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प्रकृति का प्रतिशोध

वर्ष 2013 में उत्तराखण्ड की केदारनाथ आपदा। जम्मू-कश्मीर में भयानंक बाढ़। तमिलनाडु में सुनामी। असम में लगभग हरेक साल बाढ़ में करोड़ों का नुकसान। ये सभी जलप्रलय हैं। जो देश के क्षेत्र विशेष में त्रासदी के शक्ल में आए और हजारों लोगों को लील गई। करोड़ों-अरबों की संपत्ति बह गई। ऐसे ही जल प्रलय ने इस साल दक्षिण के तटीय राज्य केरल में तबाही बरपाई है। हजारों लोग बेघर हो गए। सैकड़ों लोगों की जान चली गई। अनुमानतः हजारों करोड़ की संपत्ति का नुकसान हुआ है। बेघर लोगों ने शिविरों में शरण लेकर किसी तरह अपनी जान बचाई है। सरकारी तंत्र के अलावा स्थानीय एवं विभिन्न संगठन वहां राहत एवं बचाव कार्य में लगे हुए हैं। मगर इन सब के बीच सवाल यही है कि पिछले कुछ वर्षों से ऐसा जल प्रलय क्यों आ रहा है?

केरल में शुरुआती जून में ही मानसून दस्तक दे देता है। इस बार वहां मानसून समय से करीब एक हफ्ता पहले ही पहुंच गया था। जो धीरे-धीरे देश के अन्य हिस्सों की ओर बढ़ता गया। फिर आखिर अगस्त माह में वहां इतनी भयानक बारिश कैसे हुई। मौसम वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि अगस्त में केरल में इतनी बारिश नहीं होती, जितनी इस वर्ष हुई। मौसम वैज्ञानिकों के पास इसका एक ही जवाब है जलवायु परिवर्तन।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज बदलता जा रहा है। देश के उन हिस्सों में जहां कभी ज्यादा बारिश हुआ करती थी, वहां अब बारिश घट रही है। जहां कभी कम बारिश या सूखा पड़ता था, उन स्थानों में बारिश बढ़ रही है। मौसम विभाग के अनुसार अगस्त में केरल में बारिश कम होती है, पर इस बार वहां तीन गुना बारिश हुई। वहीं पूर्वोत्तर में बारिश घटी है। मेघालय, चेरापूंजी में इस बार 40 फीसदी तक बारिश कम हुई है। जबकि चेरापूंजी को सबसे ज्यादा बारिश वाले स्थान के रूप में बचपन से पढ़ते आ रहे हैं। राजस्थान, बुंदेलखंड, कच्छ सौराष्ट्र जैसे इलाकों से हरेक साल सूखे की खबर आती थी। अब वहां 18 फीसदी अधिक बारिश हो रही है।

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉक्टर केजे रमेश से जब पिछले दिनों पत्रकारों ने सवाल किए तो उनका कहना था कि जलवायु परिवर्तनों की वजह से उपरोक्त बदलाव पिछले कुछ सालों में देखे जा रहे हैं। बारिश का पैटर्न बदलता जा रहा है। इस बदलाव पर मौसम विभाग नजर बनाए हुए है। मानसून के आगमन और प्रस्थान का समय भी बदलता जा रहा है। जहां कहीं बारिश हो रही है तो बहुत तेज या कहें रिकार्ड बारिश कुछ समय में ही हो रही है। जिससे आपदा जैसी स्थिति उत्पन्न होती है। विभाग द्वारा अपने अनुभव और तकनीक का इस्तेमाल कर समय-समय पर इसकी जानकारी दी जाती है। मानसून के समय तो अब विभाग रोजाना मौसम रिपोर्ट जारी करता है। जहां कहीं तेज बारिश की संभावना होती है, वहां की राज्य सरकार को संबंधित रिपोर्ट भेजी जाती है ताकि सरकार समय रहते तैयारी कर सके।

