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माॅब लिंचिंग पर गरमाती राजनीति

 

देश में बढ़ती माॅब लिंचिंग की घटनाओं को लेकर एक बार फिर सियासत गरमाने लगी है। इस बारे में बुद्धिजीवी वर्ग के आवाज उठाने पर विपक्षी पार्टियों को भी सरकार को घेरने का मौका मिल गया है। इस पर सरकार बचाव की मुद्रा में है। उसका तर्क है कि ‘भीड़ की हिंसा’ का संबंध किसी पार्टी विशेष से नहीं है, बल्कि ऐसी घटनाएं त्रिपुरा में वाम, पश्चिम बंगाल में टीएमसी और केरल में वाम सरकार में भी हुई हैं।
भाजपा के नेता तो आवाज उठाने वाले बुद्धिजीवियों को विपक्ष की कठपुतली और राष्ट्र विरोधी तक करार दे रहे हैं। भाजपा नेता यहां तक कह रहे हैं कि पूर्व में जिस तरह एक ‘गैंग’ असहिष्णुता के नाम पर अवार्ड वापसी कर माहौल बना रहा था वैसी ही स्थिति आज फिर बनाई जा रही है।
दरअसल, इस बीच बढ़ती लिंचिंग की घटनाओं के बाद देश के अंदर हो रही नस्लीय और जातीय धार्मिक हिंसा पर नाराजगी जताते हुए इस पर सख्ती से रोक लगाने की मांग करते हुए प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी भेजी गई है। बाॅलीवुड के कुछ जाने-माने सितारों या निर्देशकों जैसे श्याम बेनेगल, अनुराग कश्यप, अपर्णा सेन, उनकी बेटी कोंकणा सेन शर्मा, शुभा मुद्गल, मणिरत्नम आदि 49 हस्तियों के इस चिट्ठी में हस्ताक्षर हैं। 23 जुलाई 2019 को लिखे गए इस पत्र में आरोप लगाया गया है कि राम के नाम पर देशभर में हिंसा हो रही है, ‘जय श्री राम’ का नारा युद्धघोष बन चुका है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि 1 जनवरी 2009 से 29 अक्टूबर 2018 के दौरान देश में 254 धर्म आधारित हेट क्राइम को अंजाम दिया गया। यही नहीं, 2016 में दलितों पर अत्याचार के 840 मामले सामने आए। प्रधानमंत्री से सवाल पूछते हुए इन कलाकारों ने लिखा है कि वो बताएं कि अपराधियों के खिलाफ क्या एक्शन लिया गया? फिल्म जगत की इन हस्तियों ने आवाज उठाई तो राजनीतिक पार्टियां भले कैसे इस अवसर को हाथ से जाने देंती। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तत्काल इस मुद्दे को लपककर केंद्र सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा, हर किसी को पता है कि देश में क्या चल रहा है। मैं सभी बुद्धिजीवियों का सम्मान करती हूं, मुझे लगता है कि उन्होंने जो कुछ भी लिखा है, वह लोगों की वास्तविक शिकायत है। आगे बोलते हुए ममता ने कहा, मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी को इस बारे में सूचित करने का यह सही समय है। कोई भी नागरिक किसी भी उद्देश्य से पीएम को पत्र लिख सकता है। अगर बीजेपी इसे राजनीति से प्रेरित कहती है तो यह शर्म की बात है। आपको लगता है कि श्याम बेनेगल और अन्य लोग पैसा लेकर ऐसा कर रहे हैं।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में दलितों व अल्पसंख्याकों के खिलाफ भीड़, हिंसा जैसी घटनाएं आम हो गई हैं। जाहिर है कि उन्होंने केंद्र पर सीधे-सीधे लापरवाही का आरोप लगाया है। इस पर गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी ने सदन में कहा कि यह सच नहीं कि ऐसी घटनाएं सिर्फ एक पार्टी की सरकार में हो रही हैं। हमारे पास सबूत हैं कि त्रिपुरा और केरल में वाम तथा पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार में भी माॅब लिंचिंग हुई है, केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने तो यहां तक कह डाला है कि ‘अवार्ड वापसी गैंग’ फिर सक्रिय हो गया है। इसी तरह पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने बुद्धिजीवियों को राष्ट्रद्रोही एवं विपक्ष की कठपुतली तब बना दिया है।
