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पुरानी शक्ल में ही रही नई दिल्ली

स्वतंत्र भारत में यह 17वां आम चुनाव है। इस दौरान लोकसभा क्षेत्रों के कई बार रंग-रूप बदले हैं। कई नए -नए क्षेत्र का गठन हुआ तो कई पुरानी एवं ऐतिहासिक लोकसभा सीटें खत्म कर दी गई। लोकसभा क्षेत्र की दृष्टि से चाहे कैसा भी परिवर्तन आया हो, लेकिन राजधानी में एक ऐसी सीट है, जिसे कोई फर्क नहीं पड़ा। आजादी के बाद से वह लोकसभा क्षेत्र अटल और अडिग है। दिलचस्प यह है कि इस सीट का प्रतिनिधित्व पूर्व प्रधानमंत्री एवं राजनीति में अटल रहने वाले अटल बिहारी वाजपेयी भी कर चुके हैं। इस ऐतिहासिक सीट का नाम है, ‘नई दिल्ली।’

आजादी के बाद से अब तक चार बार लोकसभा क्षेत्रों के परिसीमन हो चुके हैं। इस परिसीमन में बेशक दिल्ली के सियासी नक्शे में बड़ी तब्दीलियां आई हों, लेकिन नई दिल्ली संसदीय सीट 1951 से अब तक अटल है। 1952 के पहले चुनाव से लेकर मौजूदा संसदीय चुनाव तक इस सीट ने संसद में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। जिस कारण यह लोकसभा क्षेत्र ऐतिहासिक हो गया। यहां का प्रतिनिधित्व भी बड़े-बड़े नेताओं ने किया है। पहले चुनाव में ही नई दिल्ली के लोगों ने एक महिला (सुचेता कृपलानी) पर विश्वास जताया और उन्हें संसद में अपना प्रतिनिधि चुनकर भेजा। दरअसल, पहले लोकसभा चुनाव में दिल्ली ने तीन सीटों के साथ देश के सियासी नक्शे पर जगह बनाई थी। इसमें नई दिल्ली के अलावा आउटर दिल्ली और दिल्ली सिटी सीट शामिल थीं। चौथे आम चुनाव में सीटों की संख्या सात हो गई। इस दौरान दिल्ली सिटी सीट खत्म कर दी गई।

नई दिल्ली और आउटर दिल्ली तब भी मौजूद रही। जबकि चांदनी चौक, दिल्ली सदर को 1957 में अस्तित्व मिला। 1762 में करोल बाग का गठन हुआ। 1967 में पूर्वी दिल्ली एवं दक्षिणी दिल्ली के वजूद में आने के बाद दिल्ली में लोक सभा सीटों की संख्या सात हो गई। इसके बाद से सीटों की संख्या हालांकि स्थिर है, लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद इनके नामों और भौगोलिक क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आया। नए परिसीमन से आउटर दिल्ली, दिल्ली सदर और करोल बाग सीट इतिहास में दर्ज हो गईं। इसकी जगह पश्चिमी दिल्ली, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली एवं उत्तर-पूर्वी दिल्ली सीट को अस्तित्व मिला। वहीं, हर लोक सभा क्षेत्र का दायरा दस विधान सभा सीटों तक फैला दिया गया। सीटों के इस गुणा-भाग के बीच भी नई दिल्ली संसदीय सीट का वजूद बचा रहा।


नई दिल्ली 1951 में संसदीय सीट बनी। 1952 में इस सीट पर पहली बार लोकसभा चुनाव हुए। आजाद भारत में किसान मजदूर प्रजा पार्टी से चुनाव लड़कर सुचेता कृपलानी इस सीट से पहली सांसद बनीं। आजाद हिंदुस्तान की पहली लोकसभा 489 सांसदों की थी, जो धीरे- धीरे 543 सीटों की हो गई है। 1957 के चुनाव में सुचेता फिर नई दिल्ली से सांसद चुनी गईं, लेकिन इस बार वह कांग्रेस के टिकट पर लड़कर संसद पहुंचीं। नई दिल्ली के राजनीतिक इतिहास में सुचेता के बाद पिछले लोकसभा चुनाव 2014 में किसी महिला को जीत मिली। भाजपा की मीनाक्षी लेखी तब चुनाव जीती थीं। इस बार वे फिर से मैदान में हैं। चौथी लोकसभा (1962-67) में भारतीय जनसंघ के बलराज मधोक ने यहां का प्रतिनिधित्व किया। 1967-71 तक बीजेपी के प्रोफेसर मनोहर लाल सोंधी नई दिल्ली से सांसद रहे तो 1971 में कांग्रेस के मुकुल बनर्जी और 77 में जनता पार्टी से अटल बिहारी बाजपेयी ने संसद में नई दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया।

