देश के दो बड़े राजनीतिक दलों (भाजपा और कांग्रेस) के मुखिया (प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी) अब खुलकर एक-दूसरे के सामने हैं। एक के पास दशकों पुराना राजनीतिक अनुभव है तो दूसरा बाप-दादा के समय से राजनीतिक माहौल में पला-बढ़ा। दोनों दलों में समानता सिर्फ इतनी है कि दोनों ही हाईटेक अन्दाज से चुनाव मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। इसके अतिरिक्त यदि इस बार के लोकसभा चुनाव में कुछ नयापन खोज रहे हैं तो  भूल जाइए। कुछ भी नया नहीं है। वही पुराना झूठ का झुनझुना सभी बजा रहे हैं। विगत चुनाव के विश्लेषण के आधार पर ही गुणा-भाग किया जा रहा है। यानी इस बार भी वही जीतेगा जो देश की जनता को ज्यादा से ज्यादा मूर्ख बनाने में सफल होगा। 
बात यदि भाजपा की करें तो जनता को इस बात का बेसब्री से इंतजार है कि भाजपा इस बार कौन सा शगूफा छोड़ने वाली है। जहां तक पूर्व में किए गए वायदों को दोहराए जाने की बात है तो यह बात भाजपा भी अच्छी तरह से जानती है कि इस बार पुराने वायदों के आधार पर जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। वैसे भी एससी/एसटी एक्ट को लेकर देश का सवर्ण भाजपा से बेहद नाराज है। रही बात दलितों के भाजपा के पक्ष में जाने की तो इस एक्ट के बावजूद अधिकांश दलित बसपा के साथ ही खड़ा नजर आ रहा है। यह स्थिति अभी की नहीं अपितु पिछले लोकसभा चुनाव में भी देखने को मिल चुकी है। पिछले लोकसभा चुनाव में देश में मोदी ब्राण्ड खूब चला, हालांकि विगत लोकसभा चुनाव में बसपा का सूपड़ा साफ हो गया था लेकिन बात यदि वोट प्रतिशत की हो तो बसपा के दलित वोट प्रतिशत को भाजपाई रत्ती भर नहीं हिला पाए।
पिछला चुनाव पूरी तरह से हिन्दू बनाम मुस्लिम के आधार पर लड़ा गया था जिसमें यदि किसी को कोई नुकसान हुआ था तो वह सपा को हुआ था। बसपा 19 प्रतिशत से भी अधिक मत लेकर लोकसभा की 80 सीटों (उत्तर-प्रदेश) में से 34 सीटों पर दूसरे नम्बर पर रही थी। यानी लगभग 45 प्रतिशत सीटों पर उसने भाजपा प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दी थी
लिहाजा इस बार भी यूपी में बसपा की भूमिका और उसकी दावेेदारी को किसी भी तरह से नजरअन्दाज नहीं किया जा सकता। बसपाई तो यहां तक कह रहे हैं कि यदि ऐन वक्त पर पार्टी के विभीषण दूसरे खेमों में न जाते और पार्टी पूरी तरह से अपने दलित एजेण्डे पर ही काम करती तो निश्चित तौर पर मोदी लहर के बावजूद बसपा मजबूत स्थिति में नजर आती। कम से कम दो दर्जन सीटें जीतने से उसे कोई नहीं रोक सकता था।
इस बार बसपा कोई गलती नहीं दोहराना चाहती, वह जल्द ही पूरी तैयारी के साथ हाईटेक अन्दाज में मैदान पर नजर आयेगी। बसपा का फोकस इस बार पूरी तरह से दलित एजेण्डे पर ही केन्द्रित रहेगा। ऐसा नहीं है कि उसने सोशल इंजीनियिरिंग को अलविदा कह दिया हो लेकिन एससी/एसटी कानून के सहारे भाजपा की रणनीति को देखते हुए उसने ज्यादातर ध्यान अपने परम्परागत दलित वोट बैंक पर ही केन्द्रित कर रखा है। दूसरी ओर भाजपा खेमे में बेचैनी साफ देखी जा रही है। यह बेचैनी मुद्दों को लेकर है। हालांकि उसने एससी/एसटी एक्ट का शिगूफा छोड़ दिया है लेकिन यह एक्ट भाजपा को राहत देता प्रतीत नहीं होता। सिर्फ दलितों के सहारे लोकसभा चुनाव नहीं जीता जा सकता, यह बात भाजपा हाई कमान भी अच्छी तरह से जानता है। यही वजह है कि उसने यूपी मंत्रिमण्डल में ही नहीं बल्कि चुनाव की कमान संभालने वालों में भी व्यापक स्तर पर फेर-बदल की तैयारी शुरु कर दी है। कमान भाजपा के विवादित नेता सुनील बंसल के हाथों में है जो हाई कमान के निर्देश पर फैसला सुनाने वाले हैं। बात यदि सुनील बंसल की चली है तो यह भी जान लीजिए कि भले