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मुलायम के समधी पर गाज

लखनऊ। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के समधी अरविन्द सिंह बिष्ट। ये एक ऐसा नाम है जो पूर्ववर्ती मुलायम सिंह यादव और अखिलेश सरकार के कार्यकाल में हठधर्मिता और गुण्डई का पर्याय बना रहा। इस शख्स की गुण्डई का यह आलम था कि इसने सूचना आयुक्त के पद पर रहते हुए अनेको बार अपने सरकारी गनर की मदद से सूचना मांगने वाले आरटीआई एक्टिविस्टों को न सिर्फ धमकाया बल्कि कक्ष मंे ही मारापीटा भी। वैसे तो कई आरटीआई एक्टिविस्ट श्री बिष्ट की गुण्डई का शिकार होने के बावजूद उसकी राजनीतिक हैसियत से वाकिफ होने के कारण चुप्पी साधकर बैठ गए लेकिन तनवीर अहमद नाम के आरटीआई एक्टिविष्ट ने श्री बिष्ट को सबक सिखाने की ठानी। पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार के कार्यकाल में श्री अहमद ने श्री बिष्ट के खिलाफ तमाम शिकायतें दर्ज करवायीं लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली सपा को तनवीर अहमद का दर्द इसलिए नहं दिखा क्यों कि तनवीर अहमद ने मुलायम के समधी के खिलाफ कार्रवाई किए जाने की मांग रखी थी।
सूबे की सत्ता बदली तो तनवीर को श्री बिष्ट के खिलाफ कार्रवाई की आस जगी और जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सत्ता संभालते ही यह दावा किया कि पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में किए गए भ्रष्टाचार और आपराधिक मामलों में शामिल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की जायेगी तो श्री अहमद को न्याय की आस जगी लेकिन हद तब हो गयी जब श्री बिष्ट के खिलाफ कार्रवाई के बाबत तमाम शिकायती पत्र दिए जाने के बावजूद मामले को टाला जाता रहा। अंततः थकहार कर तनवीर ने न्यायपालिका का सहारा लिया। देर से ही सही न्यायपालिका की तरफ श्री अहमद को न्याय मिलने की किरण जगी है। आज दिनांक 27 दिसम्बर 2018 को यूपी हाई कोर्ट ने मुलायम के समधी व सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह बिष्ट के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति करने के साथ ही मामले को सुरक्षित कर लिया है।
Arvind singh Bisht

हाई कोर्ट द्वारा मामले को सुरक्षित कर लिए जाने के बाद से समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के समधी और यूपी के राज्य सूचना आयुक्त अरविन्द सिंह बिष्ट परेशानी में फंसते नजर आ रहे हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ ने श्री बिष्ट के खिलाफ अभियोजन को स्वीकृति किए जाने की मांग वाली याचिका पर सभी पक्षों की बहस पूर्ण हो जाने के बाद अपना निर्णय सुरक्षित कर लिया है।

राजधानी लखनऊ के समाजसेवी और आरटीआई एक्टिविस्ट तनवीर अहमद सिद्दीकी ने यह याचिका उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक सुधार विभाग आदि के खिलाफ दायर की थी जिस पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार अरोरा और आलोक माथुर की दो सदस्यीय पीठ ने बीती 17 दिसम्बर को निर्णय सुरक्षित करने का आदेश पारित किया था। मामले में याची तनवीर की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता चन्द्र भूषण पाण्डेय, पंकज तिवारी और शैलेन्द्र कुमार शुक्ल द्वारा पक्ष रखा गया। राज्य सरकार की तरफ से मुख्य स्थाई अधिवक्ता और सूचना आयुक्त बिष्ट की तरफ से अधिवक्ता शिखर आनंद ने अपना पक्ष रखा।
तनवीर ने बताया कि पूर्व में सूचना आयुक्त बिष्ट ने उनके साथ बदसलूकी की थी जिसकी शिकायत थाने और एसएसपी से करने पर भी बिष्ट के खिलाफ एफआईआर नहीं लिखी गई। जब तनवीर ने मामले की शिकायत लखनऊ के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायलय में की तो न्यायालय ने अवधारित किया कि बिष्ट एक लोकसेवक हैं इसीलिये उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने से पूर्व शासन से अभियोजन की स्वीकृति आवश्यक है। तनवीर ने योगी सरकार को कई पत्र भेजकर सूचना आयुक्त बिष्ट के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति निर्गत करने का अनुरोध किया लेकिन योगी सरकार भी मुलायम के समधी को बचाती रही और हारकर तनवीर को हाई कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए बाध्य होना पड़ा। अपने मामले को नियमसंगत और सच्चा बताते हुए तनवीर ने बताया कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि उन्हें हाई कोर्ट से अवश्य ही न्याय मिलेगा।

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