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पाक विस्थापित हिंदुओं को भूली मोदी सरकार, लॉकडाउन में दाने-दाने को हुए मोहताज

पाक विस्थापित हिंदुओं को भूली मोदी सरकार, लॉकडाउन में दाने-दाने को हुए मोहताज

मोदी सरकार देश के बाहर से आए हिंदू शरणार्थियों के लिए नागरिकता संशोधन कानून लाई थी। जिसको लेकर पूरे देश में खासा बवाल मचा। इसी बीच कोरोना वायरस ने दस्तक दे दी जिसके बाद सीएए-एनआरसी का मुद्दा दब गया। कोरोना संक्रमण के कारण मजदूरों की तरह पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को भी खासे मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।

दरअसल, पाकिस्तान से आए शरणार्थियों को किसी भी सरकार योजना का फायदा नहीं मिल रहा है क्योंकि उनके पास कोई प्रमाण पत्र नहीं है। पाकिस्तान से आए करीब 6 हजार परिवार राजस्थान में रह रहे हैं। उनकी जनसंख्या लगभग 30-35 हजार के बीच है। लेकिन लॉकडाउन में उनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है। जबकि देश के सियासत के केंद्र बिंदु में पाक विस्थापित हिंदुओं को रखते आया गया है।

90 फीसदी शरणार्थी दलित

पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों से सालों पहले विस्थापित होकर ये लोग भारत आए थे। इन लोगों में 90 फीसदी शरणार्थी दलित हैं। गुजारा करने के लिए बेलदारी करते थे। लेकिन अब इनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तानी हिंदुओं की नागरिकता के मुद्दे पर काम करने वाली संस्था ‘सीमांत लोक संगठन’ का कहना है कि पिछले कुछ सालों में पाक विस्थापितों पर बहुत राजनीति हुई है। लेकिन कोरोना और लॉकडाउन जैसे मुश्किल हालातों में इस राजनीति का कुछ प्रतिशत काम इनके भले के लिए किया जाता तो हजारों पाक विस्थापितों की मदद हो जाती। नागरिकता नहीं होने के कारण ये लोग किसी भी सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं के दायरे में नहीं आते हैं।

सीमांत लोक संगठन के मुताबिक, राजस्थान में पाकिस्तान से आए हुए करीब 6 हजार परिवार बसर करते हैं, जिनकी जनसंख्या 30-35 हजार के बीच है। 40 साल की मूमल के पति नरसिंह की मृत्यु पिछले साल डेंगू के चलते हो गई थी। मूमल के 5 बच्चे हैं। मूमल अब अपने चाचा ससुर समयो भील के यहां रहती हैं। मूमल का परिवार पाकिस्तान के सिंध परांत के संघार जिले की खिपरो तहसील का रहने वाला है। ये परिवार पांच साल पहले जोधपुर में आ बस था और बेलदारी काम करने लगा।

पाक विस्थापित हिंदुओं को भूली मोदी सरकार, लॉकडाउन में दाने-दाने को हुए मोहताज

दाने-दाने को मोहताज

समयो मजदूर है। लॉकडाउन के बाद काम बंद है। भरा-पूरा परिवार है। दाने-दाने को मोहताज हो गए हैं। यहां की नागरिकता नहीं होने के कारण इन्हें न तो सरकारी योजनाओं का लाभ मिल पा रहा है और न ही राज्य सरकार द्वारा की गई घोषणाओं का फायदा हो रहा है। समयो कहते हैं, “सरकार की तरफ से हमें अभी तक कोई मदद नहीं मिली है। सीमांत लोक संगठन के कार्यकर्ताओं ने खाने-पीने का सामान पहुंचाया है। हमारे पास तो अभी सरकार की तरफ से सर्वे वाले भी नहीं पहुंचे हैं।”

दूसरी तरफ मूमल के रिश्तेदार और साथ में रहने वाले वजीर कहते हैं, “पाकिस्तान से आए हुए सभी शरणार्थी यहां मजदूरी ही करते हैं। लगभग एक महीने से हमारा काम बंद है। अखबारों में पढ़ा था कि राजस्थान सरकार पाकिस्तान से आए हुए शरणार्थी हिंदुओं को मदद दे रही है, लेकिन हमारे पास अभी तक कोई नहीं पहुंचा है।”

मोदी सरकार मुश्किल वक्त में भूली

वजीर ने बीए तक की पढ़ाई की है। उन्होंने लॉकडाउन में हो रही परेशानियों के बारे बताते हुए कहा, “नरेंद्र मोदी सरकार हमारी नागरिकता के लिए कानून तक ला रही है, लेकिन जब सबसे मुश्किल वक्त आया तो हमें भूल गई। हमसे मिलने सरकार का कोई नुमाइंदा भी नहीं आया।”

सामाजिक कार्यकर्ता और सीमांत लोक संगठन के अध्यक्ष हिंदू सिंह सोढा ने बताया, “लॉकडाउन के बाद लाखों मजदूर अपने घरों को लौट आए। क्योंकि उनके पास लौटने के लिए घर था। पाकिस्तान से उत्पीड़ित होकर आए इन हजारों लोगों के पास लौटने का कोई विकल्प ही नहीं है। वे सिर्फ इस भरोसे के साथ भारत आए हैं कि यहां वे सुरक्षित रहेंगे इसीलिए कोरोना संक्रमण के चलते हुए इस लॉकडाउन में सबसे असुरक्षित समूह शरणार्थियों का ही है।”

