अमित शाह है ‘हीरो ऑफ द मोमेन्ट’

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्रिय गृह मंत्रा अमित शाह को कई कारणों से इतिहास याद रखेगा। इन कारणों में कुछ ऐसी घटनाएं भी शामिल हैं जिन्हें आज अमित शाह भूलना चाहते होगें। इतिहास का एक बड़ा सच यह भी है कि चाहे उसे कितने नीचे दफन कर लो, कितनी गर्त उसमें डाल दो, वह धरती का सीना फाड़, गर्त झाड़ कभी-न-कभी उभर कर आ ही जाता है। ठीक वैसा ही अमित शाह पर भी लागू होता है। जहां कहीं, जब कभी उनका जिर्क आता है, आयेगा तो ‘सोहराबुद्दीन इंकाउंटर केस’, ‘जस्टिस लोया की संदेहास्पद मृत्यु’, ‘तुलसी प्रजापति’ संग उनका सबंध, ‘2002 के गुजरात दंगे’ और भी न जाने कितने ऐसे प्रसंग फनफना कर उठ खड़े होते हैं, होते रहेगें, जिन्हें शाह भूलना चाहते हैं। लेकिन एक सत्य यह भी है कि वक्त हरेक को मौका ऐसा देता जरूर है जिसका सही इस्तेमाल उसके अतीत के दाग कम करने का कारण बन जाते है। जम्मू कश्मीर पर केंद्र सरकार का बोल्ड स्टेप शाह के प्रति एक नए दृष्टिकोण को मजबूती देने का कारण बन चुका है।

पांच अगस्त, 2019 का दिन अमित शाह के नाम रहा। इसमें कोई दो राय नहीं कि प्राधनमंत्री मोदी के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया लेकिन यह भी ऐतिहासिक सच है कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्ववाली सरकार ने राजे-रजवाड़े को भारत में विलय कराने का काम किया, श्रेय लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री सरदार बल्भभाई पटेल को ही इतिहास ने बक्शा। आने वाले समय में प्रश्न उठेंगे, जरूर उठेंगे, ठीक वैसे ही उठेंगे जैसे नेहरू पटेल की बाबत उठते रहे हैं। पूछा जाएगा नरेंद्र मोदी ने ‘दो विधान दो निशान’ वाले जम्मू कश्मीर में एक्शन 2014 में क्यों नहीं लिया। उत्तर होगा तब उनके पास अमित शाह बतौर गृहमंत्री नहीं थे। प्रश्न उठते रहे हैं कि क्यों इशको से दगाबाजी करते रहे पाकिस्तान के यहां मोदी बिन बुलाये बराती बन पहुंचे, क्यों नवाज शरीफ को गले लगाया और फिर से धेखा खाया। इन प्रश्नों के उत्तर अमित शाह की कार्यशैली से आंके जाएंगे। एक कठोर प्रशासक की जो छवि मात्र 2 महीने में शाह ने बना डाली है उससे स्पष्ट नजर आ रहा है कि शाह इतिहास के पन्नों में ‘आयरन मैन-2’ बन दर्ज होना चाहते हैं।

अनुच्छेद 370 का हटाया जाने और जम्मू कश्मीर को तीन केंद्र शासित राज्यों में बांट देना कोई मामूली कदम नहीं, एक बड़ा निर्णय है जिसके नतीजों पर तत्काल टिप्पणी नहीं की जा सकती। इतना तय है अब भारत एक यूनिफार्म सिविल कोड, एक देश एक विधान की दिशा में कदम बढ़ा चुका है। मैं अमित शाह का दूर-दूर तक प्रशसंक नहीं, मुझे बहुत गिले-शिकवे हैं उनसे लेकिन उनके इस कठोर कदम की मैं खैर मकदम करता हूं। कोई एक्शन न लेने से कही बेहतर होता एक्शन लेना। बगैर इसकी चिंता किए कि नतीजा क्या होगा।

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