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बहुजन समाज पार्टी के मजबूत वोट बैंक का कांग्रेस सहित सभी विपक्षी पार्टियों को अहसास है। यही वजह है कि मायावती के बिना मोदी विरोधी महागठबंधन की कल्पना नहीं की जा सकती। सच तो यह है कि 2019 के लिए मायावती सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। प्रबल संभावना है कि चुनाव बाद महागठबंधन का नेतृत्व वे ही करेंगी
लोकसभा में शून्य। राज्यसभा में चार सांसद। यूपी विधानसभा में मात्र 19 विधायक। यह सदन में बसपा की तस्वीर है। देश भर खासकर उत्तर भारत के राज्यों में दलित राजनीति की अगुवा बसपा के लिए यह तस्वीर चिंतित करने वाली है। हालांकि बसपा का बेस वोट बहुत ज्यादा खिसका नहीं है। फिर भी उसे पिछले आम चुनाव और विधानसभा चुनावों में बुरी हार का सामना करना पड़ा। अब बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी पार्टी को पुराने रंग में लाने के लिए बड़ा लक्ष्य रखा है। इसलिए वह अपनी सेना को मजबूत कर रही हैं। बहनजी ताकतवर दुश्मन (भाजपा) को हराने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करने की रणनीति पर भी काम कर रही हैं। वे दिल्ली में डटी हुई हैं। वह भी पूरे एक्शन मोड में।
चौदह गुरुद्वारा रकाबगंज रोड नई दिल्ली। लुटियन दिल्ली में यह बंगला दलित राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है। कुछ समय पहले तक यह जमावड़ा 11 माल रोड लखनऊ में लगा करता था। माल रोड के इस बंगले के आसपास का क्षेत्र नीले बैनर, पोस्टरों से पटा रहता था। हालांकि दिल्ली में बैनरों और पोस्टरों की वैसी स्थिति नहीं है। हां, यहां बंगले की दीवारों पर दो-चार नीले बैनर और पोस्टर अवश्य हैं। जिनमें बसपा सुप्रीमो मायावाती की बड़ी- बड़ी तस्वीर होती हैं। अमूमन शांत रहने वाली गुरुद्वारा रकाबगंज की यह सड़क हाल में तीन अगस्त को कई एसयूवी गाड़ियों से भरी हुई थी। उस दिन मायावती ने लखनऊ, आगरा, अलीगढ़, झांसी, चित्रकूट मंडलों की समीक्षा बैठक बुलाई थी। इसमें इन मंडलों के जिलास्तर तक के पदाधिकारी शामिल हुए। अब तो लगभग रोज ही मायावती मंडलों और पार्टी पदाधिकारियों की बैठक कर संगठन को मजबूत कर रही हैं। यहीं से वे राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में होने वाले चुनाव की भी तैयारी कर रही हैं। इन प्रदेशों के पदाधिकारी भी पार्टी सुप्रीमो के साथ यहां बैठक कर रहे हैं।
समीक्षा बैठक में मायावती ने पार्टी संगठन के ढांचे में बदलाव करने के भी निर्देश दिए हैं। वह पार्टी से सभी वर्गों को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। मायावती ने मंडलीय बैठकों में निर्देश दिए हैं कि हर जिले में 23 सदस्यों की बूथ कमेटियां जल्द बनाएं। इसमें एक अध्यक्ष, महामंत्री और कोषाध्यक्ष होंगे। कमेटी में सभी वर्गों को भागीदारी देने को कहा गया है। उसमें भी आधे युवाओं को जगह देने के निर्देश हैं। पिछले चुनाव तक पांच सदस्यों की बूथ कमेटियां होती थी। इसी तरह जिला कॉर्डिनेटर के स्थान पर अब सेक्टर स्तर के प्रभारी बनाए जा रहे हैं। जिलों की वोटर संख्या के आधार पर सेक्टर प्रभारियों की तैनाती की जाएगी। एक प्रभारी को चार से पांच सेक्टरों की जिम्मेदारी मिल रही है। ज्यादातर जिलों में 40 से ज्यादा सेक्टर प्रभारी बनाए जा रहे हैं। मायावती अब तक लखनऊ, आगरा, अलीगढ़, झांसी, चित्रकूट, मिर्जापुर, मेरठ, सहारनपुर आदि मंडलों की अलग-अलग  बैठकें कर चुकी हैं। पहले मंडलीय बैठकें राष्ट्रीय कॉर्डिनेटर लेते थे। मायावती 2019 के मदद्ेनजर पूरे उत्तर भारत में बसपा को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इसलिए उन्होंने पहली बार राष्ट्रीय कॉर्डिनेटर का पद बनाकर यह जिम्मा वीर सिंह और जय प्रकाश सिंह को सौंप दिया था। उनको ही यूपी में मंडलीय सम्मेलनों की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। लखनऊ में 16 जुलाई को हुए मंडलीय सम्मेलन में जय प्रकाश के राहुल गांधी पर दिए विवादित बयानों के कारण उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया। साथ ही वीर सिंह को सभी पदों से हटा दिया। तभी से वह दिल्ली में ही पदाधिकारियों को बुलाकर यहां मंडलीय समीक्षा कर रही हैं।