हिन्दू सिंह आगे कहते हैं, “राजस्थान में 21 मार्च को लॉकडाउन की घोषणा हुई। इसके बाद से ही किसी को कोई काम नहीं मिल रहा। हमने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और तमाम मंत्री-सांसदों को शरणार्थियों की समस्याओं के संदर्भ में पत्र लिखे। लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं आया। हालांकि, लॉकडाउन के करीब 20 दिन बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पाक विस्थापितों को राशन सामग्री उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। 20 दिन से हम अपने सीमित संसाधनों से इन्हें राशन उपलब्ध करा रहे थे। स्थानीय प्रशासन अभी तक सर्वे ही कर रहा है। कुछ-कुछ जगहों पर अब राहत सामग्री पहुंचने लगी है,’ वे जोड़ते हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “राज्य सरकार ने 20 दिन बाद हमारे पत्र पर अधिकारियों को निर्देश दिए हैं, लेकिन केंद्र की तरफ से हमें कोई जवाब ही नहीं मिल रहा है। जबकि केंद्र सरकार को पूरे देश में पाकिस्तान सहित अलग-अलग देशों के शरणार्थिंयों के लिए एक विशेष पैकेज की घोषणा करनी चाहिए ताकि सबसे असुरक्षित और गरीब वर्ग को राहत मिल सके।”

सरकारी निर्देश के बावजूद राशन नहीं

सीमांत लोक संगठन का कहना है कि सरकार से उन्होंने शरणार्थियों के लिए मांग की थी। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 9 अप्रैल को पाक विस्थापितों को राशन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। उसके बाद भी राशन अब तक किसी को नहीं मिली। जिला कलक्टरों से मिली रिपोर्ट बताती है कि जोधपुर जिले में 618 परिवार, जयपुर में 500 पाक विस्थापित परिवारों, बाड़मेर जिले में 200, पाली में 92 और बीकानेर जिले में रह रहे पाक विस्थापितों में से 93 परिवारों को राशन सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है।

पाक विस्थापित हिंदुओं को भूली मोदी सरकार, लॉकडाउन में दाने-दाने को हुए मोहताज

जबकि इन जिलों में इनसे कहीं ज्यादा संख्या में पाकिस्तान से आए लोग रहते हैं। सीमांत लोक संगठन के आंकड़ों के मुताबिक, जोधपुर में 2,500 परिवार, जैसलमेर में 2,300, बीकानेर में 400, बाड़मेर में 300, जयपुर में 300 और 200 परिवार अन्य जिलों में रह रहे हैं। हालांकि इस बीच राज्य सरकार के निर्देशों के बाद जोधपुर में विस्थापित परिवारों में राशन पहुंचाना शुरू कर दिया गया है।

वहीं, जैसलमेर में भी मदद पहुंचाई जाने लगी है। वार्ड 7 में रविवार से दोनों वक़्त का खाना दिया जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि अगले कुछ दिनों में सभी परिवारों तक राशन पहुंचा दिया जाएगा। हालांकि, अभी भी ऐसे अनेक परिवार हैं जिन्हें मदद की दरकार है। लेकिन यह आदेश सभी पाक विस्थापितों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पा रहे हैं।

रूपचंद वार्ड नंबर 21 में रहते हैं। रूपचंद पाकिस्तान सिंध के उमरकोट जिले से 4 साल पहले भारत आए थे। पत्नी निमरी और दो बच्चे नारायण, गुलचंद के साथ। रूपचंद कहते हैं, “हमारे चार परिवार हैं और एक परिवार में 6 सदस्य हैं। कुल-मिलाकर सभी परिवारों में 20-25 लोग हैं। आम दिनों में हम खेती भी करते हैं तो कभी मजदूरी करके पेट भरते हैं, लेकिन कोरोना के कारण अब हमें कहीं काम भी नहीं मिल रहा। सरकार की तरफ से हमारे यहां कोई अधिकारी नहीं पहुंचा है। पैसा नहीं होने के कारण अब खाने-पीने की दिक्कतें आने लगी हैं।”

1,650 विस्थापित परिवारों का सर्वे

जैसलमेर के जिला कलक्टर नमित मेहता ने बताया, “प्रशासन ने पाक विस्थापित 1,650 परिवारों का सर्वे किया है। इनमें से 450 परिवारों को जरूरतमंद माना गया। अब तक हमने 300 परिवारों तक सूखा राशन किट पहुंचा दिया है। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले परिवारों तक भी मदद पहुंचाई जा रही है।” दूसरी तरफ जैसलमेर में सीमांत लोक संगठन के कार्यकर्ता दिलीप कहते हैं, “सरकार के निर्देश के बाद प्रशासन ने सर्वे कर पाक विस्थापितों तक खाना पहुंचाया है, लेकिन यह सभी तक नहीं पहुंच पा रहा है। जैसलमेर जिले में 2,300 परिवार रहते हैं, लेकिन प्रशासन के सर्वे में 1,650 परिवार आए हैं। उनमें से भी सिर्फ 450 को जरूरतमंद माना है जबकि पाक विस्थापित सभी लोग जरूरतमंद ही हैं। उनके पास कुछ भी नहीं बचा है।”

हिंदू सिंह सोढा का कहना है कि अकेले सीमांत लोक संगठन के कार्यकर्ताओं ने अब तक 2,372 परिवारों के 12 हजार से ज्यादा लोगों तक खाने की सामग्री पहुंचाई है। हिन्दू सिंह ने बताया कि ऐसा नहीं है कि एक बार मदद पहुंचने के बाद लोगों को खाने की जरूरत नहीं है, हर 8-10 दिन में ऐसी मदद पहुंचनी चाहिए। पाक विस्थापितों को लेकर सिर्फ राजनीतिक बातें नहीं करके उन्हें मदद पहुंचाने की कोशिश केंद्र सरकार को भी करनी चाहिए और विशेष पैकेज की घोषणा करनी चाहिए।

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