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बर्खास्तगी के कगार पर ममता सरकार

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच पिछले कई महीनों से चला आ रहा घमासान राज्य में बड़े परिवर्तन का कारण बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सियाासी घमासान के चलते राज्य में हिंसा की जो घटनाएं हुई हैं, ममता बनर्जी सरकार और केंद्र सरकार के बीच सीधे टकराव की जो स्थितियां बनी हैं उनके कारण ममता सरकार का संकट बढ़ सकता है। राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर केंद्र ने जो गंभीरता दिखाई है और राज्यपाल से जो रिपोर्ट मांगी है उसका यही निष्कर्ष निकाला जा रहा है कि देर सबेर ममता सरकार को बर्खास्त कर वहां राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।
राज्य में मौजूद सियासी घमासान को समझने के लिए इसके अतीत के इतिहास में झांकना जरूरी होगा। आजादी मिली और देश का विभाजन हुआ तो बंगाल का भी विभाजन हुआ। बंगाल के विभाजन के कारण पश्चिम बंगाल का हिस्सा भारत में रह गया और पूर्वी बंगाल का हिस्सा पाकिस्तान में चला गया। बाद में वही पाकिस्तान कहलाया।
दोनों ओर खून खराबों के अलावा विस्थापन और शरणार्थियों की समस्या चरम सीमा पर रही। तत्पश्चात् 1971 में भारत के सक्रिय सहयोग से पूर्वी पाकिस्तान स्वतंत्रा होकर बांग्लादेश बना। जिसके कारण लाखों लोगों को पश्चिम बंगाल में शरण देनी पड़ी।
1967 से 1980 के बीच का समय पश्चिम बंगाल के लिए हिंसक, बिजली के संकट हड़तालों और नक्सलवादी आंदोलनों जैसी गतिविध्यिों से ग्रसित रहा।
इसी पूरे दौर में राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। आजादी के बाद 1967 तक यहां कांग्रेस का शासन रहा। तत्पश्चत कुल आठ महीनों के लिए बांग्ला कांग्रेस के नेतृत्व में यूनाइटेड प्रफंट ने सत्ता स्थापित की। इसके बाद फिर तीन महीने प्रोगोसिव डमोक्रेटिक गठबंध्न ने सत्ता संभाली। पफरवरी 1968 से 1969 तक एक साल राज्य में राष्ट्रपति शासन रहा।
अप्रैल 1971 से जून 1971 तक कांग्रेस ने राज्य में सत्ता की बागडोर संभाली, लेकिन सरकार कायम न रह सकी और 1971 से 1972 तक पुनः राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
इसके बाद बंगाल के राजनीतिक इतिहास में स्थिरता का दौर दिखता है।
वर्ष 1972 के मार्च में इंदिरा गांध्ी के करीबी और बांग्लादेश के निर्माण काल के दौरान रहे सहयोगी सि(ार्थ शंकर ने सत्ता की बागडोर संभाली, इनकी सरकार आपातकाल के दौरान और उसके बाद चुनाव होने तक सत्ता में रही।
1977 में जब आपातकाल के बाद देश में परिवर्तन की लहर चली तो पश्चिम बंगाल में भी सत्ता का रूप बदला और माक्र्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के प्रतिनिध्त्वि में वाममोर्चा सत्ता में काबिज हो गया। वाममोर्चा सरकार ने राज्य में भूमि सुधर जैसे काम किए। आम लोगों को अध्किार के प्रति जागरूक और संपन्न बनाने का प्रयास किया।
वाममोर्चा की सरकार की नीतियों को भद्र समाज ने सराहा जिसके चलते राज्य में कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर पड़ती गई। अगले 34 सालों तक वामपंथियों की सरकार को कोई हिला न सका। गौरतलब है कि 1947 से 1977 तक राज्य में सात मुख्यमंत्राी बदले, तीन बार राष्ट्रपति शासन लागू रहा। वहीं वाममोर्चे के केवल दो मुख्यमंत्रियों ने चैतीस बरस तक कामकाज की बागडोर संभाली।
