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TMC में PK की पैठ से बढ़ रही ममता की मुश्किलें 

2020 जाने से पहले ही ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल के कद्दावर नेता और केबिनेट मंत्री रहे शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी को अलविदा कह दिया। टीएमसी के बड़े नेता मिहिर गोस्वामी ने तो कई पदों से दो महीने पहले ही इस्तीफा दे दिया था। फिलहाल एक विधायक की पार्टी छोड़ने की चर्चा जोरो पर है। टीएमसी के कई विधायक , मंत्री और पार्षद ममता का साथ छोड़ भाजपा में शामिल हो चुके है या भाजपा में जाने की तैयारी में है। चुनाव सिर पर है और विधायकों का यूं बगावत करना और पार्टी छोड़कर भाजपा में जाना ममता दीदी के लिए मुश्किलों भरा साबित हो सकता है। कहा जा रहा है कि ममता के अधिकतर नेता पीके की दखअंदाजी से नाराज है। शुभेंदु भी उन नाराज नेताओं में एक रहे। जो प्रशांत की रणनीति से खुश नहीं थे , जिसकी वजह से उन्होंने इस्तीफा देने का फैसला लेना पड़ा था।
 टीएमसी में  प्रशांत किशोर का चुनावी रणनीति संभालना कई विधायकों को रास नहीं आ रहा है। जिसकी वजह से वह ममता बनर्जी से नाराज चल रहे हैं। याद रहे कि शुभेंदु ममता सरकार में परिवहन मंत्री थे,जो 80 विधानसभा सीटों को प्रभावित करते है। शुभेंदु की ये नाराजगी ममता सरकार में प्रशांत की दखलअंदाजी है। शुभेंदु ने साफ लफ्जों में यहां तक कहा कि पहले ममता के इशारों पर पार्टी चलती थी, लेकिन पिछले कुछ दिनों से प्रशांत किशोर के इशारों पर ही पार्टी की दिशा तय हो रही थी। ऐसे में टीएमसी से मतभेद के बीच शुभेंदु के भाजपा में शामिल हो गए।
 

पीके यानी प्रशांत किशोर जिन्हे चुनावी रणनीतिकार के रूप में उस समय पहचान मिली जब 2014 में उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ लग भाजपा को फतह करने का संकल्प लिया था। मोदी से शुरू हुआ पीके का रास्ता देखते ही देखते आंध्र प्रदेश में वाईएस जगन मोहन रेड्डी, दिल्ली में अरविंद केजरीवाल,  तमिलनाडु में एमके स्टालिन. से  पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी तक जा पंहुचा।
पीके के बारे में कहा जाता है कि बेशक उन्होंने पार्टी बदली लेकिन अपना अंदाज नहीं बदला। पीके  एक समय नीतीश कुमार के इतने करीब हो गए थे कि बिहार के मुख्यमंत्री के सरकारी आवास के अंदर उनका एक स्थायी कमरा था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें जनता दल (युनाइटेड) का उपाध्यक्ष पद दे दिया था।  यही नहीं बल्कि पार्टी में पीके नंबर 2 भी नियुक्त कर दिया था। लेकिन महज पंद्रह महीने के बाद ही जेडी(यू) ने उन्हें और उनके एक पार्टी सहयोगी को बाहर कर दिया। यहा तक कि नीतीश कुमार ने उन्हें कोरोनावायरस तक कह दिया।

 पीके के बारे में राजनितिक पंडितो की राय है कि एक ज़बर्दस्त चुनावी रणनीतिकार की अपनी प्रतिष्ठा के चलते हाई कमान उनकी हर बात मानता है। शायद यही वजह है कि पीके को किसी सियासी पार्टी में छोटे-मोटे नेताओं को खुश रखने की ज़रूरत नहीं होती। जिससे उन नेताओं में ईर्ष्या और नाराज़गी पैदा हो जाना स्वाभाविक है। ये नेता असुरक्षित भी महसूस करने लगते हैं। क्योंकि ज़मीनी स्तर पर उनके कथित सर्वेक्षणों और फीडबैक्स के नतीजे में अक्सर उनके पार्टी टिकट कट जाते हैं। कहा जा रहा है कि टीएमसी के अधिकतर पीके की रणनीति का शिकार होने से भयभीत हो रहे है और पार्टी छोड़ रहे है।

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