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घटते जा रहा मनरेगा का बजट

देश पिछले दो वर्षो से कोरोना से जंग लड़ रहा है। इस जानलेवा वायरस के चपेट में आकर अब तक लाखों लोंगो की जान जा चुकी है। हजारों लोंगो की नौकरियां भी कोरोना की भेट चढ़ गई, लोग आर्थिक तंगी का सामना कर रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर मनरेगा मज़दूरी करने वाले मज़दूरों पर पड़ा है। दरअसल, महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत सालभर में 100 दिन का रोजगार का गारंटी दी गई है। लेकिन पिछले दो वर्षो से मज़दूरों को इसके तहत सही तरीके से रोजगार नहीं मिल पा रहा है। मनरेगा मजदूरी पर आधारित मजदूरों का कहना है कि हमारे पास जॉब कार्ड तो लेकिन जॉब नहीं मिल रही है। मनरेगा मजदूर इसको लेकर कई बार हड़ताल भी कर चुके हैं।

मौजूदा दौर में मनरेगा मज़दूरों का बहुत बुरा हाल है। मज़दूरों का यह हाल देश की बेरोजगारी की स्तिथि को दर्शा रहे हैं। हाल ही में मुंबई स्थित स्वतंत्र निकाय सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने खुलासा किया है कि मई में भारत की बेरोजगारी दर 7.1प्रतिशत थी। बेरोजगारी दर कामकाजी उम्र की आबादी के अनुपात को अंकित करती है जो काम के माध्यम से मजदूरी कमाने के लिए नियोजित होना चाहती है, लेकिन रोजगार पाने में असमर्थ है। शहरी बेरोजगारी दर अप्रैल में बढ़कर 9.22 प्रतिशत हो गई, जो मार्च महीने में 8.28प्रतिशत थी। ग्रामीण इलाकों में अप्रैल में बेरोजगारी दर 7.18 प्रतिशत रही, जो मार्च महीने 7.29 प्रतिशत थी।

वहीं सीएमआईई के अनुसार, हरियाणा राज्य 34.5 प्रतिशत के साथ उच्चतम बेरोजगारी दर को दर्शाता है। इसके बाद राजस्थान में 28.8 प्रतिशत , बिहार में बेरोजगारी दर 21.1 प्रतिशत है। अन्य राज्य और क्षेत्र जो दोहरे अंकों में बेरोजगारी दर दर्ज करते हैं, उनमें गोवा (15.5 प्रतिशत ), जम्मू कश्मीर (14.2 प्रतिशत ), त्रिपुरा में (14.6 प्रतिशत ), और झारखंड में (14.2 प्रतिशत ) शामिल हैं।

वर्ष 2020 में बेरोजगारी अपने चरम पर 23.7 प्रतिशत (शहरी 26 प्रतिशत और ग्रामीण 22 प्रतिशत ) थी, जिसका मुख्य कारण देश में कोरोना वायरस के प्रसार को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन प्रतिबंधों के नकारात्मक प्रभाव थे। अब ठीक दो साल बाद बेरोजगारी एक बार फिर वहीं है, जहां पहले थी। वही कई आकड़े के मुताबिक़,नौकरियां न मिलने से निराश होकर कानूनी कामकाजी उम्र के 90 करोड़ भारतीयों में से आधों, अधिक ने रोजगार तलाशना बंद कर दिया है। वर्ष 2017 से 2022 तक श्रम भागीदारी दर 46 प्रतिशत से गिरकर 40 प्रतिशत हो गई है।

सीएमआईई के आंकड़ों को अनिवार्य रूप से देखना और समझना चाहिए क्योंकि सरकार नियमित रूप से अपने आंकड़े जारी नहीं करती है। हालांकि, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के द्वारा आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण में कहा गया है कि शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी वर्ष -2021 में घटकर 8.7 प्रतिशत हो गई, जो पिछले वर्ष में 10.3 प्रतिशत थी। इस पर अर्थशाष्त्रियो का कहना है कि घरेलू मांग और बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक सुधार की धीमी गति से रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं। कोरोना महामारी में और भी बुरा हाल था।

कई नीतिगत हस्तक्षेपों के बावजूद नौकरी चाहने वालों की वार्षिक वृद्धि को बढ़ाने के प्रयास अपर्याप्त साबित हुए हैं। सीएमआईई के अनुमान के मुताबिक, रोजगार-जनसंख्या दर 38 फीसदी से कम है।यह प्रतिशत हर साल श्रम बल में प्रवेश करने वाली कामकाजी उम्र की आबादी के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली नौकरियों की कमी को दर्शाता है।

गौरतलब है कि केंद्र की भाजपा सरकार ने बीते 26 मई को अपने 8 साल पूरे कर लिए हैं । किसी भी सरकार के लिए आठ वर्ष का समय बहुत होता है। अपनी सफलता और विफलता बताने के लिए। वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक बार कहा था कि ‘मनरेगा’ 60 साल की विफलता का स्मारक है। लेकिन अब 8 वर्ष में भी कुछ नहीं बदला है।

