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‘मुस्लिम महिलाएं अब किसी बंधन में नहीं’

संसद में तीन तलाक को लेकर चली बहस में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान का खासतौर पर उल्लेख हुआ। केंद्र में नागरिक उड्यन, ऊर्जा जैसे महत्वपूर्ण विभागों का दायित्व संभाल चुके आरिफ मोहम्मद खान तीन तलाक के खिलाफ हमेशा मुखर रहे हैं। इसके लिए वे अपनी पार्टी कांग्रेस के दबाव में भी नहीं आए। धार्मिक विचारों में शुद्धता के जबर्दस्त पैरोकार रहे आरिफ मोहम्मद खान से तीन तलाक संबंधी विधयेक पारित होने पर कुमार गुंजन की विशेष बातचीत :

 

राज्यसभा से पास होने के बाद तीन तलाक अब गैरकानूनी हो गया है। क्या यह आपकी जीत है?
यहां जीत-हार की कोई बात नहीं है। यह लाखों-करोड़ों मुस्लिम महिलाओं की आजादी है। तलाक ए विद्दत कभी जायज नहीं रहा है। अब मुस्लिम महिलाएं किसी बंधन में नहीं हैं।

क्या कानून बनने के बाद मुस्लिम महिलाओं की सभी समस्याएं दूर हो गई?
नहीं, लेकिन यह शुरुआत है। मुस्लिम महिलाएं भविष्य में आगे ही बढ़ेंगी। उनका हौसला बढ़ा है। यह बहुत जरूरी था।

पिछले दिनों प्रधानमंत्री मोदी ने संसद में एक बयान दिया और आप राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गए थे। उस बयान के पीछे का परिदृश्य क्या था?
1986 में राजीव गांधी की सरकार थी। सुप्रीम कोर्ट से शाहबानो पर फैसला आ चुका था। उस सरकार में बतौर केंद्रीय मंत्री मैंने संसद में उस फैसले का स्वागत किया। लेकिन कुछ समय बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दबाव में सरकार ने संसद में यह मान लिया कि वह इस फैसले के विरोध में बिल लाएगी। जब यह बात मुझे पता चली मैंने एक इस्तीफा लिखा और उसे देकर मैं अपने दोस्त के घर चला गया। मुझे बुलाया गया। मुझ पर इस्तीफा वापस लेने का दबाव बनाया गया। सबसे पहले अरुण नेहरू ने समझाया, जब मैं नहीं माना तो अंत में मेरे पास नरसिम्हा राव जी आये और समझाने के क्रम में उन्होंने मुझसे एक बात कही कि अगर यह समाज (मुस्लिम) गटर में रहना चाहता है, तो उसे रहने दो हम राजनेता हैं, समाज सेवी नहीं। मैंने उनकी बात नहीं मानी और मैं वहां से चला आया। उसके बाद मैंने कई दफा इस बात का जिक्र किया है, लेकिन उस वक्त तक कोई इसकी सुध नहीं ले रहा था। अब चूंकि प्रधानमंत्री ने ये बात कही तो यह आज राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। लेकिन मैं तब भी अपनी सोच पर कायम था और आज भी मानता हूं कि तीन तलाक गलत है। शाहबानो केस को विधेयक लाकर पलटना एक गलत कदम था।

