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राहुल के प्रधानमंत्री बनने तक मेरा संघर्ष

कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य, राष्ट्रीय महासचिव और असम के प्रभारी बनाए गए हरीश रावत ने अपनी इस जबर्दस्त पॉलिटिकल हैट्रिक से ठीक पहले 12 जुलाई को ‘दि संडे पोस्ट’ के टॉक-ऑन टेबल कार्यक्रम में शिरकत की। उनके संग बातचीत में शामिल हुए देश के नामचीन पत्रकार और दैनिक अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री, प्रख्यात शिया धर्मगुरु और विचारक सैयद कल्बे रुशैद रिजवी, वरिष्ठ पत्रकार और उत्तराखण्ड जर्नलिस्ट फोरम के अध्यक्ष सुनील नेगी, ‘दि संडे पोस्ट’ की तरफ से अपूर्व जोशी, प्रेम भारद्वाज और गुंजन कुमार। मंझे हुए राजनेता हरीश रावत ने कई सवालों के जवाब बेबाकी से दिए तो कुछ से बड़ी होशियारी से कन्नी काट ली

अपूर्व जोशी : आप 70 के दशक में राजनीति में आ गए थे। 1980 में आप मुरली मनोहर जोशी को हराकर संसद पहुंचे। उस समय की राजनीति और वर्तमान राजनीति में क्या अंतर पाते हैं?
बहुत गंभीर प्रश्न है। उस दौर में जब तक आप एक रचनात्मक कार्यकर्ता नहीं होते और ग्रास रूट पर समग्र काम नहीं करते तो राजनीति में आगे नहीं बढ़ पाते। आप तब लंबे समय तक टिक नहीं पाते। कांग्रेस के राजनीतिक धरातल पर देखें तो नेता किसी न किसी रचनात्मक कार्य के साथ आगे बढ़ रहे थे। अस्सी के दशक में जब मैं सांसद बना, तब के नेता किसी न किसी इश्यू के साथ जुड़े हुए थे। आज आपके पास कोई भी हुनर या कोई चमत्कार होना चाहिए। आप राजनीति में अपने लिए जगह बना सकते हैं। यहां तक कि आप मीडिया क्रिएशन या मीडिया का थोड़ा सपोर्ट मिलने भर से राजनीति में अच्छे मुकाम पर आ सकते हैं। उस समय यह नहीं था। उस वक्त किसी एक आंदोलन से राजनीति के शीर्ष पर पहुंचना संभव नहीं था। आपको शीर्ष तक पहुंचने के लिए लंबी यात्रा करनी पड़ती थी। चढ़ाई चढ़नी होती थी। आज यदि आप किसी वाहन के स्टीयरिंग में लगे लीवर की तरह अपने जीवन की दिशा टर्न करना जानते हैं, उस लीवर का इस्तेमाल करना जानते हैं तो फिर राजनीति में सफल हो जाएंगे। अर्थात् आज रचनात्मकता का अभाव राजनीतिक दलों में भी है और राजनीतिक कार्यकर्ताओं में भी। इसलिए आज हमारे देश की राजनीति थोड़ी सी भटकी हुई नजर आती है।

अपूर्व जोशी : आपने इंदिरा गांधी, संजय, राजीव से लेकर पीवी नरसिम्हा राव और सोनिया के साथ भी काम किया है। आप इन शख्सियतों को कैसे परिभाषित करेंगे?
इंदिरा जी तक राजनीति का एक डिफरेंट एरा था। इंदिरा जी की मृत्यु के बाद भारतीय राजनीति में भारी परिवर्तन आया। वह परिवर्तन नेताओं और जनता के बीच औपचारिक सुरक्षा की बड़ी दीवार के रूप में खड़ा हो गया। 1980 में जब हम सांसद बने उस वक्त वे नेता अच्छे होते थे, जिन्हें पब्लिक में दो-चार धक्के लग रहे हां। सुरक्षा का कोई ताम-झाम नहीं होता था। इंदिरा जी स्वयं प्रतिदिन दो बार जनता से मिलती थीं। एक बार सुबह जब इंदिरा जी टहलती रहती थीं तो सभी से एक-एक मिनट बात कर सारी जानकारी ले लेती थीं। उनकी मेमोरी भी बहुत शानदार थी। फारुख अब्दुल्ला से समझौता होने के बाद एक बार मैं कोकरानाग गया था। वहां आस-पास के क्षेत्रों में सर्वे किया। लोगों को मेरे बारे में पता चला तो एक औरत आई और बोली बेटा तुम इंदिरा गांधी के यहां से आए हो। मैंने कहा हां। उन्होंने मुझे एक पोटली दी और उसने (हामिदा बेगम) कहा यह इंदिरा गांधी को दे देना। उनकी भावना इतनी तीव्र थी कि मैं संकोच में होने के बावजूद उस पोटली को लेकर दिल्ली आ गया। यहां भी मैं संकोच में था कि उस पोटली को इंदिरा जी को दूं या नहीं। उन दिनों इंदिरा जी सफदरजंग रोड में रहती थी। मैं किसी तरह पोटली को लेकर गया। मुझे इंदिरा जी ने देखा तो पूछा कैसे आए हो, हरीश। जब मैंने  उन्हें पोटली देते हुए कहा कि कोकरानाग में एक महिला ने मुझे आपको देने के लिए कुछ दिया। तो इंदिरा जी ने उसका नाम पूछा। मैंने बोला

हामिदा बेगम। तुरंत उन्होंने वह पोटली खोलकर उससे थोड़ा खाया और पोटली धवन को देते हुए बोलीं, यह मेरे बेडरूम में रख देना। फिर उन्होंने उस औरत के बारे में पूछा। इंदिरा जी ऐसी थी। यानी उस वक्त नेताओं और जनता के बीच इस तरह का संबंध था। उस वक्त के नेता इस प्रकार जनता से जुड़े हुए थे। आज वह जुड़ाव नहीं है।

प्रेम भारद्वाज : यदि इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी की तुलना करें तो दोनों में क्या अंतर है?
एक नारा लगा था, ‘सोनिया गांधी कैसी हैं, इंदिरा गांधी जैसी हैं।’ सोनिया जी बहुत हद तक उनके जैसी हैं। लोग सोनिया जी की इंदिरा जी से तुलना करते थे। आज भी करते हैं। जिस तरह उन्होंने भारतीय संस्कøति को एडॉप्ट किया, वह आश्चर्यजनक है। दोनों में अंतर सिर्फ इतना है कि इंदिरा जी एक अलग तरह के संघर्ष से निकली थीं। उस समय देश का माहौल भी दूसरे तरीके का था। सोनिया जी को एक अलग तरह की चुनौतियों में काम करना पड़ा। उस समय तक देश का माहौल भी बहुत बदल चुका था। उस वक्त सिक्योरिटी का ही बहुत अंतर आ गया था। सिक्योरिटी की दीवार ने सबसे पहले नेताओं और जनता को डिस्कनेक्ट कर दिया है।

प्रेम भारद्वाज : आप राहुल गांधी की इमेज की बात कर रहे हैं। मगर उनके अलावा प्रियंका गांधी भी थीं, जिन्हें पार्टी के अंदर और जनता भी चाह रही थी कि वे आगे आएं। मगर वे साइड कर दी गईं, क्यों?
एक बात बताएं। एक परिवार, जिसने इतनी दुर्घटनाएं झेली हैं। आज भी इंडिया के दुश्मन जो इंडिया का बुरा चाहते हैं उनकी गोली का पहला निशाना गांधी परिवार है। क्या आप समझते हैं कि राहुल गांधी सुरक्षित हैं। ऐसी परिस्थिति में एक मां को तय करना बहुत मुश्किल होता है। पूरे परिवार को थोड़े न झोंक देंगे। उन्होंने कोई प्लान किया होगा। उस प्लानिंग के तहत एक व्यक्ति को सामने किया गया।
विनोद अग्निहोत्री : आपने इंदिरा-सोनिया के जनता से कनेक्ट के बारे में बताया। यह कनेक्ट राहुल गांधी में कितना है?
राहुल जी में भी है। यदि आप मेरी बात को अपने नेता की तारीफ न समझें और यहां बैठे सभी लोग अपने को राहुल के आलोचक के रूप में रखकर मुझे यह बताएं कि हिंदुस्तान के किस नेता ने राहुल जी जितना डिफरेंट तरह के लोगों से इंट्रैक्ट किया है। वे कहां नहीं गए, किसके बीच में नहीं गए, किनसे बात नहीं की। सोनिया जी से भी जब सत्ता लेने की बात कही गई तो उन्होंने एक विधवा के रूप में हमारे राजनेता की यादों तक अपने को सीमित रखा। राहुल जी को भी हमलोग चाहते थे कि वे सत्ता में भागीदार बनें। कोई रोक नहीं थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद उन्हें मंत्री पद देना चाहते थे। एक भाव यह भी था कि बाद में क्यों, वे प्रधानमंत्री का पद इसी समय स्वीकार करें। लेकिन नहीं। राहुल गांधी जी ने सत्ता में कोई रुचि नहीं दिखाई, बल्कि भारत को समझने में रुचि दिखाई। भारत के लोगों को समझने में अपना समय लगाया।

प्रेम भारद्वाज : राहुल गांधी में नेतृत्व क्षमता और आईक्यू की कमी दिखती है। उनकी इमेज भी ऐसी ही बन गई है, क्यों?
गुंजन कुमार : राहुल गांधी भारत को समझने के लिए कितना समय लेंगे। वे 15-20 साल से सांसद भी हैं।

