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देश की ‘दीदी’ बनकर उभरीं ‘ममता’

बीते 10 सालों से बंगाल की सत्ता की सिरमौर बनी रहीं ममता बनर्जी इस बार फिर प्रदेश की सीएम बनेंगी। ममता की ये सफलता उस सियासी सफर की मेहनत का प्रतिफल है, जिसकी शुरुआत 90 के दशक में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त में हुई थी। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित हो गए हैं और  करीब तीन महीने के चुनाव अभियान और कोरोना काल के बीच पश्चिम बंगाल की सत्ता में एक बार फिर ममता की सत्ता का उदय काल शुरू हो गया है।

 

 

इस जीत के बाद  ममता दीदी के समर्थकों में ग़ज़ब का उत्साह है। क्योंकि इस बार सीधी टक्कर भाजपा से नहीं बल्कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से थी। इसलिए लोग कह भी रहे हैं कि ममता दीदी शेर की तरह लड़ीं, किसी दूसरे नेता में इतना दम नहीं।

 

ममता दीदी ने नरेंद्र मोदी की भूमिका और मंशा पर उठाया सवाल

 

ममता बनर्जी के बारे में यह स्पष्ट कहा जाता है कि वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोर विरोधी हैं। हालाँकि कुछ लोग इसे एक रणनीति के तौर पर भी देखते हैं। लेकिन यह भी है कि पूर्व में जिस बीजेपी के साथ ममता बनर्जी सरकार में रहीं उसी बीजेपी में जब नरेंद्र मोदी का नेतृत्व शामिल हुआ तो ममता दीदी का भाव बिलकुल भी नरेंद्र मोदी के लिए  वैसा नहीं रहा जैसा भाव भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ था। तो क्या यह कह सकते हैं कि ममता दीदी मात्र राजनीतिक रणनीति के तहत नहीं बल्कि व्यक्ति विशेष के आधार पर नरेंद्र मोदी के विचारों से पूर्णतः असहमत हैं और यही कारण हैं कि समय-समय पर हम सबने देखा कि  ममता दीदी ने नरेंद्र मोदी की भूमिका और मंशा पर सवाल उठाया।

 

 

इसे एक संयोग ही कहेंगे कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ जिस बॉन्डिंग को ममता बनर्जी साझा करती थीं शायद ही वैसी आत्मीयता वह किसी अन्य शीर्ष नेता के साथ साझा कर सकीं।

 

हाँ, अपनी शुरूआती दौर में जब वह कांग्रेस की सक्रिय कार्यकर्ता थीं तो पश्चिम बंगाल के दौरे पर जब भी तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी आते तो एक सहज व्यवहार के साथ वह जरूर हर मंच पर राजीव गांधी के पीछे खड़ी नजर आती थीं।

वर्ष 1988 में ममता दीदी ने किया टीएमसी का गठन

 

ममता बनर्जी ने वर्ष 1988 में कांग्रेस से अलग होकर टीएमसी (तृणमूल कांग्रेस पार्टी) की स्थापना की थी। पार्टी के गठन के बाद वह तब की एनडीए पार्टी के साथ हो गयी थीं। केंद्र में वो अटल बिहारी की सरकार में रेल मंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पद पर रहीं। लेकिन तहलका काण्ड के बाद ममता दीदी ने एनडीए सरकार से इस्तीफा दे दिया।

 

वहीं पर अटल बिहारी और ममता दीदी का एक दिलचस्प प्रसंग भी आता है जब अटल बिहारी ने ममता दीदी को मंत्री पद वापस लेने के लिए उन्हें मनाते हुए इतना तक कह दिया कि अगर आप ने मंत्री पद वापस नहीं लिया तो वे खाना नहीं खाएंगे।

 

क्या था तहलका मामला जिसके चलते एनडीए सरकार से अलग हो गयी थीं ममता दीदी ?

 

वर्ष 2001 के मार्च महीने की 13 तारीख को अचानक दिल्ली की सियासत गर्मा गई थी और ये गर्मी थी तहलका कांड की, जिसकी आंच ने संसद के शीतकालीन सत्र को भी झुलसा दिया था। दिल्ली के एक फाइव स्टार होटल में दोपहर दो बजे शुरू हुई तहलका वेबसाइट की प्रेस कांफ़्रेंस में मौजूद पत्रकारों और जाने-माने लोगों को इल्म भी नहीं था कि कुछ देर बाद उन्हें जो तस्वीरें दिखाई जाने वाली थीं, वो भारतीय राजनीति के कुछ सबसे शर्मनाक पहलुओं को उजागर करेंगी। फर्जी रक्षा सौदे के स्टिंग ऑपरेशन का वीडियो दिखाया गया। खुफिया कैमरे में बंगारू लक्ष्मण रक्षा सौदे के फर्जी एजेंट से एक लाख रुपए लेते दिखाई दिए।

