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विकास के हाईवे पर चलने वाली भाजपा सरकार ने कोई और उपाय न देखकर राममंदिर की पगडंडी पकड़ ली है जो उसे आगामी लोकसभा चुनाव में ‘जीत’ के द्वार तक ले जा सकती है। ऐसा लग रहा है कि 2019 का लोकसभा चुनाव ‘राम मंदिर’ मुद्दा पर लड़ना फिक्स हो गया है। अयोध्या के बाद राजधानी दिल्ली में धर्मसभा का आयोजन कर इसकी पुष्टि करता है। इन धर्मसभाओं के आयोजन का मकसद मंदिर बनाने के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाना है।
संघ के कार्यवाहक सुरेश भैयाजी जोशी ने कहा- जो आज सत्ता में है, उन्होंने राम मंदिर बनाने का वादा किया था। उन्हें लोगों को बात सुननी चाहिए और राम मंदिर की मांग को पूरा करना चाहिए। मंदिर के लिए कानून बनाना ही एकमात्र विकल्प है। दिल्ली में आयोजित धर्मसभा में 35 धार्मिक संगठनों और अखाड़ों के साधु संत शरीक हुए थे।
संसद के शीत सत्र से दो दिन पहले देश भर से जुटे साधु सेना और बड़ी संख्या में मौजूद लोगों ने इसी सत्र में विधेयक लाने की मांग की है। विश्व हिन्दु परिषद का कहना था कि अगर संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान कोई रास्ता नहीं निकलता है तो संत समाज जनवरी 2019 में प्रयागराज में होने वाले कुंभ मेले में जुटेगा। उसमें अंतिम फैसला लिया जाएगा। वहीं मंदिर निर्माण की तारीख का भी एलान किया जा सकता है। हरिद्वार के स्वामी हंसदेव चार्य का कहना था कि हम प्रधानमंत्री को तब तक सीट से उतरने नहीं देंगे। जब तक राम मंदिर बन नहीं जाता।
भले ही 9 दिसंबर को दिल्ली में धर्मसभा के बाद साधु-संत लौट गए। लेकिन वे 31 जनवरी को कुंभ में फिर जुटेंगे। अभी तक जो केंद्र सरकार को मूंड दिखाई दे रहा है। उससे ऐसा लगता नहीं कि वह शीतकालीन सत्र के दौरान मंदिर निर्माण के बाबत कोई विधेयक लाने जा रही है। ऐसे में 31 जनवरी को कुंभ में होने वाली साधु-संतों की बैठक अहम हो जाती है। अगर उन्होंने वहां मंदिर निर्माण की तिथि तय कर दी तो एक टकराव की अप्रिय स्थिति देश में पैदा हो जाएगी। माना जारहा है कि इस टकराव के माहौल से हिन्दू वोटों को धु्रवीकरण होगा जो भाजपा के पक्ष में जाएगी। लिहाजा भाजपा चाहेगी कि मंदिर के नाम पर टकराव बने।

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