क्या अल्पसंख्यक तुष्टिकरण इस देश की राजनीतिक पार्टियों की परंपरा का हिस्सा हो गया है?
तुष्टीकरण तो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हो रहा है, मुस्लिम समाज का नहीं। मैं आपको इसकी मिसाल दे सकता हूं। शाहबानो के फौरन बाद सलमान रुश्दी की किताब ‘सैटेनिक वर्सेस’ को शहाबुद्दीन के खत पर प्रधानमंत्री ने अगले ही दिन बैन कर दिया। न प्रधानमंत्री ने किताब पढ़ी थी और न ही शहाबुद्दीन ने। बैन का अर्थ है, किताब में कुछ ऐसा लिखा है जो पढ़ने देना नहीं चाहिए। ढाई महीने के बाद मैं खान मार्केट की किताब की दुकान पर गया। मैंने दुकानदार से पूछा कि अब तो यह किताब होगी नहीं, क्योंकि भारत वह पहला देश था जिसने इस किताब को बैन किया। मैंने उनसे पूछा कि क्या यह किताब उपलब्ध है? तो उस दुकानदार ने कहा कि आप जितना चाहो उतनी मिलेगी, तो मैंने कहा यह तो बैन है। उसने कहा कि साहब बैन से पहले तो मैंने 7 कॉपी बेची थीं बैन के बाद मैंने 10 हजार कॉपियां बेची हैं। अब इसका आप क्या मतलब लेते हैं? मैंने अगले दिन पार्लियामेंट में एक सवाल डाला। संसदीय प्रश्न के तौर पर मेरा सवाल था, ‘सैटेनिक वर्सेज’ पर कब और कितनी तारीख को प्रतिबंध लगाया गया? और इसकी कितनी प्रतियां जब्त की गई? जवाब आया कि फलां तारीख को प्रतिबंध लगाया गया और एक भी कॉपी जब्त नहीं की गई। अब आप बताइए किसका तुष्टिकरण इसे मानेंगे। यह पूरी तरह से धोखा है। अब सच्चर कमेटी की बात करते हैं। सच्चर कमेटी के अनुसार बंगाल में सबसे ज्यादा मुसलमानों की स्थिति खराब है। जहां तक गुजरात की बात है, वहां सालों से बीजेपी की सरकार चल रही है। पूरे देश में मुसलमानों के सबसे सही और सबसे अच्छे आंकड़े वहीं हैं। यह फाइंडिंग सच्चर कमेटी की है। लेकिन अफसोस यह है कि कोई इसकी बात नहीं करता है।

गृह मंत्री ने कश्मीर से लौटने के बाद धारा 370 खत्म करने की बात कही। यह कितना कश्मीर के हक में है?
यह अच्छी बात है, वह देश के गृह मंत्री हैं। उन्हें जरुर वहां जाना चाहिए। हालात को काबू करने के लिए जरुरी कदम भी उठाना चाहिए। जहां तक कश्मीर समस्या के हल की बात है वह इंसानियत के दायरे में होना चाहिए। मैं तो यह कहता हूं कि कश्मीरी खुद आगे आएं और लीड करें, समाज को। खुद नेता बनें। खुद अपनी समस्या को खोजें और उसे हल करें। जहां तक धारा 370 का सवाल है, मैं यह खुलकर हमेशा कश्मीरियों से कहता हूं कि यह तुम्हारे हक में नहीं है। यह धारा सिर्फ कश्मीर के राजनीतिक और ब्यूरोक्रेटिक इस्टैब्लिशमेंट की रक्षा करती है। यह आम आदमी की रक्षा नहीं करती। अगर 370 ना होती और 1952 के इलेक्शन में उम्मीदवार को सेंट्रल इलेक्शन कमिशन से मिलने का हक होता तो इससे बेईमानी की परंपरा नहीं पड़ी होती। तब यह समस्या पैदा भी न हुई होती। धारा 370 तुम्हारी समस्याओं का हल नहीं है। मैं तो कहता हूं इसी से तुम्हारी समस्याएं पैदा हुई हैं न कि यह तुम्हें सुरक्षा प्रदान करती है। लेकिन इन सब चीजों के लिए एक बड़े पैमाने पर जागरूकता पैदा करनी होगी, क्योंकि उनके दिमाग में भारत के खिलाफ इतनी गंदगी भर दी गई है कि वह सही और गलत समझ ही नहीं पा रहे हैं।

