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मजदूर दिवस पर मजबूर प्रवासी मजदूर, बिहार में घर वापसी पर राजनीति

मजदूर दिवस पर मजबूर प्रवासी मजदूर, बिहार में घर वापसी पर राजनीति

एक सप्ताह पहले जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने राजस्थान के कोटा में फंसे करीब 300 छात्रों को घर वापसी कराई तो विपक्ष ने इस मामले पर उनकी वाहवाही करने की बजाय घेराबंदी शुरू कर दी।

तब विपक्ष ने कहा कि जो अमीर घरों के छात्र हैं उनको घर वापसी करा रहे हैं लेकिन जो गरीब मजदूर हैं। वह दूसरे प्रदेशों में फंसे हुए हैं। ऐसे प्रवासी मजदूरों को लाने के लिए न प्रदेश सरकार के पास ना केंद्र सरकार के पास कोई योजना है।

आखिर एक सप्ताह बाद केंद्र सरकार इस मामले पर सक्रिय हुई और 2 दिन पहले केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने आदेश जारी कर दिए कि जिस राज्यों में प्रवासी मजदूर फंसे हैं, उनकी घर वापसी कराई जाएगी। इसके चलते केंद्र सरकार ने सभी राज्यों को आदेश दे दिए।

राज्य सरकारों ने भी इस बात को आगे बढ़ाते हुए अपने-अपने नोडल अधिकारियों के नंबर दे दिए। यही नहीं बल्कि राज्यों ने बकायदा लिस्ट जारी करते हुए कहा कि जो जहां भी जिस राज्य में फंसा हुआ है वह उक्त नोडल अधिकारी से संपर्क करें।

अब ऐसे में मजदूरों की मजबूरी प्रकट हो रही है। मतलब एक तरफ तो मजदूर खुश है कि वह अपने घर वापस जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ वह केंद्र सरकार और राज्य सरकार के इस नए नियम के तहत अपने आप को दलदल में फंसता हुआ सा महसूस कर रहा है।

ज्यादातर प्रदेशों से प्रवासी मजदूरों के फंसे होने के साथ ही समाचार आ रहे हैं कि प्रवासी मजदूर जब नोडल अधिकारी को फोन करते हैं या तो उनके फोन नॉट रिचेबल आते हैं, या वह उठते ही नहीं है। जैसे-जैसे फोन नहीं उठते हैं ऐसे ही प्रवासी मजदूर परेशान हो उठते हैं।

एक तरफ उनके परिजन है जो बार-बार उनको फोन कर रहे हैं कि अब तो सरकार ने आदेश कर दिए। अब तो घर आ जाइए। लेकिन दूसरी तरफ वह मजबूर मजदूर है जिसको घर आने का कोई रास्ता अभी तक दिखाई नहीं दे रहा है।

‘दि संडे पोस्ट’ के संवाददाता ने भी ऐसे करीब आधा दर्जन फोन ट्राई किए। लेकिन कोई भी फोन नहीं उठा। उत्तराखंड के ज्यादातर फोन नॉट रिचेबल आते रहे हैं। जबकि यूपी के नोडल अधिकारियों ने फोन उठाने की जहमत नहीं की।

मजदूर दिवस पर मजबूर प्रवासी मजदूर, बिहार में घर वापसी पर राजनीति

अब आप ऐसे में समझ सकते हैं कि जो दूसरे राज्यों में प्रवासी मजदूर फंसे हुए हैं उनके दिल पर क्या बीत रही होगी। अब बात करते हैं बिहार प्रदेश की। बिहार प्रदेश के पूरे देश में सबसे ज्यादा मजदूर फंसे हुए हैं।

बिहार सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मानें तो करीब 20 से 25 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं। जबकि बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव कहते हैं कि हमारे प्रदेश के मजदूरों की यह संख्या 40 से 42 लाख के करीब है।

मतलब यह कि पक्ष और विपक्ष में भी सही आंकड़े बाजी में जमीन आसमान का अंतर है। कहा जा रहा है कि अभी तक भी सरकार के पास यह आंकड़ा नहीं है कि दूसरे राज्यों में उनके राज्य के कितने मजदूर फंसे हुए हैं।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि गत दिनों जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य के मुख्यमंत्रियों से लाक डाउन पर बात कर रहे थे तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि उनके राज्य के मजदूर दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं, उन मजदूरों को घर वापसी कराई जाए।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की थी। अब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तो प्रधानमंत्री के सामने यह बात रखकर वह वाहवाही पा गए। यही नहीं बल्कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके लिए 18 नोडल अधिकारी भी नियुक्त कर दिए हैं।

लेकिन दूसरी तरफ बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी इस मामले पर दूसरी बात कह रहे हैं। सुशील मोदी की मानें तो बिहार में इतने संसाधन नहीं है कि वह दूसरे राज्यों में फंसे मजदूरों को अपने राज्य में ला सकें। मतलब है कि 20 लाख से लेकर 40 लाख मजदूरों को अगर बिहार में घर वापसी कराई जाती है तो क्या ऐसे में राज्य की व्यवस्था डगमगा जाती है।

सवाल यह है कि अब राज्य सरकारें केंद्र सरकार के आदेश को मानते हुए मजदूरों को घर वापसी के लिए मजबूर तो है लेकिन वह उन्हें कब तक घर वापस ला पाएगी? या प्रवासी मजदूरों की घर वापसी सिर्फ एक राजनीति बनकर रह जाएगी?

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