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बंगाल में ‘भ्रष्टाचार की ठेकेदार’ बनी ममता

जब रिश्वतखोरी को भी सरकारी शह पर समर्थन दिया जाता है तो वह प्रदेश के लिए एक बदनुमा दाग साबित हो जाता है। कुछ ऐसा ही हुआ है पश्चिम बंगाल में। जहा की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने जनप्रतिनिधियों को रिश्वत यानी “कट मनी” का पैसा लोगों को वापस जमा कराने के आदेश दिए हैं। सीएम का यह आदेश आते ही विपक्षी दल भाजपा आग बबूला हो गई है। भाजपा नेताओ का इस मुद्दे पर आक्रोष थमने का नाम नही ले रहा है। कारण यह है कि ममता  ने इस मामले में भारी चूक कर दी है। जिससे उनको श्रेय मिलने की बजाय जनाक्रोष का शिकार होना पड रहा है।

दरअसल , होना यह चाहिए था कि ममता बनर्जी को कट मनी का पूरा पैसा वापिस करने का आदेश देना चाहिए था ।लेकिन इसकी बजाय वह यह कहकर फस गई है कि जनप्रतिनिधि कट मनी का 25 प्रतिशत पैसा लोगों को वापस कराए । जबकि उनके इस आदेश से स्पष्ट है कि कट मनी का 75 प्रतिशत पैसा जनप्रतिनिधि ही डकार जायेंगे। फिलहाल सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के नेताओं द्वारा ली गई “कटमनी” (रिश्वत) के मुद्दे को लेकर राजनीतिक उठा पटक जारी है।

भारतीय जनता पार्टी ने इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के  कालीघाट  स्थित आवास का घेराव करने की योजना बनाई । गत दो जुलाई और 6 जुलाई को सीएम आवास के पास हाजरा मोड़ पर विरोध प्रदर्शन कर भाजपा ने मुख्यमंत्री का घेराव किया।
गौरतलब है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपनी पार्टी के नेताओं को निर्देश दिया है कि सरकारी योजनाओं में जो भी रिश्वत ( कट मनी ) ली गई है, उसकी 25  प्रतिशत राशि तत्काल लोगों को लौटाई जाए। सवाल यह है कि बाकी का 75 प्रतिशत हिस्सा कौन देगा? वह पैसा कहां गया? यह जांच का विषय है। इस मामले में भाजपा का कहना है कि बाकी का 75 प्रतिशत हिस्सा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के पास भेजा गया है। इसीलिए इस हिस्से को लौटाने की मांग पर भाजपा ने उनके न केवल उनके आवास का घेराव किया बल्कि विधानसभा में इस मुद्दे को जोर शोर से उठाया।
भारतीय जनता युवा मोर्चा की आगामी योजना के तहत राज्य भर में तृणमूल नेताओं के घरों का घेराव किया जाएगा । जिन्होंने आम लोगों से सरकारी परियोजनाओं का लाभ दिलाने की एवज में ‘कट मनी’ ली है। भाजपा का कहना है कि राज्य भर में आम लोगों के हक की राशि मार ली गई है। यह सरकारी योजनाओं में अब तक का सबसे बड़ा घोटाला साबित हो सकता है।

माना जाता है कि ‘कट मनी’ का खेल राज्य में वाम दल के शासन के समय से चला आ रहा है। विधानसभा में कई बार इस मुद्दे पर विपक्ष (कांग्रेस, वाम दल और भाजपा) ममता बनर्जी सरकार को घेर चुका है। पूरे पश्चिम बंगाल में ‘कट मनी’ को लेकर जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों से रिफंड प्राप्त करने के लिए कट मनी लेने वालों के खिलाफ शिकायत दर्ज करने को कहा है। इस बीच लोकसभा में इस मामले को उठाने वाले भाजपा सांसद सौमित्र खान ने जांच की मांग की है कि मुख्यमंत्री और उनके परिवार के खाते में कितनी राशि गई है इसकी निष्पक्ष जांच की जाए।

सर्वविदित है कि ‘कट मनी’ सत्ताधारी नेताओं द्वारा स्थानीय क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए स्वीकृत धनराशि से लिया जाने वाला अनौपचारिक कमीशन है। उदाहरण के लिए, यदि सरकार किसी विशेष परियोजना के वित्तपोषण के लिए 100 रुपये जारी करती है, तो स्थानीय नेता, जो कई बार चुने गए प्रतिनिधि भी होते हैं, अनुदान प्राप्त करने के लिए कमीशन के रूप में 25 रुपये वसूल करते हैं। इस कमीशन को निचले स्तर के नेता से लेकर वरिष्ठतम नेता तक सभी के बीच साझा किया जाता है।
‘कट मनी’ को आमतौर पर नकदी में लिया जाता है, ताकि आयकर विभाग की नजरों से बचा जा सके। चूंकि बड़ी- बड़ी परियोजनाएं की लागत बहुत ज्यादा होती है, इसलिए इनकी ‘कट मनी’ भी करोड़ों में बनती है। हाल ही में टीएमसी के बूथ अध्यक्ष त्रिलोचन मुखर्जी ने 2.25 लाख रुपये से अधिक की धनराशि लौटा दी, जो कि 141 मजदूरों से उनकी आठ दिन की मजदूरी से ली गई थी। इसके अलावा, ऐसा नहीं है कि यह बीमारी केवल टीएमसी या पश्चिम बंगाल तक सीमित है। पिछले साल एक ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल रिपोर्ट से पता चला था कि भारत में रिश्वत एक साल में 11 फीसद बढ़ी है। इसमें पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सरकारी अधिकारी सबसे भ्रष्ट निकलकर सामने आए हैं।

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