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लोकसभा चुनाव तैयारियों के बीच मीडिया अपनी कवरेज को चटख रंग देने के लिए पूर्व बसपाई और अब मौजूदा कांग्रेसी नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी की खोज-खबर ले रहा है लेकिन सिद्दीकी साहब हैं कि नजर ही नही आ रहे। मानों गधे के सिर से सींग। चर्चा को आधार मानें तो सिद्दीकी साहब स्वयं मीडिया से बचने की कोशिश में हैं क्योंकि वे ये बात अच्छी तरह से जानते हैं कि यदि वे मीडिया के हत्थे चढ़ गए तो निश्चित तौर पर गड़े मुर्दे उखाडे़ जायेंगे। शायद यही वजह है कि सिद्दीकी साहब मीडिया की नजरों से बच रहे हैं। कुछ तो यहां तक कह रहे हैं कि वे अक्सर यूपीसीसी आते रहते हैं लेकिन मीडिया की नजरों से बचते-बचाते। खैर बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी? आज नहीं तो कल सिद्दीकी साहब मीडिया से टकरायेंगे जरूर, तब पूछा जायेगा कि मुस्लिम वोट बैंक के कांग्रेस की तरफ जाने की उम्मीदें कितनी हैं।
नसीमुद्दीन को ढूंढकर उनसे सवाल-जवाब करने में यह संवाददाता भी काफी उत्सुक रहा। कई बार पार्टी कार्यालय गया लेकिन सिद्दीकी साहब कहीं नजर नहीं आए। मीडिया प्रभारियों से जानकारी ली गयी तो लगभग सभी ने मुस्कुराते हुए पूछा, ‘सिद्दीकी साहब को क्यों ढूंढ रहे हैं भाई, जो पूछना हो हम ही से पूछ लीजिए।’
सिद्दीकी साहब जब कभी टकरायंेगे, हम उनसे सिर्फ एक ही सवाल पूछेंगे कि ऐन चुनाव के वक्त मुस्लिम वोट बैंक को कांग्रेस से जोड़ने के लिए कौन सी रणनीति अपना रहे हैं। हमारी ख्वाहिश कब पूरी होगी? यह तो नहीं कह सकता लेकिन इतना जरूर है कि जब भी सिद्दीकी जी मिलंेगे उन्हें उनकी हेकड़ी जरूरी याद दिलाऊंगा।
ज्ञात हो करोड़ों रुपया लेकर टिकट बेचने के आरोप में बसपा से निष्कासित हुए नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने जब (22 फरवरी 2018) अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस का हाथ थामा था तो उन्होंने यही कहा था कि कांग्रेस उनका पुश्तैनी घर है लिहाजा कांग्रेस में आना उनके लिए घर वापसी के तौर पर लिया जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि उनके दादा और पिता हमेशा कांग्रेस में ही रहे हैं। देखा जाए तो उनका पूरा परिवार कांग्रेसी था। यहां तक कि उनके ससुर फरजंद अली तो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के साथ जेल भी गए थे।
कांग्रेस में शामिल होने के दौरान मीडिया से मुखातिब होते हुए सिद्दीकी साहब ने यह भी कहा था कि वे तीन दशक पहले बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम के संपर्क में आये थे उसी के बाद से वे बसपा की सेवा करते रहे। पूरी वफादारी के साथ तीन दशक तक कांशीराम के मिशन को आगे बढ़ाया, लेकिन बाद में हालात कुछ ऐसे हो गए कि पार्टी छोड़नी पड़ी। इस दौरान सिद्दीकी साहब ने कांग्रेस को यह भी भरोसा दिलाया था कि यूपी में मुसलमानों का वोट अब बसपा के बजाए कांग्रेस के खाते में जायेगा लेकिन लोकसभा चुनाव की तैयारियां लगभग अंतिम चरण में हैं लेकिन सिद्दीकी साहब कहीं पर नजर नहीं आ रहे। अब यूपी के कांग्रेसियों को भी इसी बात की चिंता सता रही है कि आखिर कब आयेंगे सिद्दीकी साहब और कब मुस्लिम वोटों को लेकर रणनीति बनेगी।

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