भारत को समझना भी अपने आप में भारत का भ्रमण करना है। यदि कोई यह समझता है कि बिना भारत को समझे, सिर्फ जनमत लेकर भारत को चला सकता है तो वह बहुत नासमझी भरा कदम होगा। मोदी जी ने भी संघ के प्रचारक के रूप में भारत को समझा होगा। मगर हमने नहीं देखा। लेकिन राहुल जी ने पांच-सात साल से भारत को सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कøतिक दृष्टि से समझा है। ये अपने आप में उनका गुण है। आज भी वे लोगों से मिलकर भारत को समझने का प्रयास कर रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने पर्यावरण पर काम कर रहे उत्तराखण्ड के एनजीओज को बुलाया था। यह मुझे भी पता नहीं था। उनसे राहुल जी ने पर्यावरण को समझने की कोशिश की। एनजीओ की खोज भी उन्होंने ही की। राहुल जी अभी भी भारत की समस्याओं को जानने-समझने में लगे हैं। इन कामों से ही वे अपनी इमेज को ड्रॉ कर रहे हैं। वे बहुत बड़े राजनीतिज्ञ हैं। एक खास वर्ग ने उनकी इन गतिविधियों को प्रचार का आधार बनाया कि उनमें रुचि लेने की इच्छा शक्ति नहीं है या क्षमता नहीं है। जिसे आप लोग ‘बबुआ’ कह देते हैं। अमेरिका दौरे और खासकर गुजरात चुनाव में जिस तरह भाजपा के घर में उनसे जीत छीनने की कोशिश की, उससे परेशान होकर सोशल मीडिया पर फ्नेटिक वर्ग ने अपना प्रचार शुरू किया कि इन्होंने किसी विषय का अध्ययन नहीं किया है, जबकि राहुल गांधी जी तीन-चार कोर इश्यू पर न केवल हिट कर रहे हैं, बल्कि अपना रोड मैप भी बना रहे हैं। आज कोई दूसरा नेता बना रहा है क्या? वे बेरोजगारी, कøषि, उद्योग क्राइसिस पर लगातार हिट कर रहे हैं।

प्रेम भारद्वाज : कोई फीड बैकिंग करता होगा?
ठीक है न, दुनिया में कोई बिना अध्ययन के कुछ नहीं कर सकता। विवेकानंद भी नहीं कह सकते कि जन्म से उनको बुद्धि आ गई थी। उन्होंने फीड बैक लिया होगा। मगर फीड बैक का इस्तेमाल करना भी तो अपने आप में एक बड़ा कार्य है। हर कोई नहीं कर सकता। राहुल गांधी जी देश के पहले शीर्ष राजनेता हैं जो देश के सामने आज की चुनौतियों पर लगातार चोट कर रहे हैं। वे उन इश्यू को राजनीतिक एजेंडा बना रहे हैं। राहुल गांधी भाजपा या कहें मोदी जी की विभाजनकारी नीति पर चोट कर लोगों के सामने अपनी समरसतापूर्ण नीति पर काम कर रहे हैं।

विनोद अग्निहोत्री : ऐसा तो नहीं कि प्रियंका लंबी लकीर खींच देतीं, उसकी आशंका हो?
लकीर तो आज भी खींचेंगी। आखिर इसका क्रेडिट राहुल जी को ही तो जाएगा। इसमें कोई दिक्कत नहीं है। मैं काम करने का जो तरीका देखता हूं, उससे मुझे लगता है कि सोनिया जी से बातचीत कर उनकी सहमति से निर्णय लिया गया होगा
विनोद अग्निहोत्री : यदि आपको भगवान ने मदद कर दी तो क्या भाजपा के 282 में से आगे का दो हटेगा या पीछे का दो हटेगा?
2014 में देश की जनता ने एक प्रबल एक्सपेरिमेंट किया। मोदी एक्सपेरिमेंट के रिजल्ट हैं। बाजार का क्रिएशन हैं। तीन महीने के अंदर देश को हिपनोटाइज करके सारे वोट अपने पास रख लिए। मेरी समझ से भारत के वे पहले प्रधानमंत्री हैं जिनका कोई वादा-वफा नहीं हुआ। इंद्र कुमार गुजराल जी का भी वादा वफा हुआ होगा। जब वे चुने जा सकते हैं तो देश की जनता का मूड है। कुछ भी हो सकता है। देश के मुसलमान अस्सी के दशक से एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं। नीतीश जी, कभी लालू जी, कभी मायावती को खड़ा किया। मगर उन्होंने किसी मुसलमान को खड़ा नहीं किया। जब कांग्रेस मजबूत थी तो महाराष्ट्र से अंतुले मुख्यमंत्री बने। बिहार से अब्दुल गफ्फूर मुख्मयंत्री रहे हैं, अनवर तैमूर असम के मुख्यमंत्री हो गए। गुलाम नबी आजाद जम्मू- कश्मीर से जाकर महाराष्ट्र में चुनाव जीत सकते हैं। यदि मुसलमान भाई को यह समझ में आ गया तो हमें कौन हरा सकता है। मुसलमान भाइयों को यह समझाने की जरूरत है कि जब कांग्रेस मजबूत थी तब वे मजबूत थे। यदि उत्तर प्रदेश के मुसलमान भाइयों ने यह कह दिया कि जीते या हारे हमारा वोट मुसलमान को जाएगा फिर देखिए जो मुलायम, मायावती, कांग्रेस को एक भी सीट नहीं दे रही है वही कहेंगे आइए, तीन हिस्सा कर लेते हैं। यदि भगवान दयालु हो जाए। हमारे परंपरागत वोटर वापस आ जाएं तो कांग्रेस को कोई नहीं रोक सकता।
विनोद अग्निहोत्री : आपकी सरकार को गैरसंवैधानिक रूप से बर्खास्त किया गया।
हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट से आपकी सरकार बहाल हुई। उस वक्त ऐसा लग रहा था और ज्यादातर लोग कह रहे थे कि हरीश रावत की सरकार वापसी करेगी। फिर क्या वजह रही कि आपकी इतनी बुरी हार हुई? यदि आज भी मेरे साथ आप निकल जाइए और उत्तराखण्ड के किसी रेलवे स्टेशन पर खड़े हो जाइए। आपको खुद आश्चर्य होगा कि क्या यह आदमी हारा हुआ मुख्यमंत्री है। किसी फंक्शन या शादी में चले जाइए। वहां भी आपको आश्चर्य होगा। हार का कारण क्या रहा, ये जीतने वाले भी नहीं समझ पाए हैं कि वह कैसे जीत गए। सत्यता तो यही है। मगर लोकतंत्र में चुनाव आयोग ने जिसके हाथ में सर्टिफिकेट दे दिया, वह जीता हुआ होता था। मोदी जी और अमित शाह दोनों लोकतांत्रिक नहीं हैं। ये क्रूएल शिकारी हैं। जो दूसरों के मांद में जाकर मांस निकाल ही लाएंगे। ये छोड़ते नहीं हैं। हम लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव लड़ रहे थे। वो युद्ध कर रहे थे। अब हमलोग भी समझ गए हैं। बाबर हमेशा थोड़े न जीता था। पृथ्वीराज भी जीता था।

विनोद अग्निहोत्री : मतलब टीना (देयर इज नो अल्टरनेटिव) की जगह रीटा (राहुल इज अल्टरनेटिव) ने ले ली है?गुंजन कुमार : जनता के सामने अल्टरनेटिव रखा जाता है न?मेरा मानना है राजनीति में जनता अल्टरनेटिव तय करती है या फिर भाग्य तय करता है। आपको उसके लिए अपने को तैयार करना पड़ता है।

 

विनोद अग्निहोत्री : तो तैयार कर लिया न?
हां, राहुल जी ने अपने को तैयार कर लिया है। बाकी भाग्य-विधाता जनता तय करेगी। यह दोनों के ऊपर है। 1967 में इंदिरा जी को कोई अल्टरनेटिव नहीं मान रहा था। इंदिरा गांधी जी का प्रशिक्षण जिस तरह से हुआ उसी तरह पूरे गांधी परिवार का हुआ है। राहुल गांधी जी ने कांग्रेस और नेहरू-गांधी की सभी किताबें पढ़ ली हैं। राहुल जी और इंदिरा गांधी जी में बहुत अंतर भी है। राहुल गांधी को जिस दादी से सबसे ज्यादा प्यार मिलता था, उन्हें गोली मार दी जाती है। वह भी उसने जिसके साथ वे बैडमिंटन खेलते थे। जिस बेटे ने अपने पिता को अग्नि दी हो। उसकी मनः स्थिति कैसी होगी। मगर उन्होंने कहा है, पहले मुझे गुस्सा आता था। मगर अब मुझे गुस्सा नहीं है। हम उनकी परिस्थितियों को समझकर उन पर दया करते हैं। यह फैक्टर भी एक लीडरशिप बनाने में काम करता है। लीडर अपने इमोशन को किन परिस्थितियों में कैसे डील करता है। हम कहते हैं न कि जो लीडर बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी नहीं हारता, वही मजबूत लीडरशिप देता है। राहुल गांधी उसी प्रकार के लीडर हैं। आज वे जब कहते हैं कि वो हम पर गुस्सा करते हैं, हमें नीचा दिखाना चाहते हैं, हम भी उन्हें हराना चाहते हैं। मगर प्यार से हराना चाहते हैं, नफरत से नहीं। यह उनकी शिक्षा को दर्शाता है। यही भारत और हमारे सनातन धर्म की शिक्षा है।

