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मायावती की नई सोशल इंजीनियरिंग

विधानसभा चुनावों के दौरान बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया कि आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिए। यानी आरक्षण का आधार जाति नहीं बल्कि  आर्थिक स्थिति होनी चाहिए। बसपा सुप्रीमो के इस बयान के गहरे राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। समझा जा रहा है कि मायवती अब नई सोशल इंजानियरिंग की राह पर चल पड़ी हैं। उनकी महत्वाकांक्षा अब सभी समाजों में जनाधार बनाकर राष्ट्रीय राजनीति करने की है।
दरअसल, मायावती का बयान एक ऐसे समय में आया है जब देश में आरक्षण को लेकर बहस चल रही है। आरक्षण नीति की समीक्षा किए जाने की मांग हो रही है। गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना आदि राज्यों में इस तरह की मांगें न सिर्फ जोर- शोर से उठी बल्कि प्रचंड आंदोलन में भी तब्दील हुई हैं। दिक्कत यह रही कि कोई बड़ा नेता इन आंदोलनों के पक्ष में चाहकर भी खड़ा नहीं हो सका। हर किसी को लगा कि आफत क्यों मोल ली जाए। वाकई हुआ भी ऐसा ही। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह कहा था कि आरक्षण नीति की इस दृष्टि से समीक्षा होनी चाहिए कि क्या इसका लाभ वास्तविक लोगों को मिल पा रहा है या नहीं, तो तब इस पर बड़ा बवाल उठा था। यहां तक कहा गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरक्षण के विरुद्ध है। जब भी अनारक्षित वर्ग के किसी व्यक्ति या संगठन ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही तो हंगामा खड़ा हुआ। यही वजह है कि समीक्षा की बात करने की कोई हिम्म्त नहीं कर पाता।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक अब स्वयं आरक्षित वर्ग से आने वाली मायावती ने जाति के बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का सुझाव दिया है तो इसके राजीतिक मायने हैं, क्योंकि मायावती बखूबी जानती हैं कि यदि आरक्षण का आधार आर्थिक हुआ भी तो अनुसूचित जाति के गरीब लोगों को इसका लाभ मिलेगा ही मिलेगा। अनुसूचित वर्ग के जो लोग सबल हो चुके हैं उन्हें आरक्षण नहीं भी मिला तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। ऐसे में अब सभी समाजों को बसपा के ध्वज तले लाने के लिए आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करने में कोई हर्ज नहीं, बल्कि फायदा ही होगा।
जानकारों के मुताबिक अनारक्षित वर्ग के जो लोग वर्तमान आरक्षण नीति को बदलने की मांग कर रहे हैं, आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को आरक्षण का लाभ देने की बात कर रहे हैं, स्वाभाविक है कि उनकी भावनाएं मायवती के पक्ष में हो सकती हैं। वे उम्मीद कर सकते हैं कि जब आरक्षित वर्ग के बड़े नेता ही आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात करने लगे हैं तो जल्द ही   आरक्षण की मौजूदा नीति पर गंभीरता से विचार विमर्श होगा। भविष्य में आर्थिक रूप से कमजोर अनारक्षित लोग बसपा से जुड़ सकते हैं। इसका बसपा को सियासी फायदा होना स्वाभाविक है। गौरतलब है कि मायवती पहले भी उत्तर प्रदेश में सफल सोशल इंजीनियरिंग कर चुकी हैं। देखना है कि अब उन्होंने जिस नई सोशल इंजीनियरिंग के संकेत दिए हैं, वह कहां तक कामयाब हो पाती है।

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