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भाजपा से नाता तोड़ सकते हैं नीतीश

देश में इन दिनों एक ओर जहां आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर सियासत गरमाई हुई है वहीं दूसरी तरफ जातीय जनगणना को लेकर बिहार में सियासी कोहराम मचा है। केंद्र सरकार ने जनगणना शुरू करने का एलान किया है। कायदे से तो जनगणना पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन कोरोना की वजह से इसमें देर हुई। केंद्र सरकार ने कहा है कि जनगणना के दौरान एससी-एसटी के लोगों की भी गणना की जाएगी। बिहार में भाजपा संग सत्तारूढ़ जद(यू) इससे संतुष्ट नहीं है। जदयू जातीय आधार पर जनगणना की मांग कर रहा है। यानी जनगणना के दौरान सरकार इसका भी रिकॉर्ड रखे कि किस जाति के कितने लोग हैं। फिर जातिवार लोगों का डेटा सार्वजनिक किया जाए। केंद्र सरकार के इंकार के बाद जातीय जनगणना पर अड़े बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तल्खी बढ़ गई है। जातीय जनगणना को लेकर नीतीश कुमार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अलग हो सकते हैं। जातीय जनगणना को लेकर नीतीश के बयान से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि बिहार सरकार अपने बूते कर्नाटक की तर्ज पर जाति आधारित जनगणना करा सकती है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि पूरे देश में एक जाति की कई उपजातियां होती है। यदि हाउस होल्ड सर्वे में आप किसी की जाति पूछेंगे तो पड़ोसी यह बता सकता है कि उसके बगल में रहने वाले पड़ोसी किस जाति से ताल्लुकात रखते हैं। नीतीश कुमार ने जातिगत जनगणना पर केंद्र सरकार से पुनः विचार करने का आग्रह किया है। नीतीश ने कहा कि जातीय जनगणना होनी ही चाहिए। दरअसल, कर्नाटक में 2015 के अप्रैल-मई में 1 ़3 करोड़ घरों में सर्वे हुआ था। इस सर्वे का नाम ‘सोशल एंड एजुकेशनल सर्वे’ दिया गया था। इसमें 1 ़6 लाख सरकारी कर्मियों को लगाया गया था। जिस पर सरकार ने 169 करोड़ रुपये खर्च किए थे। इस सर्वे की रिपोर्ट हालांकि सार्वजनिक नहीं की गई है लेकिन इसे आधार बना बिहार के साथ-साथ देश के दूसरे क्षेत्रीय दल भी जातीय जनगणना कराने की पुरजोर मांग कर रहे हैं।

जाति आधारित जनगणना को लेकर बिहार में जदयू, राजद, कांग्रेस, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा व विकासशील इंसान पार्टी का स्वर एक होने की वजह से बिहार का राजनीतिक परिदृश्य बदल सकता है। देश स्तर पर जाति आधारित जनगणना के बहाने एक नया गठजोड़ बनने के संकेत मिल रहे हैं। नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार से उठी यह मांग देशव्यापी हो गई है। नीतीश कुमार ने यह साफ कर दिया कि जातीय जनगणना को लेकर हम आपस में बात करेंगे और आगे क्या करना है यह तय करेंगे। नीतीश कुमार के बयान से स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में बिहार में बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हो सकता है। जातीय जनगणना को लेकर नीतीश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने के पहले ही यह साफ कर दिया था कि जरूरत पड़ने पर वह खुद जातीय जनगणना करा सकते हैं। विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने एक कदम आगे बढ़कर जातीय जनगणना कराने को लेकर विभिन्न पार्टियों के 33 प्रमुख नेताओं को पत्र लिखकर गोलबंद करने की कवायद शुरू कर दी है।