सुनील नेगी : राहुल की तमाम अच्छाइयों के बाद भी कांग्रेस 20 राज्यों का चुनाव हार चुकी है। मोदी के सामने 2019 के मद्देनजर आज भी राहुल खड़े नहीं हो रहे हैं, क्यों?
आपके सवाल के मोटे तौर पर तीन भाग हैं। एक है राहुल गांधी जी में क्या यह क्षमता है। ऐसी स्थिति में जब राज्यों में पार्टी चुनाव हार रही है। वह पार्टी को जीत की ओर ले जा सकें। आप इंडियन पॉलिटिक्स का चार्ट देखेंगे तो ये स्थितियां सामने आएंगी कि हम 1989 के बाद राज्यों में हारने लगे थे। फिर 2002 के बाद हमने रिवाइव करना शुरू किया। फिर हम 22-24 राज्यों के साथ पीक पर पहुंचे। फिर 2014 में हम हारने लगे और भाजपा आगे बढ़ने लगी। कई सारे फैक्टर इसका कारण बने। जब से रीजनल पार्टियां सत्ता में आई तो एक ट्रेंड बना। 1989 में रूलिंग पार्टी राज्यों में हार रही थीं। फिर 2004 में यह ट्रेंड बदला। फिर 2004 में डॉ मनमोहन सिंह आए। यह साइकिल दस साल का बनता दिख रहा है। हमारे सामने सवाल है कि इस दस साल के साइकिल को पांच साल में रिवर्स कर बदल सकते हैं या नहीं। हमारे सामने यह टास्क है। यह टास्क बहुत बड़ा है। इसलिए हम गैरबीजेपी पार्टियों को एक साथ खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। जो गाड़ी दस साल बाद बदलनी है, उसे पांच साल में ही पंक्चर कर बदलने का काम हमें करना है।

सुनील नेगी : लेकिन अभी तक सिर्फ एनसीपी ने ही गठबंधन की बात की है, रेस्ट की कोई प्रतिक्रिया नहीं है?
ठीक है न। जैसे-जैसे चुनौतियां सामने आएंगी, लोग जुड़ेंगे। कोई कह सकता था कि कर्नाटक में हम जेडीएस के साथ गठबंधन करेंगे। आपके पहले सवाल का जवाब मैं पूरा कर दूं। राहुल गांधी आज विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं मगर वह यह नहीं शो कर रहे हैं कि मैं अकेला सत्ता परिवर्तन करूंगा। वे यह शो कर रहे हैं कि हम सब मिलकर इस काम को करेंगे।

हेमा उनियाल (फेसबुक से) : आपने पलायन को रोकने के लिए क्या किया और भ्रष्टाचार पर क्या एक्शन लिया? परशुराम भट्ट (फेसबुक से) आपने अपने शासन में लोकायुक्त क्यों नहीं बनाया

पहले मैं पलायन पर जवाब देता हूं। पलायन रोकना कोई स्लोगन नहीं है। तीस, पैंतीस और चालीस साल की प्रक्रिया को रोकते हैं तो आपको वही रूट पकड़ना पड़ेगा। चक्र को तरीके से ही बैक करना होगा। मैंने पहले संस्कृति पर पहल की। मेलों के वर्गीकरण, उन्हें प्रमोट, होम स्टे से लेकर उत्तराखण्डी खान-पान, आभूषण या फिर ये आम पार्टी आदि सभी पलायन को रोकने की मेरी पहल हैं। यहां मैं दो उदाहरण देता हूं। 2016-17 में उत्तराखण्ड से पलायन की दर में 75 प्रतिशत की कमी आई। यह यूं ही नहीं हो गया। हमने रिवर्स पलायन की स्थिति पैदा कर दी थी। वहां की खेती आदि को फायदेमंद कर लोगों में उसकी रुचि पैदा कर दी। दूसरा, मेरे मुख्यमंत्री बनने से पहले रोजगार कार्यालय में हर साल पंजीकरण की वृद्धि दर 12 ़5 फीसदी थी। जब मैंने त्रिवेंद्र सिंह को चार्ज दिया, उस वक्त उसकी दर 2 ़5 फीसदी थी। देश के किसी राज्य में इतनी गिरावट नहीं आई है। आप आंकड़े देख लीजिए। मैंने अकेले शिक्षा विभाग में 18 हजार पद भरे थे। एससी-एसटी का 50 फीसदी बैकलॉक को भर दिया। मुख्यमंत्री नहीं रहने के बाद भी इन मुद्दों पर काम कर रहा हूं। लोकायुक्त का चयन सर्वसम्मति से करके मैंने फाइल राज्यपाल के पास भेज दी थी। वह भी चुनाव से बहुत पहले और प्रतिपक्ष के नेता के हस्ताक्षर के साथ हैं। यदि राज्यपाल ने हस्ताक्षर नहीं किए हैं तो उनसे सवाल पूछे जाने चाहिए। उन्होंने किसके दबाव में हस्ताक्षर नहीं किए हैं। राज्य को लोकायुक्त नहीं मिलने का दोषी हरीश रावत नहीं है। जिसने राज्यपाल की कलम रोकी है, वह दोषी है।

सैयद कल्बे रिजवी : आप कांग्रेस के वरिष्ठ और वफादार नेता हैं। मेरा सवाल यह है कि यदि 2019 में ऐसी स्थिति आई कि कांग्रेस को आप में दूसरा मनमोहन सिंह दिखे, तो क्या आप देश की खिदमत करेंगे?

यह कल्पनावादी बात है। मैं 2019 में चुनाव लड़ूंगा या नहीं मुझे इसकी उम्मीद नहीं है। हमारे सामने एक ही लक्ष्य है। क्योंकि मेरे नेतृत्व में कांग्रेस हारी है, मैं चाहता हूं कि मेरे सक्रिय रहते उत्तराखण्ड में कांग्रेस की जीत हो। यदि लोकसभा की पांच सीटों के रूप में जीत हो जाती है तो मैं समझूंगा कि राहुल जी के नमक का कुछ हक हमने अदा कर दिया। यदि नहीं हो पाई तो 2024 में देखेंगे।

 

 

विनोद अग्निहोत्री : इनके सवाल को ही आगे बढ़ाता हूं कि क्या राहुल गांधी अपने को समझौतावादी बना लेंगे और वे प्रधानमंत्री की अपनी दावेदारी छोड़ देंगे?
नहीं। यह ऐसा सवाल है जिसमें लॉजिक हमारे पास है। हमको सिर्फ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आना है। यदि हम ऐसा करते हैं, जिसका पूरा चांस है तो मौका हमारे हाथ में होगा। इसका लॉजिक भी है। हमने पुराने अनुभव को भी देखा है। शरद पवार जी ने भी यही कहा है कि सबसे बड़ी पार्टी को ही सरकार बनाने का चांस मिलना चाहिए।

विनोद अग्निहोत्री : रावत जी आप कह रहे हैं कि कांग्रेस के पास बड़ी पार्टी बनने का चांस है। मगर अधिकतर बडे़ राज्यों में आप हैं ही नहीं। देश के बड़े हिस्से में आप नहीं हैं। फिर सिंगल लारजेस्ट पार्टी कहां से बनेंगे?
हमारे लिए 2014 से खराब संसदीय नतीजा नहीं हो सकता था। तब भी हम 44 रहे। लारजेस्ट अपोजिशन पार्टी हम बने। आज हमारा बुरा से बुरा चाहने वाला व्यक्ति भी उससे ऊंचा ही दे रहा होगा। ये परिस्थितियां हैं। मगर ये परिस्थितियां और पॉलिटिकल गणित हमारा फेवर करता है। गणित और दिशा संकेत हमारा फेवर करता है और गणित भाजपा के खिलाफ है। गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में भाजपा मैक्सिमम् है। इससे वे अब पीछे ही हटेंगे, आगे बढ़ नहीं सकते। मोदी जी का बड़े से बड़े समर्थक भी यह कहेगा कि इन राज्यों में मोदी जी को जितना मिला है, उससे 50 फीसदी घटेंगे। मेरे जैसे लोगों का मानना है 70 फीसदी घटेंगे। यदि भगवान ने नहीं भी चाहा तो 40 फीसदी सीट तो घटेंगे ही। इसे भी मानें तो 282 में से भाजपा 110-120 सीट घटेंगी ही। उनके बढ़ने की संभावना कहीं नहीं है।

विनोद अग्निहोत्री : भगवान दयालु तभी होंगे न जब राहुल कैलास की यात्रा करेंगे?
केदारनाथ हो आए हैं। हमारे शिवपुराण में कहा गया जो केदार का दर्शन कर लेगा, उसको कैलास का तप स्वतः मिल जाएगा।

गुंजन कुमार : केदार के दर्शन तो राहुल गांधी ने 2013 में भी कर लिए थे?
तब भगवान से उन्होंने राजनीति को नहीं मांगा होगा। अब मांगेंगे, मिल जाएगा।