ही आम जनता के बीच सुनील बंसल की कोई हैसियत न हो लेकिन यूपी भाजपा में सुनील बंसल की हैसियत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही दोनों उप मुख्यमंत्रियों से भी अधिक है। हाई कमान को पूरा भरोसा है कि सुनील बंसल यूपी की 80 सीटों को लेकर जो रणनीति तैयार करेंगे वह फूलप्रूफ होगी। सुनील बंसल की रणनीति क्या गुल खिलाती है यह तो चुनाव परिणाम के बाद ही नजर आयेगा लेकिन जहां तक यूपी की 80 सीटों पर चुनौती की बात है तो भाजपा को इस बार चैतरफा चुनौती मिलने वाली है।
बसपा के बाद तीसरी चुनौती कांग्रेस की तरफ से भी मिलनी तय है। उत्तर प्रदेेश में कांग्रेस की शक्ति पिछले लगभग तीन दशकों के दौरान भले ही क्षीण होती गयी हो लेकिन आज भी वह लोकसभा चुनाव को प्रभावित करने की हैसियत रखती है। गांव-देहात से लेकर शहरों तक कांग्रेस को जानने और समझने वालों की बड़ी तादाद है, बस इंतजार है तो किसी ऐसे योग्य प्रभारी और प्रदेश अध्यक्ष का जो यूपी की जनता के बीच कांग्रेसियों के विश्वास को स्थापित कर सके। विगत लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 7.5 प्रतिशत वोट मिला था जिसके आधार पर उसने दो सीटों पर कब्जा किया था, इस बार इसी वोट प्रतिशत को बढ़ाना उसके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।
साम्प्रदायिकता का माहौल बनाकर चुनाव जीतने की कला सिर्फ भाजपा में ही नहीं बल्कि सपा में भी खूब रची-बसी है। लिहाजा सपा भी भाजपा के समक्ष चुनौती के रूप में मौजूद है। सपा खांटी मुस्लिम तुष्टिकरण वाली पार्टी मानी जाती है। देश की लगभग 20 प्रतिशत मुस्लिम आबादी पर उसे पूरा भरोसा है। यूपी में वैसे भी चुनाव जाति और धर्म के आधार पर लड़ा जाता रहा है। सपा से मुसलमानों का लगाव आज भी बरकरार है। भले ही सपा में दो टुकड़े (शिवपाल यादव द्वारा अलग दल बनाए जाने के बाद) हो गए हों लेकिन बात जब मुसलमानों के वोट देने की आयेगी तो निश्चित तौर पर अधिकतर वोट सपा की झोली में ही जाने वाला है। रही बात शिवपाल यादव की तो देश की राजनीति का इतिहास गवाह है कि जिस किसी नेता ने पार्टी से अलग हटकर दूसरी पार्टी बनाकर अपना भविष्य बनाना चाहा है उसका राजनीतिक कैरियर ही दांव पर लग गया है। अंततः उसे देर-सबेर वापसी करनी ही पड़ी है।
चैतरफा संघर्ष की संभावना विगत लोकसभा चुनाव के आधार पर ही कही जा रही है। यदि मौजूदा राजनीतिक हालात और विगत लोकसभा चुनाव 2014  के परिणाम का विश्लेषण करें तो 2019 कैसा होगा और उत्तर प्रदेश किसके साथ रहेगा इसका एक खाखा उभर कर सामने आ जाता है। वर्ष 2014 में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में से 42.03 मत प्रतिशत के साथ 71 सीटें भाजपा ने जीती थीं। मुकाबले में प्रमुख पार्टी सपा 22.20 प्रतिशत मत पाकर मात्र 5 सीटें  ही जीत पायी थी जबकि बसपा 19.60 प्रतिशत मत पाकर भी खाता नहीं खोल पाई थी। रही बात कांग्रेस की तो उसने 7.5 प्रतिशत मतों के साथ 2 सीट जीतने में सफलता हासिल की थी।
पिछले चुनाव में सपा 22 प्रतिशत वोट पाकर 31 स्थानों पर दूसरे नम्बर पर रही थी जबकि बसपा को सीट भले ही न मिली हों लेकिन 19 प्रतिशत वोट पाकर वह 34 सीटों पर दूसरे नंबर पर रही। यदि सिर्फ इन्हीं दोनों दलों के दूसरे स्थान को ध्यान में रखकर गणित लगायी जाए तो लगभग पांच दर्जन सीटें ऐसी हैं जो सपा-बसपा गठबंधन आसानी से जीत सकता है बशर्ते ऐन चुनाव के वक्त सीट बंटवारे को लेकर नोकझोंक न हो।
फिलहाल इस बार का लोकसभा चुनाव निश्चित तौर पर दिलचस्प होने वाला है। पिछली बार अकेले दम पर 71 सीटों पर कब्जा जमाने वाली भाजपा की स्थिति भी इस बार स्पष्ट नहीं है।

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