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माया का नहीं रहा जलवा, टूटते रहे नेता, बर्थ डे पार्टी भी रही फीकी

बसपा सुप्रीमो मायावती के सत्ता में रहते उनके बर्थ डे मनाए जाने की सुर्खियों देश भर में छायी रहती थीं। बड़े-बड़े नेता उन्हें हैप्पी बर्थ डे कहते थे। बहन जी हीरे के गहने पहन कर केक काटती थीं। उन्हें टीवी पर लाइव देख कर लाखों समर्थक तालियों की गड़गड़ाहट करते थे। उनकी पसंदीदा नीले रंग के फूल से मंच को सजा दिया जाता था। जन्म दिन को दलितों के मान- सम्मान का उत्सव कहा और दिखाया भी जाता था। हर बर्थ डे पर उन्हें प्रधानमंत्री बनाने की कसमें खाई और खिलाई जाती थीं, लेकिन वक्त बदला तो सब कुछ बदल गया। पाॅलिटिक्स में तो ये कहा जाता है कि मायावती की माया बस वही जानें। इस बार बहन जी का जन्मदिन फीका रहेगा। कोई उत्सव नहीं मनाया जायेगा। न ही लोग उन्हें हैप्पी बर्थ डे कहेंगे। यह फैसला खुद मायावती का है। अपने 65वें जन्म दिन पर वे दिल्ली में ही रहेंगी। हर बार वे अपना बर्थ डे लखनऊ में मनाती थीं। लेकिन कोविड के कारण इस बार उन्होंने तौर तरीके बदल लिए हैं।

मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि जन्म दिन को ‘जन कल्याणकारी दिवस’ के रूप में मनायें है। उन्होंने इस मौके पर सबको केक काटने से मना भी किया। समर्थकों से उन्होंने लोगों की मदद करने को कहा है। इस मौके पर ‘वे मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी के सफरनामा’ किताब का विमोचन भी करेंगी। हर वर्ष ये किताब वे खुद लिखती हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मजबूत होने से मायावती दिनों दिन कमजोर होती जा रही हैं। नौ वर्षों से वे उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर हैं। वे चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बीजेपी के साथ मिल कर सरकार चला चुकी हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ चुकी हैं। मतलब ये है कि चुनावी राजनीति में वे सारे प्रयोग कर चुकी हैं

मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा कि जन्म दिन को ‘जन कल्याणकारी दिवस’ के रूप में मनायें है। उन्होंने इस मौके पर सबको केक काटने से मना भी किया। समर्थकों से उन्होंने लोगों की मदद करने को कहा है। इस मौके पर ‘वे मेरे संघर्षमय जीवन और बीएसपी के सफरनामा’ किताब का विमोचन भी करेंगी। हर वर्ष ये किताब वे खुद लिखती हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी के मजबूत होने से मायावती दिनों दिन कमजोर होती जा रही हैं। नौ वर्षों से वे उत्तर प्रदेश की सत्ता से बाहर हैं। वे चार बार राज्य की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। बीजेपी के साथ मिल कर सरकार चला चुकी हैं। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के साथ मिल कर चुनाव लड़ चुकी हैं। मतलब ये है कि चुनावी राजनीति में वे सारे प्रयोग कर चुकी हैं। पिछला लोकसभा चुनाव अखिलेश यादव के साथ मिल कर लड़ीं। बहन को 10 सीटों पर विजय मिली। वर्ष 2014 के चुनाव में तो इनकी पार्टी बीएसपी का खाता तक नहीं खुल पाया था। लेकिन 2017 में उनका दलित मुस्लिम फाॅर्मूला नहीं चल पाया। मायावती खुद अभी न तो विधायक हैं और न ही सांसद। अगले साल की शुरुआत में यूपी में चुनाव है। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए और बनाए रखने की है।

स्वामी प्रसाद मौर्य
केशव प्रसाद मौर्य
राजाराम पाल

 

बहन मायावती से दूरी बनाकर उनके कई कद्दावर नेता अलग-अलग पार्टियों में शामिल हुए हैं। पुराने सहयोगी स्वामी प्रसाद मौर्य व केशव प्रसाद मौर्य इन्द्रजीत सरोज, पीएल पुनिया, अकबरपुर की प्रतिष्ठित सीट पूर्व बसपा नेता राजाराम पाल और पूर्व सांसद बब्बन राजभर हो, बलिया से ही कांशीराम के साथी पूर्व सांसद बलिहारी बाबू, कालीचरण सोनकर, आजमगढ़ के सगड़ी के नेता मल्लिक मसूद हांे, देवरिया जिले से वरिष्ठ नेता व 1993 में मंत्री शाकिर अली हों या कानपुर शहर से मंत्री डा ़रघुनाथ संखवार हों, आर्य नगर के पूर्व बसपा विधायक महेश बाल्मीकि हो, उन्नाव के मोहान से पूर्व विधायक राम खेलावन पासी हों, अमरोहा से राशीद अल्वी हों, मोहनलाल गंज से कांशीराम की बसपा के नंबर दो नेता रहे व अब राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी (रास्वपा) के संस्थापक पासियो के एकछत्र नेता रामकेवल उर्फ आरके चैधरी हों, सब बसपा से बाहर चले गए। बसपा के कई नेताओं ने बहन जी से दूरी बना ली।

मुख्तार अंसारी
अवधपाल सिंह यादव
बाबू सिंह कुशवाहा

इनमें बाहुबली आनंद सेन, शेखर तिवारी, गुडडू पंडित, अरूण कुमार शुक्ला उर्फ अन्ना, अफजाल अंसारी शामिल मुख्तार अंसारी शामिल हैं। पार्टी के कुछ नेता आपराधिक मामलों में नाम आने पर हटा दिये गए। एटा के सुनारों की दुकान लूट, तिहरे हत्याकांड में राज्यमंत्री अवधपाल सिंह यादव और उनके एमएलसी भाई हत्यारोपी बने, बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्र दो सीएमओ की हत्याओं में फंसे, कैबिनेट मंत्री वेदराम भाटी गाजियाबाद में तिहरे हत्याकांड में फंस गए। बांदा के बसपा विधायक पुरुषोतम भी एक लड़की को बंधक बनाकर उसके साथ रेप करने के आरोप में फंसे, बाहुबली आनंदसेन, दलित बसपा कार्यकर्ता की पुत्री के रेप व उसकी हत्या की साजिश में फंसे, माया के जन्मदिन पर धन उगाही के  चक्कर में बसपा विधायक शेखर तिवारी इंजीनियर मनोज हत्याकांड में फंसे। रीता बहुगुणा का घर फूंक कर विधायक जीतेन्द्र सिंह फंसे।

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