ऐसी आपदाएं अब रूटीन का हिस्सा बनती जा रही हैं। बादल फटने या तेज बारिश से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे हिमालयी प्रदेशों में लगभग हर साल आपदा आती है। 2013 की केदारनाथ आपदा को कोई भुला नहीं सकता। उसका जख्म आज 5 साल बाद भी स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश भर के लोगों के मन में ताजा है। श्रीनगर और मुंबई में भी बाढ़ ने अब स्थायी डेरा डाल लिया है। वहां भी लगभग हरेक साल आने वाली बाढ़ से जानमाल की क्षति होती है। जलवायु परिवर्तन का नतीजा सिर्फ बाढ़ के रूप में त्रासदी नहीं लाता, बल्कि वह अन्य रूप में भी लोगों की परेशानी का कारण बनता है। राजस्थान से उठी धूल भरी आंधी के कारण दिल्ली के जबर्दस्त वायु प्रदूषण को कोई भूल सकता है। यह वायु प्रदूषण भी दिल्ली और एनसीआर के क्षेत्रों में स्थाई घर बना लिया है। बाढ़ या धूल भरी आंधी आदि जैसी स्थिति सिर्फ भारत की नहीं है। यूरोप, जापान, यहां तक कि उत्तरी ध्रुव के देशों में भी इस साल भयंकर गरमी पड़ी। इनमें से कुछ जगहों पर तो तापमान 109 डिग्री फॉरेनहाइट तक पहुंच गया था। अमेरिका के कई इलाकों में भी इस साल भयानक बाढ़ आई। इन घटनाओं और आपदाओं से मानव जाति को कुछ सीखने और इससे बचने के अपाय करना जरूरी हो गया है। नहीं तो ग्लोबल वार्मिंग इस सृष्टि को ही नष्ट कर देगा।

पर्यावरणविद् आज से नहीं लंबे समय से ग्लोबल वार्मिंग के बारे में सभी को आगाह करते आ रहे हैं, पर अभी तक किसी ने उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया। विश्व स्तर पर इसकी चर्चाएं होती जरूर हैं। विकसित राष्ट्र विकासशील देशों पर इससे निपटने के लिए दबाव बनाते हैं लेकिन खुद इसके लिए कुछ नहीं कर रहे। इस कारण समुद्र का जलस्तर धीरे-धीरे बढ़ रहा। कई रिपोर्ट में कहा गया है कि कई तटीय इलाके अगले दो दशक में डूब जाएंगे। ऐसी रिपोर्ट के बावजूद इससे निपटने के लिए कोई ठोस योजना नहीं है। हरेक प्राकृतिक आपदा के बाद राजनेता बेबस हो अपने हाथ खड़े कर देते हैं। अक्सर आम आदमी ही अपने इलाके की त्रासदी से जूझने का साहस दिखाता है। राजनीतिक वर्ग तो समितियों द्वारा प्रस्तावित योजनाओं को लागू करने के बारे में भी नहीं सोचता।

वैज्ञानिक माधव गाडगिल ने वर्षों पहले अपनी एक रिपोर्ट में ऐसी स्थितियों के बारे में आगाह कर दिया था। लेकिन उस रिपोर्ट से संबंधित छह राज्य सरकारों में से किसी ने उसकी सिफारिशों पर गौर नहीं किया। खनन माफिया, रेत माफिया, स्टोन माफिया पूरे देश में अपनी कारस्तानी जारी रखे हुए हैं। साफ है, राजनेताओं और सरकारी अधिकारियों से मिलीभगत के बगैर यह मुमकिन नहीं।

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग ने तो 1980 के दशक में ही अपनी धार खो दी थी। जब इसके लिए जरूरी धनराशि के सवाल पर देशों में तकरार हो गई थी। इसके लिए अमेरिका और अन्य विकसित देश ज्यादा दोषी हैं। दूसरी तरफ, भारत और अन्य विकासशील देशों ने भी इस दिशा में कुछ खास नहीं किया है। अजीब बात है कि अब भी ग्लोबल वार्मिंग को लेकर कोई तात्कालिकता या सोच नहीं दिखती। खतरे साफ और सामने हैं, लेकिन राजनीतिक वर्ग अब भी बेखबर है। दुनिया का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व तो यह मानता ही नहीं कि ग्लोबल वार्मिंग जैसा कोई संकट भी है।

दुनिया भर के सत्ताधारी वर्ग द्वारा ग्लोबल वार्मिंग के बारे में बरती जा रही उदासीनता को देख पर्यावरण वैज्ञानिक हैरान- परेशान हैं। पर्यावरणविद्ों ने सरकारों की इसके प्रति बेरुखी को अपराध तक कहना शुरू कर दिया है। साफ हवा और स्वच्छ जल जीवन की बुनियादी जरूरतें हैं। लेकिन कड़वी हकीकत को लोग तभी समझते हैं, जब किसी आपदा से उनका सामना पड़ता है। उत्तराखण्ड में केदारनाथ आपदा के बाद नदी से 500 मीटर तक किसी भी प्रकार के निर्माण पर रोक लगा दिया गया। पर सिर्फ
आदेशों में। जमीन पर इसे अभी भी नीति-नियंताओं ने उतारना शुरू नहीं किया है। इससे साफ है कि आने वाले दिनों में ऐसी कुदरती आपदाओं की संख्या बढ़ेगी। पिछली एक सदी में आबादी कई गुना बढ़ी है। ऐसे में जान-माल का नुकसान भी बढ़ता जाएगा। केरल की त्रासदी, केदारनाथ आपदा, जम्मू-कश्मीर की बाढ़, मुंबई का प्रत्येक साल डूबना भी सरकारों और आम जनों को नींद से जगा नहीं पा रहा है। कोई नहीं जानता इन्हें कुंभकरणी नींद से जगाने के लिए प्रकृति अभी और कितना रौद्र रूप दिखाएगी।

