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एलडीए और लोक निर्माण विभाग का फर्जीवाड़ा

भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन के दावों के बीच तथाकथित कुछ भ्रष्ट अधिकारी सेंध लगाने में कामयाब हैं। मामला लोक निर्माण विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण में फर्जी हस्ताक्षर वाले नियुक्ति पत्रों से जुड़ा हुआ है। इसमें विभाग के आला अधिकारियों का नाम सामने आ रहा है लेकिन अधिकारियों ने उक्त दस्तखत से साफ इंकार कर दिया है और कहा है कि दस्तखत स्कैन करके लगाए हैं। जांच में एक व्यक्ति का नाम भी सामने आया है। एफआईआर दर्ज करने के बाद उसकी तलाश जारी है लेकिन एक पखवारा बीत जाने के बाद भी जालसाज का गिरफ्त में न आना कहीं न कहीं विभागीय अफसरों की मिलीभगत का परिणाम कहा जा सकता है।
‘लखनऊ विकास प्राधिकरण और लोक निर्माण विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन इन विभागों को ‘सरकार का कमाऊ पूत’ भी कहा जाता है। चाहें सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे करवाकर अवैध वसूली किए जाने के मामले हों या फिर विभाग द्वारा बनाए गए भवनों के आवंटन में अवैध वसूली। नक्शा पास करवाने से लेकर रजिस्ट्री करवाने तक में पैसों की अवैध वसूली इन विभागों की पहचान बन चुकी है। इतना ही नहीं, अधिकारियों और कर्मचारियों की मिलीभगत के चलते विभाग के अन्दरूनी मामलों में भी भ्रष्टाचार खूब फल-फूल रहा है। ऐसा भी नहीं है कि अभी तक किसी के खिलाफ कार्रवाई न की गयी हो। कार्रवाईयां भी हुई हैं और अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक दण्डित भी खूब हुए हैं लेकिन अवैध कमाई की लालसा यहां के अधिकारियों-कर्मचारियों में इस कदर रच-बस गयी है कि दण्डित किए गए अधिकारियों से भी वे सबक लेना नहीं चाहते।
हाल ही में भ्रष्टाचार से सम्बन्धित एक ऐसा ही मामला प्रकाश में आया। इस मामले में सरकार सख्त रवैया अख्तियार किए जाने की बात कर रही है लेकिन जिनके हाथों में सख्त कार्रवाई करने की जिम्मेदारी है वे इस मामले में ढील दे रहे हैं। इस ढील के बारे में हो रही चर्चा को आधार मानें तो अधिकारी स्तर पर ढील इसलिए दी जा रही है क्योंकि धोखाधड़ी करने वालों के तार विभाग के कुछ बडे़ अधिकारियों से जुडे़ हैं। स्पष्ट है यदि धोखेबाजों को गिरफ्त में लेकर कड़ाई से पूछताछ की गयी तो निश्चित तौर पर कई बड़े अधिकारियों के नाम भी सामने आयेंगे।
वर्तमान योगी सरकार के कार्यकाल में अधिकारियों के खिलाफ होने वाली कार्रवाइयों को देखकर यह कहा जा सकता है कि यदि अधिकारियों के खिलाफ पुख्ता प्रमाण मिले तो निश्चित तौर पर दोषी अधिकारियों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है, यही वजह है कि इस मामले को येन-केन-प्रकारेण दफन करने की जुगत लगायी जा रही है।
धोखाधड़ी से सम्बन्धित यह मामला उपरोक्त दोनों विभागों (लोक निर्माण विभाग और लखनऊ विकास प्राधिकरण) में फर्जी नियुक्ति पत्र जारी करने से सम्बन्धित है। जिन 32 युवकों को नौकरी के बाबत फर्जी नियुक्ति पत्र दिए गए थे उन पर विभाग के लोक निर्माण विभाग प्रमुख सचिव और एलडीए के वीसी के हस्ताक्षर थे। मामला प्रकाश में आया तो दोनों ही अधिकारियों ने इस नियुक्ति पत्र पर अंकित दस्तखत को अपना बताने से इनकार किया है। अधिकारियों का कहना है कि यह हस्ताक्षर उन्होंने नहीं किए बल्कि धोखाधड़ी से स्कैन करके नियुक्ति पत्र में दर्शाए गए हैं। अब इस मामले की तह तक जाने के लिए सच्चाई का पता लगाया जा रहा है।
विभागीय कर्मचारियों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक फर्जी नियुक्ति पत्रों से जुड़ा यह खेल पिछले कई महीनों से चल रहा था। जानकारी निचले क्रम के अधिकारियों से लेकर आला अधिकारियों को भी थी। चूंकि इस बात के प्रमाण नहीं थे लिहाजा उन अधिकारियों ने चुप्पी साध रखी थी जिनके कथित फर्जी हस्ताक्षर से नियुक्ति पत्र जारी किए गए थे।
मामला तब खुला जब फर्जी दस्तखत वाले नियुक्ति पत्र लेकर युवक एलडीए और लोक निर्माण विभाग में नौकरी ज्वाइन करने पहुंचे। इन युवकों में से 14 युवकों के नियुक्ति पत्र पर प्रमुख सचिव (लोक निर्माण विभाग) नितिन रमेश गोकर्ण के हस्ताक्षर थे और 18 युवकों के नियुक्ति पत्र पर एलडीए वीसी प्रभु एन सिंह के हस्ताक्षर। उपरोक्त अधिकारियों का इस सम्बन्ध में कहना है कि हस्ताक्षर उन्होंने नहीं बल्कि उनके हस्ताक्षर स्कैन करके लगाए गए हैं। अधिकारियों के आदेश पर गोमती नगर थाने में अज्ञात जालसाजों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवा दी गयी है। नौकरी ज्वाइन करने पहुंचे युवकों में से एक ने बताया कि किसी कान्हा नाम के व्यक्ति ने उसे नियुक्ति पत्र दिया है। हालांकि कान्हा नाम के शख्स को पकड़ने के लिए जाल भी बिछाया गया लेकिन वह हत्थे नहीं चढ़ा।
कहा जा रहा है कि फर्जी नियुक्ति पत्र जारी करने के इस खेल में विभाग के ही कुछ कर्मचारियों और अधिकारियों का हाथ है और उन्हीं में से कुछ ने जालसाज कान्हा को इस बात की जानकारी पहले से ही दे दी थी कि उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाया गया है।
फिलहाल फर्जीवाड़े से जुडे़ इस मामले की तह तक जाने के लिए उच्च स्तर पर कार्रवाई किए जाने की बात कही जा रही है लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत होने के कारण सफलता दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

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