पत्रकारों ने बंगारू के सामने खुद को ब्रिटेन की वेस्ट एंड नाम की रक्षा कंपनी का एजेंट बताया था और रक्षा सौदे के लिए उनसे सिफारिश करने को कहा था। शाम होते-होते बंगारू लक्ष्मण को पद से इस्तीफा देना पड़ा था। उन्होंने इसे खुद के खिलाफ एक राजनीतिक साजिश करार दिया था। इसके बाद तो बंगारू का जिक्र देशभर के मीडिया में था।

 

तहलका के पत्रकारों ने सेना के कुछ बड़े अफसरों के कारनामे भी उजागर किए

 

संसद के दोनों सदनों में विपक्ष सरकार को घेरकर इस्तीफे की मांग कर रहा था। ऐसा नहीं था कि इस स्टिंग ऑपरेशन की लपटों में सिर्फ बीजेपी नेता ही झुलसे। एनडीए के एक प्रमुख घटक दल समता पार्टी की अध्यक्ष और रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की करीबी जया जेटली को भी तहलका फिल्मों में हथियारों के सौदागर बने पत्रकारों से बात करते दुनिया ने देखा। समता पार्टी के पूर्व कोषाध्यक्ष आरके जैन भी तहलका की लपटों में घिर गए।

तहलका के पत्रकारों ने सेना के कुछ बड़े अफसरों के कारनामे भी उजागर किए। आखिर सरकार ने एक मेजर जनरल समेत चार आला सेनाधिकारियों को निलंबित कर दिया। मगर विपक्षी पार्टियां सिर्फ इतने से ही संतुष्ट नहीं थी। उन्होंने रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का भी इस्तीफा मांगना शुरू कर दिया और इसी मुद्दे पर एनडीए में दरार पड़ गई। आखिर तृणमूल कांग्रेस एनडीए से अलग हो गई और ममता बनर्जी ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।

 

पश्चिम बंगाल की यह जीत ममता दीदी के लिए कितनी बड़ी है ?

 

200 से अधिक सीटों पर अपने ताबड़तोड़ प्रचार के बल पर जीत हासिल करने वाली ममता बनर्जी के लिए ये जीत कितनी बड़ी है, उसे उस चुनावी अभियान से समझना होगा जिसमें ममता ने पैर में चोट लगे होने के बावजूद जबरदस्त तरीके से प्रचार किया।

ममता दीदी का प्रारंभिक जीवन

 

5 जनवरी 1955 को कोलकाता के एक बेहद सामान्य परिवार में जन्मीं ममता बनर्जी 2011 से पश्चिम बंगाल की सीएम हैं। कोलकाता में जन्म के बाद ममता बनर्जी ने यहीं पर अपनी प्रारंभिक शिक्षा शुरू की। 9 साल की उम्र में ममता बनर्जी के पिता प्रोमिलेश्वर बनर्जी का निधन हो गया। इसके बाद ममता ने कोलकाता के जोगोमाया देवी कॉलेज से ग्रैजुएशन और फिर कलकत्ता यूनिवर्सिटी से इस्लामिक हिस्ट्री में पोस्ट ग्रैजुएशन किया। इसके अलावा उन्होंने जोगेश सी चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री भी हासिल की।

 

इस लेख में एक नाम लेना और जरूरी है वह है प्रशांत किशोर का नाम ,बकौल प्रशांत किशोर उन्होंने चुनाव शुरू होने से पहले ही कह दिया था कि ‘बीजेपी डबल डिजिट पार नहीं करेगी, ऐसा हुआ तो अपना काम छोड़ दूंगा। ‘ पश्चिम बंगाल चुनाव में बीजेपी के हार को नरेंद्र मोदी के हार पर देखा जा रहा है इसके भी अपने-अपने कारण हैं।

फ़िलहाल भाजपाईयों  ने जिस महिला पर अपमानजनक कटाक्ष किये आज उसी महिला ने अपनी राजनीति का लोहा पूरे देश के सामने एक बार फिर साबित कर दिया। हालाँकि नंदीग्राम से सुभेंदु अधिकारी ने ममता दीदी को हरा कर उनके कद पर उन्हीं के घर में प्रश्न जरूर उठा दिए हैं , इस पर ममता दीदी ने कोर्ट जाने की दलील की है।  लेकिन इन सबके बावजूद ममता दीदी ने यह तो साबित कर ही दिया कि उनके सामने मोदी और शाह की जोड़ी भी कमजोर पड़ गयी।

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