कोरोना महामारी के दौरान दिहाड़ी मज़दूर अपने गांव में लौटने वाले प्रवासी मज़दूरों के लिए यह योजना जीवन रक्षक साबित हुई। फिर भी मनरेगा के लिए कुल आवंटन को हर नए बजट के साथ कम किया गया। मनरेगा योजना के लिए कम बजट ने राज्यों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में उन लोगों को पर्याप्त काम प्रदान करना मुश्किल बना दिया है जो रोजगार गारंटी योजना पर निर्भर हैं।

योजना की उच्च मांग के बावजूद वित्त वर्ष 2022-23 के लिए भी इस प्रमुख ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम को पिछले वित्तीय वर्ष (98,000 करोड़ रुपये) की तुलना में लगभग 25,000 करोड़ रुपये कम राशि आवंटित हुई है। श्रमिक अधिकार समूह ‘पीपुल्स एक्शन फॉर एम्प्लॉयमेंट गारंटी’ द्वारा विकसित एक मनरेगा ट्रैकर से पता चलता है कि 17 करोड़ पंजीकृत जॉब कार्डों में से केवल 9.7 करोड़ कार्ड 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2021 के बीच सक्रिय थे। एक जॉब कार्ड को तब सक्रिय माना जाता है जब इसे बीते तीन सालों में कम से कम एक बार भी पंजीकृत किया गया हो। यह भी पता चला कि जॉब कार्ड के लिए आवेदन करने वाले लगभग 1.5 करोड़ परिवारों को कार्ड भी जारी नहीं किए गए थे। यह दर्शाता है कि मनरेगा के तहत केवल 6% परिवारों को 80 दिनों से अधिक का काम मिला, हालांकि कानून न्यूनतम मजदूरी पर प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए 100 दिनों के रोजगार की गारंटी देता है।

इन गरीब ग्रामीण परिवारों के पास काम का लगभग कोई वैकल्पिक जरिया नहीं है। इससे पहले कि वह नीतिगत उपायों के माध्यम से इससे निपटने का प्रयास करे, सरकार वास्तव में यह स्वीकार करने में भी विफल रही है कि वह एक बेरोजगारी संकट का सामना कर रही है।
वही भारतीय श्रम और रोजगार मंत्रालय ने सीएमआईई की रिपोर्ट को ‘तथ्यात्मक रूप से गलत’ कहा है। केंद्रीय श्रम मंत्री भूपेंद्र यादव ने अक्टूबर-दिसंबर 2021 की अवधि के लिए तिमाही रोजगार सर्वेक्षण की रिपोर्ट जारी करके सीएमआईई के निष्कर्षों का विरोध किया, जिसमें केवल चुनिंदा संगठित क्षेत्रों में ही रोजगार में बढ़ती प्रवृत्ति दिखाई गई। दुखद बात यह है कि एक तरफ देश में ऐसे लोग हैं जो अच्छे काम की तलाश में हैं, और दूसरी तरफ बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के लिए शिक्षकों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों की भारी कमी है। कोविड से संबंधित व्यवधान, विदेशी और घरेलू निवेश की कमी और अन्य भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं को मुख्य रूप से एक नकारात्मक आर्थिक प्रवृत्ति के लिए जिम्मेदार बताया जा रहा है, जिसने रोजगार को प्रभावित किया है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि महामारी ने छोटे भारतीय स्टार्ट-अप और छोटे और मझोले उद्योगों (एमएसएमई) को नुकसान पहुंचाया है, जिससे 2020 और 2021 में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई और व्यापार बंद हो गए,लेकिन इससे पहले 2016 में नोटबंदी और 2017 में वस्तु एवं सेवा कर के जल्दबाजी में लागू होने से अनौपचारिक क्षेत्र में विकास रुका था, औद्योगिक उत्पादन गिर गया था और नौकरियां गायब हो गई थीं।

हालांकि, सरकार ने स्टार्ट-अप या पेटेंट आवेदन प्रक्रियाओं को पंजीकृत करने के लिए प्रशासनिक प्रक्रियाओं को आसान बना दिया है, फिर भी सरकार या भारतीय कॉरपोरेट्स के साथ व्यापार करना और समय पर भुगतान प्राप्त करना स्टार्ट-अप्स और एमएसएमई के लिए एक चुनौती बनी हुई है। छोटे व्यवसायों के लिए कई जीएसटी दरें और बोझिल कराधान प्रक्रिया प्रमुख मुद्दे हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि सरकार को शहरी बेरोजगारों के लिए एक गारंटीकृत रोजगार कार्यक्रम शुरू करना चाहिए और आय के अंतर को कम करने के लिए एक सार्वभौमिक बुनियादी आय योजना शुरू करनी चाहिए।

केरल, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, ओडिशा और हाल ही में राजस्थान की राज्य सरकारों ने शहरी बेरोजगारों के लिए राज्य आधारित विशेष योजनाओं को शुरू किया है, ताकि वे अचानक सामने आ खड़ी होने वाली आर्थिक चुनौतियों का सामना करने लायक बन सकें। यह कहां तक सफल हो पाएगा, यह देखना बाकी है।

 

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