विपक्ष का कहना है, बीजेपी की राजनीति एंटी मुस्लिम पिलर पर टिकी है। क्या यह सही है?
देखिए, हमारे यहां नागरिक है ही नहीं। हमारे यहां हमेशा समुदाय की बात होती है। इसके पीछे का कारण भी साफ है। हमें किसी को अपना दुश्मन तो बनाना होगा। ताकि उस समुदाय का डर दिखाकर दूसरे समुदाय से अपनी बात मनवाई जाए। कुछ इसी तरह का काम आज की राजनीतिक पार्टियां कर रही हैं। जहां तक आपका प्रश्न है, यह सीधे तौर पर विपक्ष के द्वारा भय पैदा किया गया है। उन्होंने बीजेपी का डर दिखाकर के लोगों को भड़काया हुआ है।

कश्मीर समस्या की बुनियाद क्या है? यह इतने सालों से हल क्यों नहीं हो रही?
पाकिस्तान बांग्लादेश को भूलने को तैयार नहीं है। साथ ही उन्हें एहसास हो गया कि हम जंग के मैदान में हिंदुस्तान से नहीं लड़ सकते। उन्होंने इसलिए गुरिल्ला युद्ध की नीति बनाई। आज उसको टेररिज्म कहा जाता है। यह पाकिस्तान की आधिकारिक नीति है। जिसे ‘जिया उल हक’ ने मिलिट्री बेस में एलान किया था और यह बात सार्वजनिक भी हो गई थी। उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान के इतने जख्म लगाने हैं कि वह घुट-घुटकर मरे। क्योंकि वे जानते थे कि अब आर्मी से लड़ाई नहीं हो सकती तो उन्होंने पहले भी यही किया था और वह अभी भी कर रहे हैं। इसलिए मेरा यह मानना है कि यह विषय गंभीर है। यह समस्या अंदर से नहीं बाहर से है। इसलिए नियंत्रण करने के लिए केंद्र का प्रभावी हस्तक्षेप लाना ही होगा। ताकि वह बाहर से आने वाले अतिक्रमण को रोकने के साथ ही अपने लोगों का विश्वास भी जीत सके। जैसे ही पाकिस्तान की उपस्थिति कश्मीर में कम होगी मुझे लगता है कि यह दो-तीन साल का मसला है जल्द ही हल हो जाएगा।

देश के कई हिस्सों में मॉब लिंचिंग की शिकायतें आई हैं। कुछ बुद्धिजीवी इसके लिए बीजेपी की विचारधारा को दोषी मान रहे हैं। यह कहां तक सही है?
शम्सुर रहमान फारुकी जो एडिशनल सेक्रेटरी थे भारत सरकार में उन्होंने एक लेख लिखा था। जब गोरखपुर में उनके पिता जो स्कूल ऑफ इंस्पेक्टर थे, वह जांच करने गए थे। वहां एक गाय का बच्चा जो मरा नहीं था लेकिन उसे मरा हुआ समझकर वहां के लोगों ने उन्हें बहुत मारा। बाद में उन्हें मरा हुआ समझ कर छोड़कर चले गए। अब आप सोचिए। उनके ससुर एमएलए थे। उन्होंने अपनी ही पार्टी के मंत्री को खत लिखा कि उनके दामाद को फील्ड से हटाकर ऑफिस की ड्यूटी दे दी जाए, लेकिन जवाब में किसी ने एक हमदर्दी का खत भी नहीं लिखा। उस समय तो बीजेपी नहीं थी। पावर में कांग्रेस थी। इसका मतलब यह नहीं है कि जो आज हो रहा है मैं उसका बचाव कर रहा हूं। जो आज हो रहा है वह भी गलत है और जो कल हुआ वह भी गलत था। मैं यह घटना 86 में देख रहा था। और सोच रहा था कि कांग्रेस देश को फिर से 1947 में ढकेल चुकी है। इसलिए मुझे यह कहने का अधिकार है कि आप आज परेशान हो लेकिन मैं 1986 से परेशान हूं।

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