Country Uttarakhand

‘मेरे चेले वक्त आने पर मेरे गुरु बन जाते हैं’

महाराष्ट्र के मनोनीत राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी पर विशेष

उत्तराखण्ड के एक और सपूत राज्यपाल बनाये गए हैं। जाहिर है उनकी राजनीतिक विचारधारा से असहमति रखने वाले मुझ सरीखे कईयों को एक ठेठ पहाड़ी का राज्यपाल, वह भी महाराष्ट्र सरीखे महत्वपूर्ण राज्य का, बनने पर बेहद प्रसन्नता महसूस हुई। सोचा ‘भगत दा’ पर कुछ ऐसा लिखा जाए जो थोड़ा अलग सा हो। ऐसा जिससे उन्हें, उनकी राजनीति को और उनके ‘गधेरूपन’ को समझा जा सके।

भगतदा से पहली आत्मीय मुलाकात देहरादून में उनके सीएम काल में हुई। मैं अपने सहयोगी भवानी भट्ट जी संग उनके आवास पर पहुंचा। इधर-उधर की बातों के बाद भगत दा ने लंच के लिए आमंत्रित किया। नाना प्रकार के व्यंजन टेबिल पर सजे थे। मैं चूंकि खाने के मामले में जरा कंजरवेटिव हूं इसलिए मैंने भगतदा की मनपसंद खिचड़ी तरह हाथ बढ़ाया। ‘तुम भी खिचड़ी प्रेमी हो’, भगतदा ने प्रश्न किया। मेरी देखा-देखी भवानी भट्ट ने भी खिचड़ी पर डाका डालने की चेष्टा की तो तुरंत मुख्यमंत्री ने उन्हें डपट डाला ‘यार इतनी चीजें रखी हैं भवानी, तू मेरी खिचड़ी ही क्यों खाना चाहता है। भवानी बेचारे सकपका गए। खिचड़ी तो उन्हें मिली नहीं लेकिन फायदे में वे ही रहे। सीएम हाउस का लजीज खाना उनके हिस्से आया। इसके बाद जब कभी मैं कोश्यारी जी के यहां जाता तो खिचड़ी अवश्य मिलती।

भगतदा स्वयं को ‘गधेरू’ कहते हैं। खांटी संघी होने के चलते वे किसी भी प्रकार के आडंबर से कोसों दूर रहते हैं। सत्ता मिलने के बाद संघियों को मैंने ‘एलीट’ होते नजदीक से देखा है। हमारे कवि हृदय मानव संसाधन मंत्री डाॅ निशंक इसका उदाहरण हैं। भगतदा लेकिन इन सबसे दूर हैं। उनकी सादगी उनका आभूषण है। लेकिन वे भले ही निजी जीवन में ‘गधेरू’ हों, राजनीति के शातिर खिलाड़ी हैं।

इसका एक उदाहरण 2011 का है, जिसका मैं गवाह हूं। उत्तराखण्ड में डाॅ निशंक की सरकार भ्रष्टाचार के आरोपों चलते बेहद विवादित हो चुकी थी। उनको हटाने का मन भाजपा आलाकमान लगभग बना चुका था। उनकी जगह किसे सत्ता सौंपी जाए इस पर पेंच फंसा था। दोनों पूर्व सीएम कोश्यारी और खण्डूड़ी मैदान में थे। मेरे प्रगाढ़ मित्र अनंत कुमार तब भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और संसदीय बोर्ड के सचिव हुआ करते थे। उन्होंने एक दिन मुझसे कोश्यारी जी के मन की थाह लेने को कहा। मैं दो-तीन दिन लगातार कोश्यारी जी के घर पहुंच उनसे इधर-उधर की बातें करने लगा। एक दिन खिचड़ी खाते समय भगत दा ने अचानक पूछ डाला। ‘तू आज कर रोज आ रहा है, क्या बात है।’ मैं सकपकाया ‘कुछ नहीं भगतदा, खिचड़ी खाने आ जाता हूं।’ भगतदा तुरंत डपटते हुए बोले’ यार अपूर्व झूठ मत बोल, खिचड़ी तो अपने घर में भी खा सकता है।’ फिर कुछ देर बात डायरेक्ट मुद्दे पर आ गए। ‘हमारे संसदीय बोर्ड के सचिव संग तुम्हारी गहरी दोस्ती है। लगता हैं अनंत कुमार के कहने पर तू यहां आ रहा है।’ मैं सकपकाया, फिर पूछा ‘आप क्या चाहते हैं। यदि डाॅ ़ निशंक हटते हैं तो क्या आप खण्डूड़ी जी को स्वीकारेंगे?’ भगतदा का उत्तर बेहद डिप्लोमेटिक था। पहले तो बोले ‘हम दोनों ने एक साथ जाकर पार्टी नेतृत्व को अपनी बात कह डाली है। जो निर्णय होगा हमें मान्य होगा।’ फिर कुछ देर बाद भगतदा ने पार्टी के लिए किए अपने संघर्ष पर बोलना शुरू कर दिया। मैं समझ गया कि वे न कहते हुए भी क्या कहना चाहते हैं।

 

 

उनके राज्यसभा के दिनों में शायद 2018, में एक दिन मैं उनसे उनके सरकारी आवास में गपिया रहा था। प्रदेश में भाजपा सरकार बन चुकी थी और कोश्यारी जी के राजनीतिक शिष्य कहे जाने वाले त्रिवेंद्र रावत सीएम तो दूसरे शिष्य प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे। आज भी हैं। मैंने उन्हें उकसाने की नीयत से कहा ‘आपके दोनों शिष्य इस समय खासे पावरफुल हैं। सरकार और संगठन तो बैकडोर से आप ही चला रहे हैं।’ मेरे उकसाने का नतीजा तुरंत सामने था। भगतदा जब खुश होते हैं या किसी से अपनत्व में बाते करते हैं तो तू कह संबोधित करते हैं। गुस्से में, या उखड़े मिजाज में होते है तो ‘आप’ या ‘तुम’ या फिर अंग्रेजी में बोलने लगते हैं। उन्होंने तुरंत जवाब दिया ‘अपूर्व जी वक्त बदलने के साथ मेरे शिष्य भी मेरे गुरु बन जाते हैं।’

उनका मुझे अपूर्व जी कहना स्पष्ट संकेत था कि दोनों शिष्य शक्कर बन चुके हैं, गुरु गुड़ ही रह गए हैं।

बहरहाल जितना मैंने भगत सिंह कोश्यारी को समझा है, निजी जीवन में वे बेहद सादगी पसंद हैं, ‘गधेरू’ है लेकिन राजनीति के हर पैंतरे के मास्टर हैं। ऐसा व्यक्ति यदि महाराष्ट्र जैसे राज्य का महामहिम बना है तो निश्चित ही महाराष्ट्र को इसका बड़ा लाभ मिलना तय है। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में बेदाग रहे कोश्यारी रबर स्टैंप राज्यपाल होने से रहे। हां इतना अवश्य है कि अनावश्यक हस्तक्षेप भी वे करने वाले गवर्नर नहीं साबित होंगे।

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