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सोलह वारदात करने पर शादी पक्की

बावरिया जनजाति का जो युवा जितना बड़ा अपराध करे उसे उतना ही बड़ा तोहफा दिया जाता है। आज के इस आधुनिक युग में भी भारतीय समाज में बावरिया जैसी कई अन्य ऐसी खानाबदोश जनजातियां हैं जो अपनी रूढ़िवादी परंपराओं से बाहर नहीं आ सकी हैं। हालांकि नई पीढ़ी परिवर्तन की छटपटाहट आवश्य महसूस करती है, लेकिन अनुकूल माहौल न मिलने पर वह भी विवश हो जाती है

यह हैरानी की बात है कि आज के इस आधुनिक युग में भी कुछ जानजातियां ऐसी हैं जो समय के अनुरूप उन्नत समाज की मुख्य धारा से कोसों दूर हैं। ये जातियां अपने समाज से बाहर नहीं निकलना चाह रही हैं। इनका सारा जीवन खानाबदोशी में गुजर जाता है। हालांकि ये गांवों में समूह बना कर रहते हैं, लेकिन गांवों में स्थाई रूप से टिकते नहीं हैं। इधर-उधर घूम कर डेरों में रहते हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि आजादी के बाद से आज तक की सरकारों ने इन लोगों के लिए कुछ खास नहीं सोचा है। नई पीढ़ी दकियानूसी से बाहर निकलना चाहती है, लेकिन सरकारी उपेक्षा भारी पड़ रही है। ये जनजातियां कई वर्गों में बंटी हैं तथा उत्तर भारत के उत्तराखण्ड, मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखती हैं। हमारे सामाजिक ताने-बाने के बीच तो वे हैं, पर अपनी आदतों के चलते घुलमिल नहीं सकी हैं।

प्राचीन और अजीबो-गरीब मान्यताओं का पालन करने वाली ये जनजातियां इसे धार्मिक व अपने समाज की अहम मान्यताओं को जरूरी रस्में मानती हैं। पूर्ण श्रद्धा के साथ अपनी मान्यताओं का पालन करती हैं। यही सब उन्हें शेष समाज से अलग करता हैं। इन जनजातियों का मूल पेशा अपराध करना है, हालांकि दिखावे के तौर पर कुछ और काम भी करते हैं ताकि कोई न पर शक न करे और पकड़े जाने से बचे रहे हैं। इनमें से एक जनजाति बावरिया है जिसका मुख्य पेशा अपराध करना ही है। बावरिया लोग अपराध को अंजाम देकर पुलिस की नजरों से साफ बच निकलने में माहिर माने जाते हैं। वैसे पुलिस के रजिस्टर में बावरिया जाति अपराधी के तौर पर दर्ज है। ये लोग एक स्थान पर अधिक नहीं टिकते हैं। तीन से चार आपराधिक वारदातें के कर लेने के बाद स्थान बदल देते हैं। बावरिया समाज की सबसे खास बात ये है कि यहां किसी लड़के की शादी तभी होगी जब वह सफलतापूर्वक लगातार सोलह वारदातों को अंजम दे और पुलिस की पकड़ में न आये। अगर ऐसा करने में वो कामयाब नहीं रहता है तो समाज के बड़े बुजुर्ग उसे कुंवारी लड़की के साथ शादी करने के काबिल नहीं मानते हैं।ऐसे में उसकी शादी विधवा के साथ करा दी जाती है। या फिर समाज की शादीशुदा महिलाओं से उसे अपनी इच्छा की पूर्ति करनी पड़ती है। समाज भी उसे बुरा नहीं मानता है। बावरियाओं का मूल इलाका राजस्थान में श्री हनुमानगढ़, उत्तर प्रदेश में बाराबंकी व बदायूं माना जाता है। ये काफी खूंखार होते हैं, वारदात के समय कुछ भी कर गुजरते हैं। इनकी बर्बरता के कारण बावरिया गैंग का काफी आतंक व्याप्त रहता है। गिरोह के लोग जिस भी घर में या स्थान पर लूटपाट करते हैं, इनके सामने जो भी पड़ता है उसकी तुरंत वीभत्स ढंग से हत्या कर देते हैं। इन लोगों का वारदात करते समय मुख्य हथियार हाथ भर लंबाई का एक खास डंडा होता है। सिर पर एक ही बार में मौत के घाट उतारने में माहिर होते हैं। कहते हैं इनका वार कभी खाली नहीं जाता है।