लोकसभा चुनाव 2019 और मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए मायावती लंबे समय से दिल्ली में हैं। बसपा को सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर भारत में फिर से मजबूत करने में जुटी हुई हैं। इसका मुख्य कारण देश में भाजपा खासकर मोदी की घटती लोकप्रियता। वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस की स्थिति भी बेहद कमजोर है। इससे कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2019 में किसी दल को बहुमत आने की संभावना बहुत कम दिख रही है। कांग्रेस के बाद देश में बसपा ही अकेली ऐसी पार्टी है, जिसका अधिकतर राज्यों में अपना वोट बैंक है। इसलिए मायावती उत्तरप्रदेश में संगठन को मजबूत कर और अन्य राज्यों में वहां की मुख्य विपक्षी पार्टियों से गठबंधन कर राष्ट्रीय फलक पर पहुंचना चाहती हैं। वह कई दलों से गठबंधन को लेकर सम्पर्क में हैं।
गठबंधन की आवश्यकता सिर्फ बसपा को नहीं है। बल्कि सभी राज्यों में बसपा का वोटबैंक होने के कारण अन्य दल भी इससे हाथ मिलाना चाहते हैं। ताकि बसपा के निश्चित वोट बैंक के सहारे वे अपने-अपने राज्यों में अपनी नैया पार लगा सकें। उत्तर प्रदेश में सपा ने बसपा से गठबंधन का एलान पहले ही कर दिया है। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा क्षेत्र के उपचुनाव में सपा को मिली जीत के बाद अखिलेश यादव अब अपनी बुआ को दूर नहीं होने देना चाहते हैं। कांग्रेस की केंद्रीय कार्यसमिति की बैठक से मिले संकेत के अनुसार मध्य, प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव में भी वह बसपा का साथ लेने का पूरा मन बना चुकी है। मायावती इसके बदले यूपी में ज्यादा से ज्यादा सीटें लेने के लिए दबाव बनाए हुई हैं। कांग्रेस ने भी इशारा कर दिया है कि वह यूपी में गिनी-चुनी सीटों पर ही चुनाव लड़ेगी। वहीं, अखिलेश यादव पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा को हराने के लिए हम कम सीटों के लिए भी तैयार हैं। ऐसे में बसपा को यूपी में सबसे ज्यादा सीटें मिलने की उम्मीद है। पार्टी उसी के अनुसार तैयारी भी कर रही है।
एक माह पूर्व बसपा के नेशनल कॉर्डिनेटर जय प्रकाश ने जब राहुल गांधी पर विवादित बयान दिया तो मायावती ने उन्हें पार्टी से निकालने में जरा भी समय नहीं लिया। जय प्रकाश पर मायावती की कार्यवाही यूपी के दृष्टिगत नहीं थी, बल्कि बहनजी राष्ट्रीय स्तर पर स्वयं की और पार्टी की भूमिका तय करना चाहती हैं। कुछ माह बाद मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं। राहुल गांधी तीनों राज्यों में बसपा से गठबंधन चाहते हैं, पर राजस्थान की पार्टी इकाई वहां अकेले चुनाव लड़ना चाह रही है। मायावती भी तीनों राज्यों में गठबंधन करना चाहती हैं। जय प्रकाश पर कार्यवाही गठबंधन को लेकर मायावती की गंभीरता दिखाती है। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव के बाद बसपा और मायावती धीरे-धीरे कमजोर होती गईं। बसपा आज तक के इतिहास में बसपा सबसे कमजोर है। इसलिए मायावती सधे हुए कदमों से रणनीति बना रही हैं और उस पर आगे बढ़ रही हैं।
सम्मानजनक सीट के बगैर गठबंधन न करने का उनका ऐलान अपने वोटरों को एकजुट रखने के लिए था। साथ ही सपा- कांग्रेस पर दबाव बनाने का भी। राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं, ’चुनावों में लगातार हार में बावजूद मायावती का दलित बेस वोट उनके साथ ही है। 2014 के आम चुनाव में बसपा को बेशक एक भी सीट न मिली हो पर सिर्फ यूपी में पार्टी को 19 फीसदी से ज्यादा वोट मिला था। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में भी मायावती को 4 से 5 फीसदी वोट मिला था। अब वह गठबंधन की राजनीति कर अपने इस वोट बैंक को सीटों में बदलना चाहती हैं। इसकी सफलता मायावती को राष्ट्रीय राजनीति में सर्वोच्च पद तक पहुंचा सकती है।
