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इसरो जासूसी कांड में आया नया मोड़, 26 वर्ष बाद सीबीआई करेगी वैज्ञानिक को झूठा फंसाने की जांच

देश के उच्च न्यायलय ने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन(इसरो) के वैज्ञानिक नम्बी नारायणन पर लगे 1994 के जासूसी आरोपों और उसके बाद की गई प्रताड़ना के मामले में सीबीआई को जांच के आदेश दिए है।

इस मामले पर कोर्ट ने डी.के जैन समिति की रिपोर्ट स्वीकार की और सीबीआई को आगे इस मामले पर जांच के लिए कहा। न्यायमूर्ति ए एस खानविलकर की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह आदेश दिया है। उच्च न्यायालय ने डी.के जैन की रिपोर्ट को प्राथमिक जांच माना है।

कोर्ट के आदेश के बाद अब उन सभी पुलिस अधिकारियों को जांच के घेरे में लाया जाएगा, जिन्होंने नम्बी को जासूसी कांड में फंसाने की कोशिश की थी। कोर्ट ने सीबीआई को आदेश दिया है कि वह अपनी जांच की रिपोर्ट तीन महीने के भीतर पेश करे।

क्या था मामला?

दरअसल 1994 में इसरो के वैज्ञानिक नम्बी नारायणन पर विदेशियों को तकनीक बेचने के आरोप लगे थे। केरल पुलिस ने उन्हें आरोपो के चलते गिरफ्तार किया था। इसके बाद इस जासूसी कांड की सीबीआई ने जांच की, मामला झूठा निकला। जासूसी कांड में नम्बी नारायणन आरोप मुक्त हो गए थे।

इसके साथ कोर्ट ने केरल सरकार को मुआवजे के तौर पर 50 लाख रुपये देने को कहा। जिन उच्च पुलिस अधिकारियों का इस षड़यंत्र में हाथ था उन पुलिस अधिकारियों पर उच्च स्तरीय समिति ने रिपोर्ट दाखिल की थी। केंद्र सरकार ने इस रिपोर्ट पर विचार संबंधी एक याचिका दायर की गई थी, जिस पर 15 अप्रैल को सुनवाई हुई और कोर्ट ने जांच के आदेश दे दिए।

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अक्टूबर 1994 में केरल की राजधानी तिरुअनंतपुरम से एक मालदीव की एक महिला को गिरफ्तार किया गया था, जिसका नाम मरियम राशिदा था। मरियम पर इसरो के स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की ड्राइंग के बारे में खुफिया जानकारी पाकिस्तान को देने के आरोप लगे थे। इसी स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन ड्राइंग के डायरेक्टर थे, नम्बी नारायणन।

इसलिए इस जासूसी कांड में उन्हें भी गिरफ्तार किया गया। नम्बी के साथ इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिक डी. शशिकुमारन और डिप्टी डायरेक्टर के. चद्रशेयर को भी गिरफ्तार किया गया था। इसी मामले में रुसी स्पेस एजेंसी के भारतीय प्रतिनिधि एसके शर्मा, मरियम की फ्रेंड फैजिया इसन को भी गिरफ्तार किया था।

कौन है नम्बी नारायणन?

नम्बी नारायणन भारतीय वैज्ञानिक और एयरोस्पेस इंजिनियर है। उनका जन्म तमिलनाडू के कन्याकुमारी जिले में 12 दिसम्बर 1941 को हुआ। 1966 में इसरो के अध्यक्ष विक्रम साराभाई मुलाकात की, और एक पेलोड इंटीग्रेटर के रुप में काम किया।

उस समय स्पेस सांइस एंड टेक्नोलॉजी सेंटर के चैयरमैन साराभाई के केवल उच्च शिक्षा प्राप्त पेशेवरों को भर्ती किया था। लेकिन नम्बी के पास मास्टर डिग्री नहीं थी। इसके बाद नारायणन ने एम टेक डिग्री के लिए तिरुअनंतपुरम के इंजीनियर कॉलेज में दाखिला लिया।

एमटेक करने के बाद नारायणन को नासा फैलोशिप अर्जित की और प्रिंसटन विश्वविद्यालय में प्रवेश किया। प्रिंसटन विश्वविद्याल में उन्होंने प्रोफेसर लुइगी क्रोको के तहत रासायनित रॉकेट प्रणोदन में अपने मास्टर कार्य को पूरा किया।

अमेरिका ने उन्हें नौकरी का ऑफर दिया, लेकिन नारायणन ने यह ऑफर ठुकरा दिया। जब नारायणन भारत लौटे तो अपने साथ तरल प्रणोदन की विशेपज्ञता साथ लेकर आए। जब भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. ए.पी.जे अब्दुल कलाम ठोस मोटर्स पर काम कर रहे थे, तब तरल ईधन प्रौद्योगिकी की शुरुआत नारायणन ने की थी।

इकोनामिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू के दौरान उन्होंने बताया कि कैसे एक इंटेलिजेंस ब्यूरो अधिकारी ने कहा था कि सर हम अपनी ड्यूटी कर रहे है। आप जो कह रहे है, अगर वह सही होगा तो आप मुझे चप्पल से पीट सकते है। नम्बी के जीवन के ऊपर फिल्म भी बन गई है। जिसे आर माधवन और अनंत महादेवन डायरेक्ट कर रहे है। फिल्म का नाम है रॉकेट्री द नंबी इफेक्ट।

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