छठी लोकसभा यानी 1977-80 में वोटरों ने जनता दल के अटल बिहारी वाजपेयी को संसद पहुंचाया और सातवीं लोकसभा (1980-84) में जनादेश फिर अटल बिहारी वाजपेयी के पक्ष में बोला, लेकिन इस बार वह बीजेपी के टिकट पर संसद पहुंचे। इसी तरह आठवीं लोकसभा में कांग्रेस के केसी पंत 1989-91 और दसवीं लोकसभा में बीजेपी से एलके आडवाणी सांसद बने। दसवीं लोकसभा के लिए जब मध्यावधि चुनाव हुए तो जनादेश कांग्रेस के राजेश खन्ना के पक्ष में आया और वह 1992 से 1996 तक नई दिल्ली से सांसद रहे। यहां फिर से इस क्षेत्र के लोगों ने इतिहास रचा। 1992 के उपचुनाव में पहली बार इसी सीट से एक अभिनेता चुनाव जीतकर पहली बार लोकसभा पहुंचा। ग्यारहवीं लोकसभा यानी 1996-98 में नई दिल्ली की जनता ने बीजेपी के जगमोहन को संसद पहुंचाया। इसके बाद 12वीं और 13वीं लोकसभा यानी 2004 तक वही संसद में नई दिल्ली का प्रतिनिधित्व करते रहे। 1999 के आम चुनाव में जगमोहन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को हराकर संसद पहुंचे थे। 14वीं और 15वीं लोकसभा में कांग्रेस के अजय माकन को नई दिल्ली ने अपना सांसद चुना।

नई दिल्ली लोकसभा सीट पर सबसे रोचक मुकाबला 1991 में हुआ था जब बीजेपी और कांग्रेस के प्रत्याशियों के बीच करीबी मुकाबला हुआ। बीजेपी ने एलके आडवाणी को मैदान में उतारा था और कांग्रेस की ओर से मैदान में थे सुपरस्टार राजेश खन्ना। आडवाणी ने मात्र 1589 वोटों से राजेश खन्ना को मात देकर नई दिल्ली सीट अपने नाम कर ली। इसके अलावा, 1977 का आम चुनाव भी इस सीट के लिए आंकड़ों के लिहाज से खास रहा। उस वक्त जनता पार्टी की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी ने कांग्रेस प्रत्याशी शशि भूषण के खिलाफ 71.26 फीसदी वोट हासिल किए। 1992 का उपचुनाव भी यादगार रहा, जब दोनों प्रमुख दलों ने अभिनेता से नेता बने प्रत्याशी मैदान में उतारे। इस बार कांग्रेस से राजेश खन्ना और बीजेपी से शत्रुघ्न सिन्हा मैदान में थे और बाजी मारी खन्ना ने। 2014 में इस सीट से भाजपा की मीनाक्षी लेखी चुनीं गई। 2019 में भी वे भाजपा की प्रत्याशी हैं।

भाजपा बढी तो कांग्रेस घटी


भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने चुनावी इतिहास में इस बार लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। भाजपा ने अपनी अंतिम सूची में चंडीगढ़, गुरुदासपुर और होशियारपुर के उम्मीदवारों की घोषणा की। इन तीन उम्मीदवारों के नामों की घोषणा के साथ इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवारों की संख्या 437 हो गई है। हालांकि यह भी बताया जा रहा है कि भाजपा कुछ और नामों की घोषणा कर सकती है। पिछले लोकसभा चुनाव में पहली बार पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया था। तब पार्टी पूरे देश में कुल 428 सीटों पर लड़ी थी। इससे पहले 2009 में पार्टी सबसे अधिक 433 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। वर्ष 2004 के चुनाव में 364 और 1999 में 339 उम्मीदवार खड़े किए थे। इस बार गठबंधन के कारण बिहार और तमिलनाडु में बीजेपी के प्रत्याशी कम हैं, लेकिन गठबंधन न होने से आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में बीजेपी सभी सीटों पर लड़ रही है।

भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी कांग्रेस इस दफा अब तक के न्यूनतम सीटों पर चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस ने इस बार 423 सीटों पर चुनाव मैदान में है। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस 434 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। जिसमें सिर्फ 44 लोकसभा सीटों पर जीत मिली थी। 2014 में आम आदमी पार्टी ने 432 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सिर्फ 4 सीटों पर जीत मिली थी। बहुजन समाज पार्टी ने सबसे अधिक 503 लोकसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया था, लेकिन उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका था। कांग्रेस ने 2009 के आम चुनाव में 440 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उस आम चुनाव में कांग्रेस की अगुवाई में यूपीए गठबंधन को जीत मिली थी और यूपीए-दो की सरकार केंद्र में बनी थी।

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