2012 में सत्ता से बेदखल होने के बाद इसी साल कर्नाटक में बसपा के इकलौते विधायक एन महेश मंत्री बने हैं। बसपा को दक्षिण से सत्ता सुख की शुरुआत हो गई है। मायावती अब इसे और आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। कर्नाटक में ही कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण के दौरान सोनिया गांधी और मायावती की कैमिस्ट्री मंच पर सबने देखी। यह कैमिस्ट्री दिखाती है कि देश की बदलती राजनीतिक परिस्थिति में दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है।
बसपा ने 2014 के आम चुनाव में कुल 503 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। 2014 के लोकसभा चुनाव में वोट पाने के लिहाज से बीजेपी और कांग्रेस के बाद, बहुजन समाज पार्टी देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है। पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर करीब 4 .2 फीसदी वोट मिला था। यानी देश के करीब 2 करोड़ 29 लाख लोगों ने बीएसपी को वोट डाला था। उत्तर प्रदेश में उन्हें 19  ़6 फीसदी वोट मिले पर वह एक भी लोकसभा सीट जीत नहीं पाई। एक राज्य के प्रभारी रहे पार्टी के वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में 4 .8 फीसदी, हरियाणा में 4 .6, मध्यप्रदेश में 3 .9, राजस्थान में 2 .4, महाराष्ट्र में 2 .6, छत्तीसगढ़ में 2 .4 फीसदी वोट मिले थे। ये सभी वोट खराब हो गए। मगर इस बार ऐसा होने नहीं देंगे।’ प्रभारी रहे इन वरिष्ठ नेता की बात में वाकई दम है। देश के कई राज्यों में बिखरे इस वोट बैंक से बसपा को लोकसभा की एक भी सीट नहीं मिली, जबकि बीएसपी से कम वोट पाकर तृणमूल कांग्रेस और अन्नाद्रमुक को क्रमशः 34 और 37 लोकसभा सीटें मिल गईं। अब मायावती अपने वोट को सीटों में बदलने की रणनीति पर काम कर रही हैं। वह इस साल राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में होने वाले चुनाव में भाजपा विरोधी मतों का बिखराव रोकने के लिए ताना-बाना बुन रही हैं।
सिर्फ इन तीन राज्यों के पिछले तीन विधानसभा चुनाव के वोटों को देखें तो बसपा और कांग्रेस का मत प्रतिशत भाजपा से कहीं ज्यादा है। राजस्थान में 2003 और 2008 के चुनाव में बसपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से अधिक था। वहीं मध्यप्रदेश में 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-बसपा को मिलाकर भाजपा से अधिक वोट मिले थे। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो पार्टी ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में उन सीटों को चिन्हित करना शुरू कर दिया है, जहां बसपा मजबूत है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड, चंबल, महाकौशल और ग्वालियर से लगे विधानसभा क्षेत्रों में बसपा का हाथी भारी है। यह बात मायावती के साथ कांग्रेस को भी पता है, पर मायावती अपना बेस वोट ऐसे ही कांग्रेस के पाले में नहीं जाने देंगी। इसके लिए कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें बसपा को देनी ही पड़ेंगी।