गुंजन कुमार : कांग्रेस अपने को धर्म निरपेक्ष पार्टी कहती है, फिर मुस्लिम-मुस्लिम क्यों कह रहे हैं?
दुनिया में लोकतंत्र का एक सिद्धांत है, जो सर्व मान्य है। वैसे डेमोक्रेसी फॉर पीपुल बाई द पीपुल, ऑफ द पीपुल की भी परिभाषा है। लेकिन यह मान्य सिद्धांत है कि बहुसंख्य का कर्तव्य है कि वह अल्पसंख्यकों के अधिकार की रक्षा करें। ये अमेरिकन, ब्रिटिश, यहां तक कि जो ऑरथोडॉक्स कंसटीट्यूशन चीन और रूस के हैं, वे भी इस बात को कहते हैं। उसी तरह हमारा संविधान भी यही कहता है कि अल्पसंख्यकों, उनके अधिकारों की रक्षा करना बहुसंख्यकों का दायित्व है। कांग्रेस इस फिलॉसफी को आगे बढ़ाने की आर्किटेक्ट रही है। हम जिस बुनियादी संवैधानिक दायित्व का आर्किटेक्ट रहे हैं, उससे पीछे कैसे हट सकते हैं। डॉ मनमोहन सिंह ने अल्पसंख्यकों की रक्षा की बात कही थी। यह कहने वाले वे पहले राजनेता नहीं थे, बल्कि यह बात सबसे पहले अब्राहम लिंकन ने कही थी। जब अमेरिका को यूनाइटेड बनाया जा रहा था। उनके बाद अधिकांश ऐसे देशों के राजनेताओं ने भी यही कहा, जहां धार्मिक क्रायसिस हुआ था। आप उन देशों का इतिहास पढ़िएगा तो सभी के इतिहास में यह पढ़ने को मिलेगा। मेरे चुनाव में टोपी पहने हुए मेरा एक फोटो लगाकर लिखा गया था कि हरीश रावत कन्वर्ट हो गए हैं। सुशील कुमार मोदी का भी टोपी में फोटो है। ऐसी बात वे क्यों करते हैं? हमारी रवायत, संस्कøति में भाईचारा है। आज मोदी जी को भी मकबरों में जाना पड़ रहा है। वे कबीर के पास जा रहे हैं। यह बात अलग है कि कबीर ने जो कहा था, ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिला कोय/जो दिल देखा आपनो, मुझसे बुरा न कोय।’ मोदी जी उसे भूल गए हैं।

अपूर्व जोशी : आपकी क्या मजबूरियां रही थी कि उत्तर प्रदेश का एक नामी भूमाफिया, नामजद हिस्ट्रीशिटर व्यक्ति आपके कमरे में (मुख्यमंत्री बनने के बाद) बैठा रहता था। आपकी क्या मजबेरियां थी कि उसकी पत्नी को न केवल पार्टी में शामिल किया, बल्कि टिकट भी दिया? आपने उत्तराखण्ड में एक गलत परंपरा की शुरुआत की। जिसका दुष्परिणाम आज पूरा प्रदेश भुगत रहा है?
लोकतंत्र कई मजबूरियां पैदा करता है। मैं उस समय तक बहुत कुछ जानता नहीं था। लोग मुझे चुनाव में जाने से रोक रहे थे। उनका कहना था कि छह माह बाद फिर से शपथ ले लेना। लेकिन मैंने चुनाव में जाने का निर्णय लिया। मेरी गर्दन टूट गई थी। ऐसे वक्त में निर्णय करना बहुत मुश्किल था। इलेक्टिव मैरिट में यह महिला उभरकर आई। पूरी स्थानीय कांग्रेस कमेटी ने इनका नाम दिया। मैंने तब पूछा भी कि तुम लोग कांग्रेस वाले को नहीं ला रहे, भाजपा वाले को ला रहे हो। लेकिन नहीं, पूरा संगठन उसके साथ था। मैं महसूस करता हूं कि जब कभी उत्तराखण्ड में गलत निर्णयों का इतिहास लिखा जाएगा उनमें से दो-तीन लोगों को राजनीति में लाने या बचाने में मेरी जो भी भूमिका रही, उसमें मेरा भी जिक्र जरूर रहेगा। इसका मुझे रिग्रेट रहेगा। उनमें से एक गलती यह भी है।
अपूर्व जोशी : नौ विधायकों के पाला बदलने के बाद आपकी सरकार गिरी तो येन-केन-प्रकारेण आपने भी अपनी सरकार बहाल करने के प्रयास किए। देहरादून हवाई अड्डे पर आप एक पत्रकार के साथ सौदा करते हुए सीडी में दिखे। इतनी बड़ी गलती आपसे कैसे हुई?
मैं पत्रकार को देवकन्या समझ बैठा। वो विषकन्या निकली। दूसरी बात यह कि मेरी शिकायत हिंदुस्तान के तमाम मीडिया से भी है। उसमें आप भी शामिल हैं। शिकायत इसलिए है कि किसी ने पूरी बातचीत को न देखा और न पढ़ा। उस बातचीत के शुरू में ही मैं आश्चर्य करता हूं कि आप यहां कैसे। मैंने कहा मेरी सरकार गिरा दी तुम कहां थे भाई। शुरू में मैं उसे कुरेद रहा हूं। क्योंकि मुझे मालूम है कि यह दूसरे पक्ष के नजदीक है। वह मुझे बताने लगता है। वह मुझे अपने तरीके से आईने में उतार रहा था। मैं अपने तरीके से। वह साफ कह रहा है कि आपकी सरकार षड्यंत्रपूर्वक गिराई गई। बहुगुणा इसके फ्रंट पर थे और पैसे का लेन-देन भी हुआ है। किसको कितना गया है, यह मैं नहीं जानता। बड़ी होशियारी से उसने आधा कह छोड़ दिया। यहां से मैं फिर कुरेदने की कोशिश करता हूं। वह जबरदस्ती मेरा कल्याण करने वाला बनता है। मैं पहले सामान्य तौर पर उसे नकारता हूं। उसने कहा, मैं कर दूंगा। तो मैंने कहा करो। जो तुम कर सकते हो कर देना। बाद में तुम मेरे पास आ जाना। जो तुम करोगे वह तुम्हें वापस कर दूंगा। मैंने अपना बबाला टालने के लिए उसे कह दिया। वह फिर मुझे इंगेज करता है। बाद में जब मुझे लगता है कि बहुत हो गया तो अंत में मैं कहता हूं कि न-न, तुम करोगे तो तुम जानोगे भाई। मैं कुछ नहीं जानता। मीडिया ने बहुत सैलेक्टिव तरीके से जो पार्ट्स मेरे खिलाफ जा सकता था, उसी को दिखाया। सीबीआई ने भी यहीं किया। नहीं तो एक निर्वाचित सरकार को गिराने का षड्यंत्र भी अपने आप में क्राइम है।

गुंजन कुमार : उन्होंने ट्रेनिंग कहां से ली होगी?

मुझे लगता है, उन्होंने बाबरनामा ज्यादा पढ़ा है। बाबर, मोहम्मद गौरी, मोहम्मद गजनी जिस तरीके से यहां युद्ध जीते, वो भी उन्हीं की युद्ध नीति की तरह चुनाव जीते हैं। ये कुछ दिन पहले से जाते हैं वहां बमबार्डिंग करते हैं। ध्रुवीकरण करते हैं और फिर जीत लेते हैं। हमसे एक टेक्निकल भूल हुई। मैं अपने मंत्रियों, विधायकों को सहमत नहीं करवा पाया। हमें उसी वक्त चुनाव में चले जाना चाहिए था जिस समय उसका उचित समय था। मोदी जी की सबसे बड़ी नैतिक हार थी जब उत्तराखण्ड में हमारी सरकार बहाल हुई। मुझे यह मानकर चलना चाहिए था कि मोदी जी जैसा मांसाहारी जब भी उन्हें मौका मिलेगा हमारा भक्षण जरूर करेगा। उन्होंने जब मौका मिला हमारा भक्षण किया।

सैयद कल्बे रिजवीः आपको यदि हिंदुस्तान की कुर्सी मिलती है तो आप वो दो कौन सी चीज लाना चाहेंगे या लागू करना चाहेंगे या अमेंडमेंट करना चाहेंगे जिससे मैली हो चुकी चादर ठीक हो जाए?

मैं आपके सवाल को उचित समय के लिए रख रहा हूं। मैं जिस व्यक्ति की हिंदुस्तान का प्रधानमंत्री बनने की कल्पना कर रहा हूं वह पूरी होते ही दो नहीं तीन बातें पूरा करवाने की कोशिश करूंगा। उस वक्त आपको याद भी करूंगा।

