एक दूसरे से खुद को बेहतर बता रहे हैं। नीतीश कुमार से पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर भी विपक्ष को एकजुट करने के लिए नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव जैसे नेताओं से मिल चुके हैं। वहीं, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी भी के चंद्रशेखर राव, अरविंद केजरीवाल, अखिलेश यादव समेत कई नेताओं से मुलाकात कर चुकी हैं। नीतीश को छोड़ ऐसे अन्य सब नेताओं के बीच दो समानताएं हैं। पहला यह कि ये सभी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती देना चाहते हैं। दूसरा यह कि ये सभी कांग्रेस को लेकर असमंजस में हैं। केजरीवाल, ममता और केसीआर तो कांग्रेस नेतृत्व वाले किसी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनना चाहते हैं। केसीआर की पार्टी टीआरएस और कांग्रेस तेलंगाना में आमने-सामने की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस के साथ जाने से केसीआर को अपनी चिंता सता रही है। ऐसे ही केजरीवाल की पार्टी कई राज्यों में कांग्रेस के खिलाफ लड़ रही है और यदि वह राष्ट्रीय स्तर पर देश की सबसे पुरानी पार्टी से परोक्ष रूप से भी जुड़ती है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केसीआर अपने- अपने दिल्ली दौरे के दौरान विपक्षी दलों के नेताओं के साथ मेल- मिलाप कर विपक्षी एकता बनाने की पटकथा लिखने की कोशिश कर चुके हैं, लेकिन अभी तक सफल नहीं हो सके हैं। ऐसे में नीतीश कुमार अब पाला बदलने के साथ ही विपक्षी एकजुटता की दिशा में अपने कदम बढ़ा रहे हैं। इसी मकसद से उनके हालिया दिल्ली दौरे को देखा जा रहा है। नीतीश की राह में हालांकि आती कई अड़चनें हैं लेकिन उन्हें शुरुआती सफलता मिलने लगी है। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और उनकी पार्टी ने तो पहले ही समर्थन दे दिया है। पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा ने भी हरी झंडी दे दी है। ऐसे में नरेंद्र मोदी के सामने विपक्ष की ओर से एक मजबूत नेता की जो तलाश की जा रही है, उसकी भरपाई नीतीश कुमार के रूप में हो सकती है।

नीतीश कुमार के पास एक लंबा राजनीतिक अनुभव है। नीतीश बिहार में 15 साल से ज्यादा समय से मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन अभी तक उनके ऊपर किसी तरह का कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। नीतीश साफ-सुथरी छवि वाले नेता माने जाते हैं, इस बात को भाजपा के नेता भी मानते हैं। नीतीश की यह सियासी ताकत उन्हें 2024 के चुनाव में विपक्षी एकता का सूत्रधार ही नहीं बल्कि मोदी के खिलाफ चेहरा बनने में भी मददगार साबित हो सकती है। नीतीश कुमार राजनीतिक रूप से काफी बैलेंस बनाकर चलने वाले नेताओं में हैं, जिसके चलते सहयोगी दलों को भी किसी तरह की कोई दिक्कत होने की संभावना नहीं दिखती है। देश की सियासत भी अभी ओबीसी के इर्द-गिर्द सिमटी हुई है। ऐसे में नीतीश कुमार ट्रंप कार्ड साबित हो सकते हैं, क्योंकि वह ओबीसी के कुर्मी समुदाय से आते हैं। बिहार से बाहर यूपी, मध्य प्रदेश, राजस्थान में कुर्मी भाजपा का परंपरागत वोटर है। नीतीश कुमार विपक्ष का चेहरा बनते हैं तो भाजपा का कुर्मी वोटर ही नहीं बल्कि ओबीसी समीकरण भी बिगड़ सकता है। ऊपर से नीतीश कुमार पूरे देश में जातीय जनगणना की भी मांग कर रहे हैं। बिहार में तो इसकी शुरुआत भी कर दी है। इससे पहले भाजपा ने भी पीएम नरेंद्र मोदी को ओबीसी चेहरे के तौर पर पेश कर अपने सियासी समीकरण को मजबूत किया था।

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता संभव नहीं है। कांग्रेस के बगैर कोई गठबंधन बनता भी है तो भाजपा को देशभर में चुनौती नहीं दे पाएगा। विपक्ष में कांग्रेस ही एकलौती पार्टी है, जिसका सियासी आधार देशभर में है। विपक्ष की ओर जो भी चेहरे सामने आ रहे हैं, कांग्रेस उनमें से किसी पर भी सहमत होती नहीं दिख रही है। लेकिन भाजपा को तीसरी बार सत्ता में आने से रोकने की मजबूरी में कांग्रेस नीतीश कुमार को स्वीकार्य कर सकती है और इसके पीछे कारण भी हैं। जेडीयू में नीतीश ही सबसे बड़े चेहरे हैं और उनकी पार्टी में उनके परिवार से कोई सियासी वारिस नहीं है। जेडीयू के बढ़ने से कांग्रेस को अपना राजनीतिक नुकसान नहीं दिख रहा है। बिहार में जेडीयू के साथ मिलकर कांग्रेस सरकार में भी शामिल है। ऐसे में कहा जा रहा है कि कांग्रेस नीतीश के चेहरे पर सहमत हो सकती है।

You may also like

MERA DDDD DDD DD