बसपा की रणनीति सिर्फ कांग्रेस से ही गठबंधन करने की नहीं है। यूपी में वह सपा से गठबंधन करने के लिए बहुत आगे बढ़ चुकी है। वहां अब सिर्फ सीटों पर बात होनी है। गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में भाजपा को हराने के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव 14 मार्च को मायावती से मिलने लखनऊ के उनके आवास पहुंचे। इस मुलाकात के बाद यूपी में सपा-बसपा गठबंधन ने जोर पकड़ा। पिछले लोकसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली भाजपा के मत प्रतिशत के करीब ही सपा-बसपा का मत प्रतिशत था। तब यूपी में भाजपा को कुल 42.3 प्रतिशत वोट मिले थे। जबकि सपा और बसपा का वोट प्रतिशत 41.8 था। 2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा, सपा-बसपा और कांग्रेस के बाद चौथे स्थान पर थी। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा 34 सीटों पर दूसरे नंबर पर थी। सपा कुल 31 सीटों पर दूसरे नम्बर पर थी। जबकि सपा ने 5 सीटें जीती भी थी। यदि दोनों दल दूसरे नंबर वाली सीटों पर भी दावा करते हैं, तो सपा का 36 और बसपा का 31 सीटों पर दावा पक्का है। लेकिन सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव दलित वोट के मद्देनजर बसपा का इससे कहीं ज्यादा सीटें देने को तैयार बताये जाते हैं।
भीम आर्मी का साथ जरूरी
उत्तर प्रदेश में बसपा के दलित वोटों को भीम आर्मी नुकसान पहुंचा सकती है। यह आर्मी मायावती यानी बसपा के भी खिलाफ है। लेकिन वह भाजपा के खिलाफ ज्यादा आक्रमक है। उसके संस्थापक एवं अध्यक्ष चंद्रशेखर को लंबे समय से योगी सरकार ने जेल में डाल रखा है। ऐसे में भीम आर्मी के पास विपक्ष के साथ जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है। दलित आंदोलन के सहारे भीम आर्मी वेस्ट यूपी में अपनी जड़ें और गहरी करना चाहती है। पिछले दिनों उल्देपुर में हुई दलित युवक की हत्या के मामले में भीम आर्मी ने पीड़ित परिवार के साथ खड़े होने की घोषणा कर अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है। भारतीय जनता पार्टी की कैराना और फूलपुर उपचुनाव में हार के पीछे भी भीम आर्मी को ही कारण माना गया।
भीम आर्मी वेस्ट यूपी से अपना बेस मजबूत करने में लगी है। इसलिए वह वहां दलितों पर होने वाले हमलों पर तीखे तेवर अपनाए हुए है। उल्देपुर में जाटव युवक की हत्या, बुलंदशहर के डबकोरा गांव में दलितों पर हमले और युवतियों से छेड़छाड़ के आरोप जैसे मामलों में भीम आर्मी अपने को दलित समाज के साथ मजबूती से खड़े होते दिखाना चाहती है। भीम आर्मी के संयोजक संजीव देहलवी का कहना है कि दलितों को सुनियोजित तरीके से टारगेट किया जा रहा है, लेकिन हमारा संगठन उनके साथ है। भीम आर्मी के सुशील गौतम ने बताया, ‘मृतक रोहित के परिजनों को 25 लाख का मुआवजा और किसी एक परिजन को सरकारी नौकरी दिए जाने की मांग हमने की है। अगर सरकार हमारी मांगे नहीं मानेगी तो मेरठ बंद का आह्वान किया जाएगा।’
भीम आर्मी की वेस्ट यूपी में बढ़ती सक्रियता से बीजेपी के माथे पर भी बल पड़ने लगे हैं। वेस्ट यूपी में पैर जमाने की कोशिश में जुटी आम आदमी पार्टी भी भीम आर्मी की ताकत देख, उससे मधुर रिश्ते बनाना चाहती है। खुद अरविंद केजरीवाल ने सहारनपुर जेल में बंद भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर उर्फ रावण से मिलने की इजाजत जिला प्रशासन से मांगी थी, पर अनुमति नहीं  मिली। बहुजन समाज पार्टी भी वेस्ट यूपी में ही ज्यादा है। इसलिए मायावती को यदि अपनी रणनीति को सफलता तक पहुंचाना है तो उन्हें भीम आर्मी को अपने साथ लाना होगा। हालांकि जब कैराना और फूलपुर उपचुनाव में भाजपा की हार के लिए भीम आर्मी को भी कारण माना जाता है तो यह मायावती को खुश करने वाला है।
मायावती तय करेंगी राजनीतिक दिशा
बीएसपी और मायावती की कहानी वोट प्रतिशत से कहीं बड़ी है। मायावती की ताकत उनके और बीएसपी के नाम से आंदोलित और उत्साहित होने वाला एक विशाल जनसमुदाय है। यह जनसमुदाय अन्यथा खामोश रहता है। भारत का हर छठा वोटर दलित यानी अनुसूचित जाति का है। बेशक वह अलग- अलग राज्यों में अलग-अलग पार्टियों को वोट डालता है। यूपी में भी उसका एक हिस्सा गैर-बीएसपी दलों का वोटर होगा, लेकिन मायावती इस समय देश की सबसे बड़ी दलित नेता हैं और दलितों का अगर अपना प्रधानमंत्री बनाने का कोई सपना है, तो उस सपने को हकीकत में बदलने की संभावना मायावती के जरिए ही साकार हो सकती है। विपक्ष