सैयद कल्बे रिजवी : मैं पिछले दिनों कांग्रेस की इफ्तार पार्टी में था। मैंने वहां देखा जब राहुल गांट्टा आए तो बड़े से बड़े नेता उनके लिए बेताब थे। छोटे नेताओं को तो वहां कोई पूछ ही नहीं रहा था। मैं इसे क्या समझूं?  क्या यह मिस मैनेजमेंट या तहजीब में बहुत कमजोरी आ गई है?
न हमारी तहजीब में कमजोरी आई है, न हमारी रवायत में कमजोरी है, न इसके पीछे जो हमारी सोच है उसमें कोई कमजोरी आई है। कांग्रेस की जब भी इफ्तार पार्टी होती है उसमें बड़े गहराई से लोगों को चुना जाता है। बहुत दूर -दूर से लोगों को बुलाया जाता है। कभी-कभी तो बहुत पिछड़े परिवेश के लोगों को लाया जाता है। जैसे एक बार हमें कहा गया। हमारा कोई पुराना कार्यकर्ता हो जो कभी हमारे किसी बड़े कार्यक्रम में न आया हो उन्हें लेकर आइए। कांग्रेस इस तरह के कार्यक्रमों को बहुत ही गंभीरता से लेती है। मुझे नहीं मालूम ऐसी स्थिति के बारे में। मैं आपकी बात को आगे कनवे करूंगा।
सैयद कल्बे रिजवी : रावत भाई मैंने वहां ‘हटो-बचो’ जैसी स्थिति देखी। जहां कार्यकर्ता तो छोड़िए छोटे नेता भी राहुल गांधी से नहीं मिल पाए। न वे मिले। उसी के बरक्स मैं प्राइम मिनिस्टर की पार्टी में भी गया। वहां प्राइम मिनिस्टर हमसे ही नहीं हरेक लोगों से अकेले मिले, उन्हें समय दिया। मैं कभी नहीं चाहूंगा कि वह इस देश का नेतृत्व करे जो अपने कार्यकर्ता तक से सही से नहीं मिलता?
मैं इसे सही कराऊंगा। यदि ऐसा हुआ है तो गलत हुआ है।
सुनील नेगी : मैंने इस कार्यक्रम में आने से पहले अपनी फेसबुक पर एक पोस्ट डाली और लोगों के सवाल लेने का प्रयास किया। कई लोगों ने हमारे पोस्ट पर सवाल किए हैं। पहले मैं उन्हीं के कुछ सवाल यहां आपके सामने रखता हूं। एक मित्र बलवंत सिंह का प्रश्न है कि कांग्रेस के एक बड़े वफादार नेता का कहना है कि कांग्रेस अब एक विचारधारा नहीं है, बल्कि व्यक्ति विशेष की पार्टी बनकर रह गई है। आप क्या कहेंगे?
लोकतंत्र में पर्सनेलिटी मायने रखती है, बल्कि उभरती डेमोक्रेसी में पर्सनेलिटी ने अपने -अपने देशों को इवाल्व करने में भारी भूमिका निभाई है। नेहरू, सुकानो आदि ऐसे नाम हैं। उसके बाद के पीरियड में भी आप यह देखेंगे। आप पुरानी डेमोक्रेसी में भी इसे देखेंगे। दुनिया की सबसे पुरानी डेमोक्रेसी ब्रिटिश है। वहां
लाइनेज आज भी हैं। अमेरिका में आज भी कैनेडी, बुश परिवार का दबदबा है। जापान में भी आप यही देखेंगे। तो लोकतंत्र में परिवारों का इतिहास भी लोगों के निर्णय को प्रभावित करने में भूमिका निभाता है। हर राजनीतिक दल उसका लाभ उठाने का काम करता है। हम उसके कोई अपवाद नहीं हैं। हां, यदि डमोक्रेसी में नो वैकेंसी फॉर अदर्स होता तो मुझ जैसे व्यक्ति नीचे से ऊपर तक नहीं आते। कांग्रेस में ऐसे कई उदाहरण हैं। जो लोग परिवार से इतर आए हैं। लाल बहादुर शास्त्री सबसे अच्छे उदाहरण हैं। मनमोहन सिंह, ज्ञानी जैल सिंह भी उदाहरण हैं। कांग्रेस परिवार और आम कार्यकर्ताओं का बहुत ही सुंदर मिश्रण है।
प्रेम भारद्वाज : जनतंत्र में परिवारवाद अच्छा है या बुरा है?

यदि ये डेमोक्रेटिक परिवारवाद है तब तो अच्छा है। यदि ये हो कि प्रधानमंत्री सिर्फ परिवार से होगा तो गलत है। यदि परिवारवाद डेमोक्रेसी को प्रमोट करता है तो गलत नहीं है।

युद्धवीर सिंह (फेसबुक से) : हरीश रावत एक डूबते हुए जहाज के कुशल तैराक हैं। वे अपने परिवार को बचाने के लिए जो कर रहे हैं वह उनकी पार्टी के शीर्ष नेता भी करते रहे हैं। आजकल वे आम पार्टी देकर जिंदा रहने की कोशिश मात्र कर रहे हैं?
देखिए, हर व्यक्ति में सर्वाइव करने का गुण होता है। मेरा मानना है यदि कोई व्यक्ति सर्वाइव करने की कोशिश करता है तो गलत नहीं है। सर्वाइव करने का गुण छोटे पशु-पक्षी और कीड़ों में होता है। मैं तो मनुष्य हूं। यदि मैं यह करता हूं तो इसको मेरा गुण समझा जाना चाहिए। यदि मैं सर्वाइवल के साथ फाइट करता हूं तो यह मेरा सुपर वर्चुअल गुण समझा जाना चाहिए। आम या काफल पार्टी सिर्फ पार्टी नहीं है। मैं समझता हूं उत्तराखण्ड एक कल्चरल आइडेंटिटी भी है तो वहां के राजनीतिक लोगों को मेरा अनुसरण करना चाहिए। क्यों करना चाहिए। मैं इसका एक छोटा सा उदाहरण देता हूं। 1980 के शुरुआती दिनों में दिल्ली-नोएडा में मलिहाबाद का दशहरी आम, इलाहाबाद का लंगड़ा-चौसर आम की दावतें होती थी। मगर वे सारे आम आते थे मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कांग्रेसी नेता 1980 के दशक में हमलोगों को अपने यहां आम पार्टियों में ले जाते थे। वह पार्टी खूब अखबारों में छपती थी। एक बार तो अखबार में यह भी छप गया कि आम पार्टी में इंदिरा जी भी जाएंगी। इसका असर यह हुआ कि 1985 आते-आते सहारनपुर तक के आम ने नेशनल और इंटरनेशनल मार्केट में अपनी जगह बना ली। उत्तराखण्ड के आम, सेब और दूसरे फल को कोई लेता नहीं था। मैंने उसकी पहचान बनाने के लिए मुख्मयंत्री रहते प्रयास किया। और जब मैं हार गया तो पूर्व मुख्यमंत्री के रूप में भी करता हूं। मेरी यह आदत है। मैं पहले भी आम और पहाड़ी व्यंजनों की पार्टियां देता रहा हूं। मेरा दावा है कि उत्तराखण्ड का कोई नेता एक सांस में मेरे जितना उत्तराखण्ड के व्यंजनों के नाम नहीं गिना सकता। उत्तराखण्डी पहनावे, आभूषण, फल और वनस्पतियों को नहीं गिना सकता। जितना मैं गिना सकता। सौ खड़े कर दीजिए। वे सौ आदमी लड़खड़ा जाएंगे, मगर मैं नहीं लड़खड़ाऊंगा। यदि यह मेरा गुण है तो आप मान लो। नहीं गुण नहीं मानते तो हटा तो दिए ही हो मुझे।

परवीर रावत (फेसबुक से) : हरीश रावत जब मुख्यमंत्री रहे तो गैरसैंण पर कोई संजीदा पहल नहीं की। मुख्यमंत्री बनने के पहले गैरसैंण-गैरसैंण खूब करते थे। दूसरा, दिल्ली के आंदोलनकारियों से 
कागजात मंगाए लेकिन उस पर कुछ क्यों नहीं किया?
मुझसे किसी ने कहा कि आंदोलनकारियों का जो साथ देता है, वह चुनाव हार जाता है। और मैंने राज्य आंदोलनकारियों का साथ दिया। मैंने उनकी नौकरियों के लिए एक्ट बनवाया, पेंशन लगवाई। मगर मेरी सरकार चली गई। गैरसैंण पर मैं यही कहूंगा कि जितना मैंने वहां कर दिया। अब भविष्य में कोई भी पार्टी वहां सत्ता में आए, उससे पीछे नहीं हट सकती। वह उससे आगे ही बढ़ेगी। मैं गैरसैंण को राजधानी बनाने का रोडमैप बनाकर इंप्लीमेंटेशन में डाल चुका हूं। मैंने विधानसभा भवन दे दिया।

सचिवालय के लिए 54 करोड़ रुपए मंजूर कर दिए। आवासीय भवन बना दिया। पेयजल के लिए लोकल डैम्स बना दिए। बिजली ले आया। आज वहां दो हजार से ज्यादा लोग रह सकते हैं।

गुंजन कुमार : एफएलटू नीति बनाने में भी आप पर आरोप लगा है?
उसमें दो बाते हैं। मुझसे पहले वहां शराब माफिया शराब बेचता था। मैंने उसे हटा दिया, क्योंकि मैंने शराब का थोक व्यापार मंडी को दे दिया। यदि मंडी माफिया है तो मैं नहीं कह सकता। मंडी के मंत्री हरक सिंह थे। आज वे भाजपा के साथ हैं। यह सवाल उनसे पूछा जाना चाहिए। मैंने थोक का काम मंडी को दे दिया और वितरण का काम दोनों विकास निगमों को दे दिया। तीनों संस्थान सरकारी हैं। उन्होंने उससे जो लाभ कमाया, उससे कुमाऊं मंडल विकास निगम घाटे से लाभ में आ गया। गढ़वाल मंडल विकास निगम ने भी अपनी बैलेंस सीट सुधार ली। मंडी ने उससे इतना कमाया कि उससे रामदाने का प्रोसेसिंग प्लांट रुद्रपुर में लगाया। रामदाने की खेती करने वाले किसान के लिए यह लाभकारी होगा। मेरी यदि एक साल वह नीति रह गई होती तो मैं वैनेरी -वैटनिरी उत्तराखण्ड में लेकर आता और रागी की बीयर बनवाता। जिसके वहां के हॉर्टिकल्चर में जबरदस्त बदलाव आता। मगर मैं एक गलती कर बैठा। वह यह कि मैंने आबकारी नीति को हॉर्टिकल्चर नीति के साथ जोड़ दिया। मैंने कहा जो शराब ब्रांड हमारे यहां के फल, अनाज के रस का 10 फीसदी उपयोग शराब का ब्रांड बनाने में करेंगे, हम उनको 20 प्रतिशत मार्केटिंग राइट्स देंगे। फलों का रस दो ब्रांड वालों ने मिलाया। उस ब्रांड का स्वाद लोगों को पसंद नहीं आया। मुझसे गलती यह हो गई कि मैं पीने वालों के स्वाद की रक्षा नहीं कर सका। उस चक्कर में पीने वाले नाराज हो गए। जिस कारण मुझे नीति वापस लेनी पड़ी। नहीं तो मैंने वह रास्ता बना दिया था, जिससे उत्तराखण्ड की इकोनॉमी बदल जाती।
गुंजन कुमार : आपकी सक्रियता को लेकर आपके ही नेता कहते हैं कि आप उत्तराखण्ड में समानांतर कांग्रेस बना रहे हैं। क्या यह सही है? 