पहले ज्योति बसु 1977 से 2000 तक मुख्यमंत्री रहे फिर बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कार्यभार संभाला और 2011 के मई में विधानसभा चुनाव तक अपने पद पर आसीन रहे।
कांग्रेस के अनुभवी नेता प्रणब मुखर्जी का दबदबा हालांकि इस बीच राज्य की राजनीति भी कायम रहा, लेकिन फिर भी वह वाममोर्चे की सरकार को बंगाल में चुनौती नहीं दे सके थे।
पिफर आया दौर ‘दीदी’ का युवा कांग्रेस के जरिए राजनीति में आई तेज तर्रार ममता बनर्जी ने वामपंथी साम्राज्य को उसी के गढ़ में चुनौती देने के साथ-साथ अपने खड़े होने की जमीन भी तैयार की। उन्होंने कांग्रेस छोड़ अपनी एक अलग पार्टी ‘तृणमूल कांग्रेस’ बनाई और ध्ीरे-ध्ीरे अपनी पार्टी का विस्तार किया।
ध्ीरे-ध्ीरे ममता बनर्जी ने सभी को अपने काम से प्रभावित किया और वह बंगाल में एक लोकप्रिय नेता साबित हुईं। चैतीस बरस काबिज रही भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ;माक्र्सवादीद्ध के शासन दौरान ममता ने नंदीग्राम में भू अध्ग्रिहण के खिलापफ बड़ा जनआंदोलन कर हाशिए में ला दिया।
2009 के लोकसभा चुनावा में ममता की पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन कर बंगाल की राजनीति में मानो भूचाल ला दिया।
इतना ही नहीं 2010 के कलकत्ता नगर निगम चुनाव में तृणमूल ने 141 सीटों में से 97 सीटंे जीत लीं। पिफर आये 2011 के विधनसभा चुनाव जिनके नतीजे पूरी तरह तृणमूल के पक्ष में रहे और राजीव गांध्ी सरकार में राज्यमंत्राी रही ममता 20, मई 2011 को बगांल की मुख्यमंत्री बन गई। 2016 में दोबारा भारी बहुमत के साथ ममता ‘राइट्र्स बिल्डिंग’ यानि राज्य के सचिवालय में बनीं रहीं। इस बीच वामपंथी कमजोर होते गए और कांग्रेस का काडर तृणमूल संग  जा मिला। लेकिन इन दो  राष्ट्रीय दलों की कमजोरी का फायदा बाद के वर्षों में भाजपा के खाते में गया। अमित शाह की राजनीतिक कुशलता का नतीजा यह रहा है कि ‘भद्र लोक’ का भ्रद मानुष हिंदुत्व की ओर आर्कषित होने लगा। हालिया संपन्न लोकसभा चुनावो में 18 सीटें जीती भाजपा ने राज्य में अपनी स्थिति कापफी मजबूत कर ली है। ममता सीधी  लड़ाई के सिद्धांत पर काम करती हैं। कांग्रेस और वामपंथ तो उनसे हार गए लेकिन अमित शाह ने ममता की भाषा में जवाब देने के बजाए सीधे दो-दो हाथ कहने की राजनीति बनाई जिसका नतीजा हाल-फिलहाल बंगाल में चल रहा ताडंव है। राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था पर अपनी रिपोर्ट राज्यपाल को सौंप चुके हैं। अब देखना यह है कि केंद्र सरकार का चाबुक ममता सरकार पर पड़ता है।
बंगाल रवीद्रनाथ टैगोर, विद्यासागर जैसे लोकप्रिय सामज सुधरकों की ध्रती।
भाजपा और तृणमूल के मध्य चल रहा खूनी खेल निकट भविष्य में ममता बनर्जी सरकार की बखास्तिगी का कारण बन सकता है। भद्र पुरुषों का यह भ्रद लोक आजादी पूर्व और आजादी बाद से ही लगातार हिंसा से ग्रसित रहा है। यदि बंगाल के चल रही रार को समझा है तो पहले उसके इतिहास को समझना जरूरी हो जाता हैं।

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