बहुसंख्य वंचित जातियों के सिंबल के तौर पर मायावती को आगे करके मोदी के सामने एक बड़ी चुनौती पेश कर सकता है। अपना प्रधानमंत्री देखने का दलितों का सपना अब भी अधूरा है। लेकिन मायावती या बीएसपी इस सपने को खुद पूरा नहीं कर सकतीं। पूरे विपक्ष को इस दिशा में ले जाने की क्षमता सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस में है। कांग्रेस ही एक ऐसी चुनावी हलचल को शुरू कर सकती है, जिसके केंद्र में मायावती हों। मायावती भी इस बात को समझती हैं कि उनके लिए कांग्रेस कितनी महत्वपूर्ण है। देश की राजनीति की अगली दिशा मायावती तय कर सकती हैं। लेकिन यह कांग्रेस की सहमति और उसके सक्रिय सहयोग के बिना संभव नहीं है।
-दिलीप मंडल, वरिष्ठ पत्रकार
 चौदह गुरुद्वारा रकाबगंज रोड नई दिल्ली। लुटियन दिल्ली में यह बंगला दलित राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है। कुछ समय पहले तक यह जमावड़ा 11 माल रोड लखनऊ में लगा करता था। माल रोड के इस बंगले के आसपास का क्षेत्र नीले बैनर, पोस्टरों से पटा रहता था। हालांकि दिल्ली में बैनरों और पोस्टरों की वैसी स्थिति नहीं है। हां, यहां बंगले की दीवारों पर दो-चार नीले बैनर और पोस्टर अवश्य हैं। जिनमें बसपा सुप्रीमो मायावाती की बड़ी-बड़ी तस्वीर होती हैं। अमूमन शांत रहने वाली गुरुद्वारा रकाबगंज की यह सड़क हाल में तीन अगस्त को कई एसयूवी गाड़ियों से भरी हुई थी। उस दिन मायावती ने लखनऊ, आगरा, अलीगढ़, झांसी, चित्रकूट मंडलों की समीक्षा बैठक बुलाई थी। इसमें इन मंडलों के जिलास्तर तक के पदाधिकारी शामिल हुए। अब तो लगभग रोज ही मायावती मंडलों और पार्टी पदाधिकारियों की बैठक कर संगठन को मजबूत कर रही हैं। यहीं से वे राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में होने वाले चुनाव की भी तैयारी कर रही हैं। इन प्रदेशों के पदाधिकारी भी पार्टी सुप्रीमो के साथ यहां बैठक कर रहे हैं। समीक्षा बैठक में मायावती ने पार्टी संगठन के ढांचे में बदलाव करने के भी निर्देश दिए हैं। वह पार्टी से सभी वर्गों को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं 
 
    राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं, ‘चुनावों में लगातार हार में बावजूद मायावती का दलित बेस वोट उनके साथ ही है। 2014 के आम चुनाव में बसपा को बेशक एक भी सीट न मिली हो पर सिर्फ यूपी में पार्टी को 19 फीसदी से ज्यादा वोट मिला था। इसके अलावा अलग-अलग राज्यों में भी मायावती को 4 से 5 फीसदी वोट मिला था। अब वह गठबंधन की राजनीति कर अपने इस वोट बैंक को सीटों में बदलना चाहती हैं। इसकी सफलता मायावती को राष्ट्रीय राजनीति में 
सर्वोच्च पद तक पहुंचा सकती है
 
 
 मायावती इस साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनाव में भाजपा विरोधी मतों का बिखराव रोकने के लिए ताना-बाना बुन रही हैं। सिर्फ इन तीन राज्यों के पिछले तीन विधानसभा चुनाव के वोटों को देखें तो बसपा और कांग्रेस का मत प्रतिशत भाजपा से कहीं ज्यादा है। राजस्थान में 2003 और 2008 के चुनाव में बसपा और कांग्रेस का वोट प्रतिशत भाजपा से अधिक था। वहीं मध्य प्रदेश में 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-बसपा को मिलाकर 
भाजपा से अधिक वोट मिले थे। कांग्रेस के सूत्रों की मानें तो पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छतीसगढ़ में उन सीटों को चिन्हित करना शुरू कर दिया है, जहां बसपा मजबूत है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड, चंबल, महाकौशल और ग्वालियर से लगे विधानसभा क्षेत्रों में बसपा का हाथी भारी है। यह बात मायावती के साथ कांग्रेस को भी पता है, पर मायावती अपना बेस वोट ऐसे ही कांग्रेस के पाले में नहीं जाने देगी। इसके लिए कांग्रेस को सम्मानजनक सीटें बसपा को देनी ही पड़ेंगी

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