किसने क्या कहा, मैंने नहीं पढ़ा और न सुना। मगर मैं पूछता हूं कि क्या नेता की सोशल लाइफ नहीं होनी चाहिए। मैं किसी मंदिर में भजन-कीर्तन करता हूं। एससी और एसटी के मंदिर में करता हूं, तो यह क्या अनुकरणीय नहीं है। अनुकरण करने के बजाए आप आलोचना करें, तो मैं समझता हूं वह समझदारी नहीं है। मैं यदि कोई पार्टी करता हूं, उसमें 5-10 हजार लोग आते हैं। मैं कांग्रेस मैन हूं तो इसका लाभ अंततः पार्टी को ही तो मिलेगा न, या नहीं मिलेगा। चुनावी हार के बाद या जिनके पास पद नहीं रहते हैं, उन्हें क्या घर में सो जाना चाहिए। या पार्टी को मजबूत करने के लिए काम करना चाहिए। समानांतर वह है, यदि कांग्रेस कोई आंदोलन कर रही हो और मैं उसी आंदोलन को दूसरी जगह खड़ा करूं। तो यह कह सकते हैं कि मैं कांग्रेस के समानांतर कांग्रेस खड़ी कर रहा हूं। हमारे दोस्तों को खुश रहना चाहिए। जिस घर का बूढ़ा पांच बजे उठकर खटर-पटर करने लगेगा। अन्य सदस्य छह-सात बजे तो जग ही जाएंगे। मुझे घर का वही बूढ़ा समझना चाहिए। खुद भी आगे आकर काम करना चाहिए।

गुंजन कुमार : मगर उसमें एक पेंच डाल दिया आपने, नोटिफिकेशन में विधानसभा भवन को गेस्ट हाउस लिख दिया?

नहीं! आवासीय भवन जो हैं, उनकी मेंटेनेंस का सवाल था। विधानसभा सचिवालय से यदि वह पैसा जाता तो भवन को जाता। इसलिए मैंने चालाकी से उसके मेंटेनेंस के काम को राज्य संपत्ति विभाग को दे दिया। ताकि वह आवासीय भवन का मेंटेनेंस कर सकें।

अपूर्व जोशी : तो क्या हम यह मान कर चलें कि यदि 2022 में आप आते हैं तो गैरसैंण को राजधानी घोषित कर देंगे?

यदि मैं रहा होता तो इस काम को 2019 तक ही पूरा कर देता। मैंने सब पूरा कर दिया था। मुझे इंतजार केवल एक बात का था, जो आठ सड़कें गैरसैंण को जो जोड़ने के लिए बनानी शुरू कराई थी, उन आठ सड़कों को गैरसैंण पहुंचने तक का इंतजार था। ताकि एक स्मूथ राजधानी बन जाए।

गुंजन कुमार : राजधानी स्थायी होगी या अस्थायी होगी?
मैंने स्थायी-अस्थायी का कोई कॉनसेप्ट ही नहीं रखा। जब राज्य में एक ही विधानसभा

होती, फिर स्थायी-अस्थायी की बात रह ही नहीं जाती।

गुंजन कुमार : विधानसभा भवन के लिए तो देहरादून में भी जमीन का चयन किया गया है?
नहीं! मैंने ऐसा नहीं किया है। वह विजय बहुगुणा जी करके गए हैं।
गुंजन कुमार : देहरादून विधानसभा भवन के लिए तो बजट भी जारी कर दिया था?

वह पैसा तो हमने दूसरी जगह खर्च कर दिया। मैं अपने मुंह से क्यों कहूं कि यह कर रहा हूं, वह नहीं कर रहा हूं। मैंने सब कर्म से कर दिखाया। उत्तराखण्ड वालों को मेरा कर्म दिखाई नहीं दिया तो अब भुगतो। मैंने तीन साल में जो कर दिया। अब पांच साल में भी नहीं कर पाएंगे।

अपूर्व जोशी : क्या इसी लॉयलटी के कारण कुछ दिन पहले उनका कार्यकाल खत्म होने के 
बावजूद वे पद पर बने हुए हैं?

मैं इस पर कमेंट नहीं करूंगा। वे राज्य के संवैधानिक हेड हैं। हां, उनसे इतना जरूर पूछा जा सकता है कि जिस लोकायुक्त पैनल को सर्वसम्मति से भेजा गया था, उसे किस दबाव में मंजूर नहीं किया गया।

अपूर्व जोशी : लोकायुक्त पैनल में किन-किन लोगों का नाम था?

जो भी रहे हों चयन समिति में प्रतिपक्ष के नेता, स्पीकर, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश आदि सभी थे। वह निर्णय बहुमत से नहीं, बल्कि सर्वसम्मति से लिया गया था। फिर भी यदि राज्यपाल ने दस्तख्त नहीं किए तो मैं कुछ नहीं कह सकता। कुछ तो रही होंगी उनकी मजबूरियां।

अपूर्व जोशी : आपको इसका भी रिग्रेट रहेगा कि जब तक आप मुख्यमंत्री रहे इन्हें संरक्षण दिया। जैसे ही इन्होंने पाला बदला और आपकी सरकार दोबारा बनी तो आपने इनके खिलाफ एफआईआर करानी शुरू कर दी?
ज्यों-ज्यों चीजें मालूम पड़ती गई, उसे रोका। रोकने का ही नतीजा था कि वह दूसरी तरफ चली गईं। मैं उनका पाला बदलने का सबसे ज्वलंत मामला बताऊं। एक दिन पति-पत्नी  मेरे पास आए और बोला 200 ट्रक को इजाजत दे दीजिए। मैं कुछ समझा नहीं। मैंने किसी को कहा कि इनका काम क्यों नहीं कर रहे हो। विधायक जी को ले जाओ और काम कराओ। जिसे मैंने कहा था, उसने रात में मुझे कहा कि साहब आपको पता है किस चीज का ट्रक है। मैंने कहा नहीं। तब उसने कहा खनन का ट्रक है। तब मैंने उसी वक्त एसएसपी को फोन कर उनकी गाड़ियों की सीज करने को कहा। एक भी ट्रक निकलने नहीं दिया। उस घटना के तीसरे दिन भाजपा ने उसे अपने साथ खींच लिया। मैं पहला मुख्यमंत्री था, जिसने केंद्र के बेनामी संपत्ति कानून को स्वीकार किया था। बाद में दो विधायक मेरे पास आए। मैंने कहा तुम्हें तो इस पर खुश होना चाहिए। एक कानून मैंने बना भी दिया था, वह था नदी किनारे जितनी भी झुग्गी थी उन सबको नियमितीकरण करने का। एक मंत्री और एक विधायक मेरे पास आए और कहने लगे यह कानून वापस ले लीजिए। मैंने कहा क्यों ले लूं। यह तो अच्छा कानून है। बाद में मुझे पता चला कि उनमें से एक विधायक वहां बसे लोगों की रजिस्ट्रियां अपने पास रखते हैं। जैसे ही नियमितीकरण हो जाएगा, उनका खेल खत्म हो जाएगा। इसलिए वे हमसे कानून बदलवाना चाहते थे। वे सब विजय बहुगुणा जी के साथ दूसरे खेमे में चले गए।

अपूर्व जोशी : एनएच 74 में इतना बड़ा घोटाला हुआ?
एनएच घोटाला मेरे सामने नहीं हुआ। उसकी जांच जरूर मैंने शुरू करवाई। पहले कमिश्नर को जांच दी। मैं जांच की एसआईटी गठित करके गया। वही एसआईटी जांच कर रही है। मेरी एसआईटी को डायल्यूट किया गया। इसमें मैंने जो आरबिट्रेशन्स के मामलों को जांच के दायरे में रखा था। इन लोगों ने उसे जांच के दायरे से बाहर कर दिया, क्योंकि सारा खेल वहीं होता है। वह पैसा एनएचएआई का है। एनएचएआई के अधिकारियों की जानकारी के बिना वह पैसा कैसे कहीं चला जाएगा। मैंने एनएचएआई को भी जांच के दायरे में रखा था। इन्होंने उन्हें भी बाहर कर दिया। पिछले कुछ वर्षों से यह आंदोलन वाला उत्तराखण्ड नहीं रहा। मतलब ‘आधी रोटी खाएंगे…’ वाला उत्तराखण्ड नहीं रहा। अब यह बदलकर ‘इतना हम कमाएंगे, देहरादून में घर बनाएंगे…’ वाला उत्तराखण्ड बन गया है। उस प्रकृति को विजय बहुगुणा ने बढ़ावा दिया। चार सौ से ज्यादा खनन पट्टे और क्रशर विजय बहुगुणा देकर गए। यह आंकड़ा मैंने विधानसभा के पटल पर रखा है। तब विधानसभा में मैंने दोनों पक्षों से कहा, मैं जांच कराने के लिए तैयार हूं। हमारी सरकार जितनी कड़ी होती गई, उससे परेशान सारे लोग एक जगह इक्ट्ठा होते गए और हमारी सरकार के खिलाफ खड़े हो गए। आप रुड़की चले जाइए। वहां पुलिस चौकी को हटाकर भव्य मॉल बनाया जा रहा था। मैंने उसे रोक दिया। वह हमारा विधायक था। इससे उस विधायक (प्रदीप बत्रा) का मेरे खिलाफ जाना पक्का था। 20-25 करोड़ रुपया हमारी सरकार को गिराने पर खर्च किया गया।

विनोद अग्निहोत्री : आपके प्रदेश अध्यक्ष भी नाराज थे। वे भी अपने विधायकों को नहीं रोक सके?