भाजपा समर्थकों की ओर से कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूसरी बार सरकार बने अभी लगभग दो महीने ही हुए हैं कि एक बार फिर असहिष्णुता ब्रिगेड जाग उठा है। प्रधानमंत्री मोदी के पहले कार्यकाल भी में असहिष्णुता ब्रिगेड ने पूरे पांच साल तक देश में असहिष्णुता का माहौल दिखाने के लिए हर हथकंडे अपनाए थे, वही काम अब कर रहा है। मुंबई से बाॅलीबुड के 49 कलाकारों ने प्रधानमंत्री मोदी को खुला पत्र लिखकर देश में हुई कुछ ऐसी माॅब लिचिंग की घटनाओं पर कार्यवाही की मांग की है जो या तो झूठी है या किसी अन्य कारण से घटना घटी है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस बात के लिए प्रधानमंत्री मोदी को इन 49 कलाकारों ने पत्र लिखा है उसकी जिम्मेदारी राज्य सरकारों के कंधों पर है। राज्य सरकारों का काम है कि अपने अपने राज्य में कानून व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाएं। भाजपा समर्थक सवाल उठाते हैं कि आखिर 2015 में अवार्ड वापसी और जेएनयू में आजादी के नारों के पीछे क्या वजह थी? आखिर क्यों कुछ राज्यों में चुनाव के बाद ऐसे मुद्दे शांत पड़ गए? अब फिर क्यों असहिष्णुता के मुद्दे को हवा दी जा रही है? मुंबई में एक सेवानिवृत अधिकारियों के समूह ने खुली चिट्ठी लिखकर देश में अतिवादी राष्ट्रवाद पर चिंता जताई इसमें एक संदर्भ राजस्थान में पहलू खान नामक व्यापारी की हत्या का है जिसे कुछ असामाजिक तत्वों ने पीट-पीटकर मार डाला था। ये राज्य सरकार की कानून-व्यवस्था का मामला है, लेकिन इसे पीएम मोदी यानी केंद्र सरकार से जोड़ा जा रहा है। सबसे खास बात यह कि उनका किसी भी राजनीतिक दल से संबंध नहीं है, फिर भी खुली चिट्ठी लिखी गई है। जाहिर है जिन अधिकारियों के नाम और पद सहित ये पत्र अखबारों की सुर्खियां बनी हैं उसका एक मात्र मकसद यह है कि एक बार फिर असहिष्णुता और राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे को उछाला जाय और समाज में डर का वातावरण पैदा किया जाए जिससे मोदी को मात देने की रणनीति पर आगे बढ़ा जा सके।
भाजपा समर्थकों की दलील है कि प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता कांग्रेसपरस्त तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को खटकती रही है। वर्ष 2015 में पुरस्कार वापसी अभियान का मकसद ही पीएम मोदी को हराना और नीतीश कुमार को अपने लक्ष्य तक
पहुंचाना था। उस समय पुरस्कार वापसी समूह के सदस्यों और नीतीश कुमार की एक बैठक हुई थी। जिसमें समान विचारधारा के लेखकों को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई। देशभर के इस तरह के लेखकों से नीतीश कुमार की मुलाकातें करवाई गईं ताकि उन्हें पीएम मोदी के विरुद्ध खड़ा किया जा सके। जाहिर है इस सोच के पीछे भी काफी हद तक कांग्रेस से ‘उपकृत’ साहित्यकार, लेखक, कवि और कलाकार शामिल थे।
इसी तरह बिहार चुनाव से पहले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान को आधार बनाकर आरक्षण खत्म करने का भय दिखाया गया। इस मामले को इतना उछाला गया कि आरक्षित वर्ग में आने वाले एक खास वर्ग में आरक्षण खत्म होने का डर पैदा किया जाए। जबकि पीएम मोदी ने आरक्षण में किसी भी छेड़छाड़ से बार-बार इनकार किया और इस बात को साफ किया कि वे आरक्षण के पक्ष में हैं। हालांकि इस बात का सीधा लाभ आरक्षण के नाम पर मलाई खाने वाले राजनीतिक दलों को हुआ जरूर, लेकिन इस डर की राजनीति ने बिहार को फिर 25-30 साल पीछे कर दिया। जिस बिहार ने विकास की गति पकड़ ली थी वो बिहार अब फिर पिछड़ेपन का शिकार हो रहा है। पूर्व में हैदराबाद यूनिवर्सिटी में एक स्टूडेंट के आत्महत्या मुद्दे को भी केंद्र सरकार से जोड़कर यह दिखाने की कोशिश की गई कि मोदी सरकार दलित विरोधी है। तमाम प्रदर्शन हुए, हिंसा हुई  मुद्दे को बार-बार तूल दिया जाता रहा। लेकिन अंत में जब जांच हुई तो साफ हुआ कि रोहित वेमुला दलित था ही नहीं। बावजूद इसके राजनीति होती रही और मोदी सरकार को दलित विरोधी बताकर डर पैदा करने की कोशिश लगातार होती रही ।

बहरहाल फिल्म जगत की हस्तियों की चिट्ठी से देश में एक बार फिर असहिष्णुता और माॅब लिंचिंग का मामला गरमा गया है। कश्मीर के संबंध में ट्रंप के बयान के साथ ही विपक्ष को केंद्र सरकार को घेरने का एक और मुद्दा मिल गया है।

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