जदयू के वरिष्ठ नेता एवं राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी कहते हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इस बैठक में जो भी निर्णय होगा हम लोग उसके साथ हैं। लेकिन यह तय है कि जातीय जनगणना होगी। सिर्फ पिछड़े, अति पिछड़े ही नहीं सभी के लिए जातीय जनगणना जरूरी है। राजनीतिक पंडित मानते हैं कि नीतीश बेशक एनडीए गठबंधन से अलग न हों, लेकिन वह आगामी 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह के तेवर दिखा रहे हैं, वह भाजपा को दबाव में रखने की रणनीति तो है ही भविष्य में भाजपा संग गठबंधन तोड़ने का रास्ता भी बनाने की कवायद हो सकते हैं। दरअसल, अभी नीतीश राज्य में एनडीए का नेतृत्व कर रहे हैं। भाजपा जानती है कि राज्य में सरकार चलाने के लिए अभी उन जैसा दिग्गज और अनुभवी नेता एनडीए के पास दूसरा नहीं है। यदि वे आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा से अलग राह पकड़ते हैं, तो जाहिर है कि इससे राज्य में भाजपा को भारी नुकसान होने का खतरा रहेगा। जनता दल यूनाइटेड के नेता उपेन्द्र कुशवाह ने हाल ही में दो टूक कहा था कि जाति आधारित जनगणना की अनुमति नहीं देना बेईमानी होगी। खासकर तब जबकि 2010 में मनमोहन सिंह सरकार के दौरान संसद ने इस प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया था और एनडीए सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान भी केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने इस बारे में भरोसा दिलाया था। वह प्रधानमंत्री से भी सवाल करते हैं कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद को पिछड़े समुदाय का बताया था तब हम बहुत गौरवांवित हुए थे। हम उम्मीद करते हैं कि वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति जनगणना की मांग पर विचार करेंगे। कुशवाहा का बयान स्पष्ट संकेत देता है कि नीतीश का दोबारा भाजपा संग मोहभंग हो चुका है।

बीजेपी का अपना एजेंडा है, लेकिन नीतीश के रहते बीजेपी अपने एजेंडे को बिहार में तो लागू नहीं करा सकती है। बीजेपी की मजबूरी बिहार में यह है कि तमाम दावों के बावजूद उसके पास नीतीश कुमार का ही चेहरा है। इसलिए नीतीश कुमार जनसंख्या नियंत्रण कानून, धर्मांतरण, जाति जनगणना या पेगासस पर बीजेपी को घेरते हैं लेकिन भाजपा उसका खुलकर विरोध नहीं कर पाती है। जनसंख्या नियंत्रण कानून पर नीतीश कुमार ने साफ-साफ बीजेपी को संदेश दिया था, यह कदम सही नहीं है। जनसंख्या कानून से नहीं रोकी जा सकती, लोगों को जागरूक करना होगा और महिलाओं को शिक्षित करना होगा, तभी इस मसले को सुलझाया जा सकता है। उन्होंने इसके लिए चीन की मिसाल भी दी थी। जदयू अब बीजेपी और केंद्र सरकार को जाति जनगणना के मुद्दे पर लगातार घेर रहा है। जाति आधारित जनगणना को लेकर न सिर्फ जनता दल जदयू बल्कि एनडीए के अन्य सहयोगी दल ‘हम’ और ‘वीआईपी’ भी उग्र तेवर दिखा रहे हैं। लेकिन इन दोनों दलों के उग्र तेवर दिखाने के इसलिए कोई खास मायने नहीं हैं कि वक्त पड़ने पर इनके विधायक कभी भी भाजपा में शामिल हो सकते हैं। भाजपा को अपने छोटे सहयोगियों से तो कोई खतरा नहीं हैं, लेकिन नीतीश की अलग राह अवश्य उसे असहज कर सकती है। यदि नीतीश 2024 का लोकसभा चुनाव अलग लड़ते हैं और तेजस्वी यादव के साथ उनका गठबंधन हो जाता है, तब भाजपा की मुश्किल काफी बढ़ जाएगी।

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