विधायकों को रोकने के लिए आपको उन्हें खनन के पट्टे देने होते। उन्हें जमीन पर अतिक्रमण और अवैध निर्माण करने देना होता। उनके क्रशर की अनुमति देनी होती। यह मैंने नहीं किया। लेकिन मैं एक बात कहना चाहता हूं कि मैंने वोट लूज नहीं किया। मेरी हार का यदि आप विश्लेषण करेंगे तो हम 2014 में जितने वोट से हारे थे, उससे दस फीसदी  वोट 2017 में बढ़ाए। 2012 में हम जितने से हारे थे, उसमें एक लाख 37 हजार वोट जोड़े। मगर हुआ यह कि यूकेडी, बसपा, सपा, निर्दलियों का सारा का सारा वोट भाजपा के खाते में जुड़ गया।

गुंजन कुमार : लेकिन हरिद्वार ग्रामीण में आप बसपा के वोट भाजपा को जाने से नहीं हारे। बसपा ने जितना वोट लिया, उतने से ही आप हारे?

वही मैं कह रहा हूं। आपने मेरी बात की पुष्टि कर दी। जहां-जहां बसपा का वोट हमारे लिए काउंटर प्रोडेक्टिव हो सकता था, वहां-वहां बसपा को वोट मिले। जहां-जहां बसपा के उम्मीदवार भाजपा के लिए काउंटर प्रोडेक्टिव हो सकते थे, वे सारे वोट गायब हो गए। यूकेडी के भी वोट हमारे लिए तीन सीट पर हार का कारण बने।

विनोद अग्निहोत्री : क्या ईवीएम का कोई खेल था?
बड़ी होशियारी के साथ सारे विपक्ष के वोट को एक जगह से उठाकर दूसरी जगह फिट कर दिया गया जैसा लगता है। इसलिए यह कहना कि किसी के जाने से कांग्रेस का वोट कम हुआ, यह गलत है। कांग्रेस जिस ग्रोथ से बढ़ रही थी, उसी ग्र्रोथ से बढ़ी। अन्य विपक्षी को पिछले चुनाव में मिला 11 फीसदी वोट खानपुर और हरिद्वार ग्रामीण को छोड़कर सीधे भाजपा को चला गया। किच्छा और काशीपुर में भी यही हुआ। जहां जितना वोट जाने से हम हार सकते थे, उतना ही गया। उनका कलकुलेशन बहुत स्ट्रॉन्ग था।
प्रेम भारद्वाज : मगर सरकार गिराने की पंरपरा तो कांग्रेस का इतिहास रहा है?

यह आरग्युमेंट हो सकता है। मगर यहां क्राइम हुआ है।

गुंजन कुमार : इस मामले में आप मीडिया को दोष दे रहे हैं लेकिन आबकारी सचिव पैसे लेकर आबकारी नीति बदलने का सौदा कर रहे थे?

वह स्टिंग आज भी वैरीफाइड नहीं है। सरकार गए आज सवा साल हो गया। मेरे स्टाफ से हटे मोहम्मद सादिक को तीन साल हो गया है। गुजरात सरकार में वे अभी हैं। भारत सरकार में भी रहे हैं। उस अधिकारी के खिलाफ जांच क्यों नहीं की गई। वह इसीलिए जांच नहीं की गई क्योंकि वह सही है ही नहीं। उसे सिर्फ मुझे बदनाम करने के लिए उठाया गया था। यदि वह केस सही होता तो क्या आपको लगता है कि बीजेपी उसे छोड़ती। जब तक वह मेरे साथ था, तो वह भ्रष्ट था। जब वह भारत सरकार चला गया तो ईमानदार हो गया। क्योंकि भाजपा के पास जो जाता है, उसे छूते ही वह पारस पत्थर बन जाता है।

गुंजन कुमार : आप इस अर्थिकी को समझा क्यां नहीं पाए?

मैंने बहुत समझाने का प्रयास किया। ब्रांड के स्वाद का जो लोगों को चस्का था, उस चस्के के आगे मैं लाचार हो गया। उनकी मजबूरी यह थी कि वे स्वाद नहीं छोड़ सकते थे। मेरी मजबूरी यह थी कि मैं चुनावी वर्ष में रिस्क नहीं ले सकता था। इसलिए मैंने वापस ले लिया।

गुंजन कुमार : कहीं ऐसा तो नहीं कि जिस उत्तराखण्ड में शराब बंदी का आंदोलन होता है वहां आप लोगों को शराब पिलाकर प्रदेश की इकोनॉमी बढ़ाना चाहते थे?

नहीं। मुझसे सूर्यवंशी और चंद्रवंशी दोनों नाराज हो गए। मैं 2002 में तीन-चार साल तक उत्तराखण्ड से बहुत गहराई में जुड़ा रहा। दिल्ली आने के बाद मेरे मन में वही 2003-04 वाला उत्तराखण्ड ‘आधी रोटी खाएंगे वाला था। मैं यह भूल गया कि अब का उत्तराखण्ड तीन पैग लगाने वाला भी है। मुझे इसका कोई मलाल नहीं है। मैंने प्रयास किया। लोगों ने स्वीकार नहीं किया तो मैं क्या कर सकता हूं। हमारा रास्ता गलत नहीं था। बिना उस रास्ते को अपनाए आप उत्तराखण्ड  को आगे नहीं ले जा सकते। मैंने भांग की खेती शुरू करवाई। भांग की खेती गेमचेंजर है। उसके लिए उत्तराखण्ड बहुत ही नेचुरल स्थान है। चीन भांग के रेशा और दाना दोनों का निर्यात करता है। मैंने एक्ट भी बना दिया। आज के मुख्यमंत्री को भी कहना पड़ा कि हम भांग की खेती को बढ़ावा देंगे।

अपूर्व जोशी : लेकिन जांच आयोग ने तो स्पष्ट लिखा है कि कृषि मंत्री ने अपने दायित्वों का निर्वाहन सही नहीं किया जो प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट के घेरे में आता है?

यदि रिपोर्ट में यह आता इसमें अपराध हुआ है। इसमें इतना कमीशन लिया गया है, तब तो त्रिवेंद्र सिंह फंसते। निदेशक के बारे में आप लिख रहे हो। सचिव को बरी कर दे रहे हो फिर मंत्री के मामले में आप संभवतः शब्द का इस्तेमाल लिखते हो। इसमें उन्होंने मुझे जांच अधिकारी बना दिया। मैं इस पर ज्यादा इसलिए नहीं कह रहा हूं कि विरोधियों के कहे जाने के कारण मुझे भी आनंद आ रहा है। नहीं तो यह भी कहा जाता कि रावत ने रावत की मदद की।

विनोद अग्निहोत्री : पर आप इसमें यह तो कर सकते थे कि किसी जांच एजेंसी को उसकी जांच सौंपते? चारा घोटाले में क्या हुआ। वे पैसा निकालने थोड़े न गए थे?

एक दिन चारा घोटाले का भी इतिहास लिखा जाएगा। यह सामने आएगा कि इस षड्यंत्र में कौन लोग शामिल थे। काम आज के लिए नहीं करना चाहिए। ढेंचा घोटाला तो कुंभ घोटाले के सामने कुछ है ही नहीं। उसमें तीस करोड़ रुपए का तो चूना ही आ गया था। कुंभ के दौरान दवाइयों में भारी घोटाला हुआ। उसमें बेलदारों को दोषी ठहरा कर मेलाधिकारी से ऊपर सभी को छोड़ दिया। फिर आप यह लिख दें कि सरकार चाहे तो मुख्यमंत्री के लिए इस एक्ट के तहत कार्यवाही कर सकती है। यह काहे का कमीशन है।

अपूर्व जोशी : मलतब जांच आयोग ब्यूरोक्रेट्स को बचा गए?

बिल्कुल, त्रिवेंद्र सिंह के खिलाफ एफआईआर भी करवाता तो कोर्ट में एक दिन भी नहीं ठहरती।

विनोद अग्निहोत्री : केदारनाथ घोटाले में क्या हुआ?

केदारनाथ घोटाले के मामले में देखें तो उत्तराखण्ड में भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आपदाएं आती रहेंगी। उसमें मुख्यमंत्री को आकस्मिक निर्णय लेने पड़ेंगे। मैं आज कह दूं कि हैलीकॉप्टर के रेट्स ज्यादा लगाए गए हैं तो यह उचित नहीं होगा। उस समय क्या परिस्थितियां थी, कैसे कह सकते हैं। कुछ दिन पहले धूमाकोट में कोई हैलीकॉप्टर जाने को तैयार ही नहीं हुआ। नहीं तो तीन जानें बचाई जाती। उस समय किन परिस्थितियों में हैलीकॉप्टर हायर किए गए। जब गया था तो कुछ नहीं था। आपदा के दौरान अधिकारी शव ढूंढ़ने गए। जहां कुछ नहीं था। उन्होंने पानी के बोतल में 200 रुपए खर्च किए या नहीं यह आज जांच करने बैठ जाऊं। सेना वहां काम करने गई। उन्होंने वहां मीट खाया। अब मैं कहूं कि मुख्यमंत्री दोषी है, उचित नहीं होगा। मुझे विजय बहुगुणा ने जो घाव दिया, वह कभी भरने वाला नहीं। मगर मुझे विजय बहुगुणा के तरीके से काम नहीं करना था। मुझे प्रदेश का भविष्य भी देखना था। आकस्मिक परिस्थितियों में मुख्यमंत्री को निर्णय लेने पड़ेंगे और निर्णय लेते समय उसके हाथ कांपने नहीं चाहिए, क्योंकि उन पर जिंदगियों को बचाने का दारोमदार होता है। मैंने वहां विषम परिस्थितियों में लोगों को काम पर लगाया। माइनस 6, माइनस 7 डिग्री पर काम करवाया। तभी तो काम हुआ। अब आज सामान्य स्थिति में उसका रेट देखने लगें तो यह व्यवहारिक नहीं होगा। इसलिए मैंने सभी अधिकारियों को कहा सभी फाइलें मेरे पास लाओ। मैंने अपने नाम पर काम करवाए। किसी अधिकारी पर कोई आरोप नहीं आना चाहिए। क्योंकि उन्होंने ऐतिहासिक काम किया है। इसके लिए सारा इल्जाम मुझे अपने सिर पर लेना पड़ता है तो मैं लूंगा। केदारनाथ आपदा में विजय बहुगुणा यदि दोषी हैं, तो सिर्फ इस चीज के कि वे शुरुआती कुछ दिन कोई निर्णय नहीं ले सके। मैंने राजनीतिक हित में नहीं, बल्कि राज्यहित में काम किया।