डंडे से वार करने में निपुण लोग छोटे बच्चों को प्रशिक्षण देने लगते है तथा वारदात को सफलतापूर्वक अंजाम देने के तौर तरीकों से भी बारीकी से वाकिया कराया जाता हैं ताकि घटना के समय कोई चूक नहीं हो। इतना ही नहीं अपराध के इस पेशे में महिलायें भी हर तरह से निपुण होती है। कई बार पुरुषों को बराबरी का साथ देती हैं। इस जाति का कोई युवक जब पहली बार वारदात को अंजम देने जाता है तो महिला पुरुष मिलकर कुछ खास रस्मों की अदायगी करते हैं। इनकी बर्बरता का आलम यह है कि किसी घर में लूटपाट करने के बाद उस घर की महिला पर गले से ऊपर के हिस्से में लोहे की बरछी घोंप कर उसका खून बहाते हैं। उसे शुभ मानते हैं और खुशी का इजहार करते हैं। इसे अपनी जीत का प्रतीक मानते हैं। वारदात करने का तरीका भी अलग ही होता है। इस गिरोह के लोग शिकार स्थल का चयन करते हैं फिर टारगेट से करीब तीन किलोमीटर की दूरी पर एक हफ्¬ते से एक महीने पहले ऐसी जगह डेरा जमाते हैं जहां सड़क मार्ग व रेल से बिना देर किये भागने में आसानी हो, गिरोह की संख्या 14 से 20 तक होती है।

टारगेट प्वाइंट पर डेरा डालने के बाद शिकार तलाशने की जिम्मेदारी महिलाओं की होती है। ये महिलायें भीख मांगने या कुछ सामान बेचने के बहाने क्षेत्र में रेकी करती हैं। इस कार्य को बहुत ही शीघ्रता से करती हैं। जिस घर को शिकार के तौर पर चुनती हैं, वहां क्रास या अन्य कोई चिन्ह बना देती हैं। फिर गिरोह के मुख्य सरगना को शिकार स्थल का पूरा ब्लूपिं्रंट समझा देती हैं। अगर गिरोह का कोई सदस्य जनता या पुलिस द्वारा पकड़ा गया तो उस इलाके में अधिक अपराध करते हैं। आने वाली पीढ़ियां को भी उस इलाके के बारे में जानकरी देते हैं, ताकि बदला लेने का सिलसिला जारी रहे। बावरिया समेत अन्य कई जनजातियां अपराध का पेशा करती हैं और इनका कार्य क्षेत्र उत्तर भारत ही है। सरकार को चिहए समय के साथ मुख्य धारा में इनको लाकर सभ्य बनाये।

आपराधिक खाना बदोश

कंजर : ये सेंधमारी में खासे माहिर होते हैं। तीन से चार की संख्या में रहकर वारदाता को अंजम देते हैं। शराब गोश्त की दावत उड़ाने के शौकीन होते हैं। दावत के बाद एक- दूसरे की बीवियों से दैहिक संबंध बनाने की खुली छूट होती है। महिलायें भी शराब गोश्त की दावत में शरीक होती हैं।

मंगला : इस जनजाति का रहन-सहन कंजड़ों से काफी मेल खाता है। ये मैदानी इलाकों में सक्रिय रहते हैं। मवेशियों की चोरी करना इनकी प्राथमिकता होती है। चोरी रात के समय करते हैं। डेरा समेत अन्य इलाके में भाग जाते हैं।

कबूतरीनट : ये लोग करतब दिखाने के अलावा सिलबट्टा बेचने का दिखावा करते हैं। नट अपराध करते समय हाथ से बने बम का प्रयोग करते हैं। लूटपाट और चोरी करना इनका मुख्य पेशा है।

पंखिया : सेंधमारी, लूट, चोरी करने में खास निपुण होते हैं। जिस घर को अपना निशाना बनाते हैं, वहां का कोना-कोना छान मारते हैं। पुलिस जनता को चकमा देने के लिए कच्छा बनियान गिरोह का रूप धरते हैं ये वारदातों की वजह से अक्सर चर्चा में रहते हैं।

करौल : इस जनजाति के लोग ट्रक, कार, मोटर साइकिलों की डिग्गी आदि तोड़कर समान चुराने में सिद्धहस्त होते हैं। तोड़ने का मौका न मिला तो शिकार को लालच, या झटके बाजी से भ्रमित कर कीमती समान व पैसों को साफ कर देते हैं। महिलाओं के जेवर व पर्स छीनने में भी महारत रखते हैं।

बरुआर : उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के तीन गांवों में बसे ये लोग मारपीट हिंसा से दूर रहते हैं, पर पूरे देश में चलती ट्रेनों में समान चुराना, कार बाइक से समान पार करना इन्हें खूब आता है। वारदात के समय इनकी संख्या दो से तीन होती है। अपराध के लिए ये देश के हर हिस्सों में घूमते रहते हैं।

सांसिये : अपराध के मामले में ये बावरिया के भी बाप होते हैं जिस घर को निशाना बनाते हैं उसे जान-माल का नुकसान पहुंचाते हैं। रेकी करने के लिये फेरी लगाते व भीख मांगते हैं। डेरों पर कच्ची शराब बना कर बेचते हैं। इनकी जवान महिलायें व लड़कियां डेरों पर शराब परोसने के साथ देह का सौदा करती हैं। अब काफी लड़कियां मुंबई, दिल्ली के डांसबारों में नाचने के साथ घनी आबादी इलाकों में रह कर देह व्यशपार में लिप्त हैं ये काफी खबूसूरत होती हैं। सांसिये लोग हरियाणा, मुज्जफरनगर, लखामपुर, उत्तराखण्ड तक फैले हैं।

4 Comments
  1. Ensuddywradynak 1 month ago
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