‘जलवायु परिवर्तन से बदलाव’

मौसम विभाग के महानिदेशक डॉक्टर केजे रमेश से बातचीत के मुख्य अंश

केरल में बाढ़ से हुई इतनी बड़ी तबाही के क्या कारण मानते हैं?
केरल में दो समस्याएं एक साथ हुई। एकाएक ज्यादा बारिश और 35 लबालब भरे जलाशयों से पानी छोड़ा जाना। केरल का क्षेत्रफल संकरा है। इस कारण वहां ऊफान पर आई नदियों का पानी कई फीट ऊंचा चढ़ गया। इस पर भारी बारिश ने ऐसी भयावह तस्वीर सामने ला दी। केरल में अब तक 236 सेमी बारिश हुई है। तटीय कर्नाटक में 276 और कोंकण, गोवा क्षेत्र में 253 सेमी बारिश हो चुकी है। लेकिन वहां बाढ़ नहीं आई। इन क्षेत्रों में बांध से पानी नहीं छोड़ा गया। वहीं ये क्षेत्र फैले हुए हैं जहां पानी का फैलाव दूर तक होता है। इन क्षेत्रों में केरल की तरह एक हफ्ते में ही 75 .8 सेमी बारिश नहीं हुई है।

बताया जाता है कि केरल में अगस्त माह में इतनी बारिश नहीं होती है। इस बार ऐसा क्यों हुआ?
इस बार नहीं। पिछले कुछ सालों से बदलाव आया है। यह बदलाव जलवायु परिवर्तनों की वजह से हो रहा है। बारिश के पैटर्न में कई बदलाव आए हैं। भारी बारिश और कम बारिश वाले स्थान बदल रहे हैं। वहीं बारिश के समय में भी फर्क आ चुका है। इस बदलाव पर विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है। उन्हें चिÐत करने के लिए हमें कम से कम दस साल के आंकड़े देखने होंगे। 2011-20 तक में मौसम में हुए बदलाव का अध्ययन किया जाएगा।

‘पर्यावरण के साथ खिलवाड’

पर्यावरणविद् सच्चिदानंद भारती से बातचीत के मुख्य अंश

बाढ़ और आपदा अब हर साल आने लगी है। ऐसा क्यों हो रहा है?
इसका एक मात्र कारण है, ग्लोबल वार्मिंग। हमलोग पर्यावरण के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। पेड़ों को काट कर विकास कर रहे हैं। यह विकास तात्कालिक रूप से जरूर अच्छा दिख रहा हो पर यह विकास नहीं विनाश है। यह विनाश धीरे-धीरे अलग-अलग रूप में आ रहा है। जिसे हम समझ नहीं पा रहे हैं। जून-जुलाई में होने वाली बारिश अगस्त में हो रही है। वह भी एक स्थान पर बहुत तेज। इससे आपदा आएगी ही। पहले ऐसा दशकों बाद हुआ करता था।

क्या ऐसा सिर्फ पेड़ काटने से ही हो रहा है?
पेड़ कटना मुख्य कारण है। इसके अलावा भी कई कारण हैं। पेड़ कटने से वायु में कार्बन डायऑक्साइड की मात्रा बढ़ रही है। ऑक्सीजन कम हो रही है। इससे वातावरण गर्म हो रहा है। एक तरफ पेड़ कट रहे हैं तो दूसरी तरफ गाड़ियों की संख्या देश-दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। उद्योगों में भी इजाफा हो रहा है। घर, ऑफिस, गाड़ी सब कुछ वातानुकूलित हो रहा है। इन सबसे निकलने वाली गैस को कौन ग्रहण करेगा। इसलिए प्रकृति अपने को बदल रही है। यह बदलाव इन्हीं सब कारणों से हो रहा है। दुनिया भर की सरकारों, वैश्विक संगठनों के साथ आमजनों को भी इस पर गंभीरता पर सोचना होगा।

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