विनोद अग्निहोत्री : आपको लेकर उत्तराखण्ड के अन्य कांग्रेसी नेताओं में असुरक्षा की भावना है। यही हाल हरियाणा, राजस्थान से लेकर अन्य राज्यों में भी है। क्या पार्टी स्तर पर भी इसे नहीं सोचना चाहिए?
प्रेम भारद्वाज : उत्तराखण्ड की राजनीति में कई बार ऐसे पड़ाव आए, जब आप पर दबाव था कि आप नई पार्टी बना लें। मगर आपके भीतर भय था या क्या सोच थी कि आपने नई पार्टी नहीं बनाई?

यदि मुझे नई पार्टी बनानी होती तो 2002 में मेरे पास संख्या पूरी थी। मुझे किसी की मदद की जरूरत भी नहीं थी। प्रदेश का सेंटीमेंट मेरे साथ था। उस वक्त मैं नई पार्टी बनाता तो पूरी कांग्रेस और उत्तराखण्ड मेरे साथ होता। मेरे सामने मेरे लीडर का जजमेंट मायने रखता है। मैंने पीसीसी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की कही लेकिन मेरी लीडरशीप ने कहा नहीं तुम संगठन में काम करो। पूरे पांच साल तिवारी जी की सरकार मैंने अपने कंधों पर चलाई। साथ-साथ कांग्रेस को भी मरने नहीं दिया। यदि अंत में तिवारी जी सुसाइड बम का इस्तेमाल नहीं करते तो 2007 में भी हम सरकार बना लेते। मेरा स्पष्ट मानना है कि नेहरू-गांधी परिवार का मेरे साथ प्रेम न होता, सिर पर आशीर्वाद नहीं होता तो न मैं एमपी बन सकता था, न यहां तक पहुंच सकता। मैं यह मान कर चल रहा था देर मिले-सबेर मिले जो मां रोटी दे रही है उस मां को कैसे छोड़ दूं।

प्रेम भारद्वाज : यदि मां का प्रेम आपके साथ था तो 2012 में फिर मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया। आपके साथ अन्याय क्यों हुआ होगा?

मुझे मुख्यमंत्री नहीं बनाया तो केंद्र में मंत्री बनाया।

गुंजन कुमार : वह तो नाराजगी दूर करने के लिए बनाया?
नहीं।
प्रेम भारद्वाज : फिर प्रेम कहां है?

मैं अपने साइड के बारे में बता सकता हूं। में अच्छाइयां देखता हूं।

प्रेम भारद्वाज-आपने मां कहा, मगर आपके साथ जो हुआ, वह मां नहीं करती है?

नहीं। इंदिरा जी जब उत्तराखण्ड में प्रचार करने आई थी तो भतरौज खान में उन्होंने मुझे कहा था कि किसी से कहना मत तुम तैयारी करो। जबकि उस वक्त मैं कुछ नहीं था। जब मैं मां को मिलाने ले गया तो मेरी मां पहाड़ी में बोली थी, वे हिंदी में बोल रही थीं। मगर उन्होंने कम्युनिकेट कर दिया कि बेटे की चिंता मत करना। मैं इसका ख्याल रखूंगी।

प्रेम भारद्वाज : यह प्रेम नहीं दया है?

वह दया थी, प्रेम था या ममत्व मुझे नहीं पता। मगर 1980 में इंदिरा जी ने मुझे बहुत ज्यादा प्रभावित किया और प्रेम दिया। तभी मैं आज छोटे से घर से यहां तक पहुंचा हूं। मैं उस परिवार को नहीं छोड़ सकता। जिस दिन राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जाएंगे, उस दिन मैं अपनी शर्ट अपनी खूंटी में लटका दूंगा।

गुंजन कुमार : 2019 की तैयारी?
मुझे इस सूची की जानकारी नहीं है। मेरी जानकारी के मुताबिक लोकसभा टिकट का

बंटवारा कांग्रेस अध्यक्ष सीडब्ल्यूसी में बातचीत के बाद कर सकते हैं। जिसमें प्रदेश भी एक हिस्सा होता है। लेकिन मेरा लक्ष्य अब एमपी, मुख्यमंत्री बनना नहीं है। मेरा लक्ष्य है, एक बार राहुल गांधी जी को प्रधानमंत्री बनते देखना। जब तक वो प्रधानमंत्री नहीं बन जाते मैं तब तक एक युवा जोश की तरह इतना ही काम करता रहूंगा।

गुंजन कुमार : आपने अपनी सरकार गिराने के लिए मंत्रियों विट्टायकों को दोषी ठहरा दिया। मगर आपने आपने मंत्रियों को विभाग तो दिए थे उन्हें पावर नहीं दी। जैसे इंदिरा हृदयेश जी उद्योग मंत्री थीं मगर उनके पास खनन नहीं था। प्रीतम सिंह गृह मंत्री थे मगर वे एक इंस्पेक्टर का ट्रांस्फर नहीं कर सकते थे क्यों?

किसी भी राज्य में आईएएस, आईपीएस और लीगल मामले मुख्यमंत्री के पास रहते हैं। मैंने अपने पास कोई अतिरिक्त पावर नहीं रखी थी। दूसरा मैंने एक प्रेम भरे शख्स को दी जुबान के कारण पूरी लीडरशीप की खिलाफत के बावजूद इंदिरा जी को उद्योग दिया। मैं खनन अपने पास इसलिए रखना चाहता था ताकि उससे राज्य के लिए पैसा जनरेट कर सकें। जिस वक्त उद्योग उन्हें दिया गया, उस वक्त विभाग के पास खुद की 600-650 करोड़ की कैपिटल थी। वह समय हमारे राज्य की आर्थिकी स्थिति के हिसाब से यह बहुत क्रूसियल बजट था।

गुंजन कुमार : मगर इंदिरा जी तो कहती हैं कि उन्होंने आपको मुख्यमंत्री बनाया?

मुझे तो मालूम है कि मुझे राहुल गांधी जी ने मुख्यमंत्री बनाया।

गुंजन कुमार : आप जब मुख्यमंत्री बने तब डोईवाला सीट खाली थी। लेकिन आप वहां से चुनाव न लड़कर मुन्सयारी सीट खाली करा लड़े। कहीं हार का डर तो नहीं था?

उसके दो कारण थे। एक, मेरा धारचूला- मुन्सयारी से पुराना रिश्ता था। मैं कभी उस क्षेत्र से नहीं हारा। हमेशा जीतता रहा था। जब हरीश धामी ने इस्तीफा दे दिया। तब मैं उस पर बहुत गुस्सा भी हुआ था। बाद में मुझे यह लगा कि जिस क्षेत्र ने मुझे हमेशा आगे रखा, यदि मुख्यमंत्री रहते वहां का नेतृत्व करूंगा तो कुछ कर पाऊंगा। आज मुझे खुशी है कि मुन्स्यारी का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां सड़क नहीं बन रही है। सब जगह बिजली पहुंच गई। उनका जो कर्ज था, उसका कुछ अंश मैंने उतारने की कोशिश की। डोईवाला से मैं जीत के लिए श्योर था। हम डरे हुए सिर्फ सोमेश्वर में थे। वह इसलिए कि मोदी वेव में यदि हम तीनों सीट जीत सकें तो बहुत बड़ा काम होता। आप लोगों को याद होगा मोदी का रथ रोकने का पहला काम मैंने ही, वह तीनों सीट जीत कर किया था।

प्रेम भारद्वाज : आपका चिंतन कॉलम ‘दि संडे पोस्ट’ में हर हफ्ते छपता है। उसमें आपकी भाषा बहुत ही अच्छी है। मैं जानना चाहता हूं कि आप क्या पढ़ते हैं, क्योंकि आजकल के राजनेता किताब से दूर हो गए हैं?

मैं केवल भावना का साहित्यकार हूं। जो मेरी भावना कहती, उसे दिल, दिमाग से लिख फैक्ट्स को उसके साथ जोड़ता हूं। हर लिखने के बाद दो-रात पढ़ने में लगाता हूं। ताकि कोई आंकड़े गलत नहीं हो जाएं।

अपूर्व जोशी : किस साहित्यकार को आपने पढ़ा है?
जिस वक्त पढ़ने और समझने का समय था, उस वक्त तो मेरी किश्ती किसी और ही दिशा में चल पड़ी थी। उस वक्त हवा के झोंके में मैंने भी अपने को छोड़ दिया था। लेकिन मैंने कभी पढ़ना नहीं छोड़ा। मैंने प्रेमचंद को बहुत पढ़ा है। टॉलस्टॉय को भी पढ़ा है।

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