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जम्मु-कश्मीर की सियासत का तापमान सर्दी के मौसम में भी खासी उबाल ले रहा है। एक तरफ बाइस साल बाद राज्य में राज्यपाल शासन लग चुका है, राज्यपाल पीडीपी-भाजपा गठबंधन सरकार गिरने के बाद कई ऐसे निर्णय ले चुके हैं जिन्हें लेकर राज्य के राजनीतिक दलों में बैचेनी बढ़ी है तो दूसरी तरफ पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती की पिपुल्स डेमाक्रेटिक पार्टी में सत्ता हाथ से फिसलने के साथ ही पार्टी अध्यक्ष के खिलाफ विरोध के स्वर मुखर होने लगे हैं। देश के गृहमंत्री और जम्मु-कश्मीर के सीएम रहे मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी महबूबा पहली बार 1996 में राज्य विधानसभा की सदस्य बन थी। उन्होंने बतौर नेता विपक्ष राज्य की राजनीति में गहरी छाप छोड़ी। 1999 में जब मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कांग्रेस छोड़ पीडीपी का गठन किया तो महबूबा नई पार्टी की उपाध्यक्ष बनाई गई थी। वे 2004 और 2014 में अनंतनाग संसदीय सीट से सांसद रही। पिता मुफ्ती सईद की मृत्यु पश्चात महबूबा मुफ्ती अप्रैल 2016 में गठबंधन सरकार में मुख्यमंत्री बनी महबूबा के नेतृत्व को लेकर हालांकि पार्टी भीतर असंतोष लंबे अर्से से पनप रहा था,  सरकार गिरने के बाद इसमें तेजी आई है। महबूबा के लिए सबसे बड़ा संकट उनके पिता के निकट सहयेागी और पीडीपी के संस्थापक सदस्य रहे मुज्जफर बेग हुसैन की नाराजगी रही है। मुफ्ती सरकार में राज्य के उपमुख्यमंत्री रह चुके हैं वर्तमान में बारामुला संसदीय सीट से सांसद मुज्जफर बेग ने कुछ अर्सा पहले सार्वजनिक रूप से महबूबा की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए पार्टी छोडत्रने की बात कह डाली थी। हालांकि फिलहाल महबूबा ने उन्हें ऐसा न करने के लिए राजी तो कर लिया है लेकिन लगातार एक के बाद एक वरिष्ठ नेताओं के पार्टी छोड़ने के चलते महबूबा का संकट समाप्त होता नहीं नजर आ रहा है। पार्टी नेतृत्व के खिलाफ खुली बगावत की शुरूआत विधान परिषद सदस्य यासिर रेशी और सैफुउद्दीन भट्ट ने की। दोनों ही पार्टी छोड़ते समय महबूबा की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। भाजपा और पीडीपी के असंभव समझे जाने वाले गठबंधन में चाणकय की भूमिका निभाने वाले हबीब दराबू ने भी पार्टी को अलविदा कह महबूबा के नेतृत्व को चुनौत दे डाली। हबीब दराबू गठबंधन सरकार में वित्त मंत्री थे। उन्हें महबूबा ने सरकार गिरने के कुछ अर्सा पहले ही मंत्री पद से हटा दिया था। महबूबा अभी हालात पर काबू पाने का प्रयास कर ही रही थीं कि तीन विधायक एक साथ पार्टी छोड़ पिपुल्स कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद से ही लगातार पार्टी नेताओं का महबूबा के खिलाफ विद्रोह जारी है। गत् सप्ताह दो वरिष्ठ नेताओं ने पीडीपी से इस्तीफा दे उमर अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस को ज्वाइन कर लिया। इनमें से एक सैयद बशरत बुखारी महबूबा सरकार में कानून मंत्री तो पीर मोहम्मद हुसैन राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष रह चुके हैं।
दरअसल अधिकतर पीडीपी नेताओं की नाराजगी महबूबा मुफ्ती के तानाशाही रवैये और अपने निकट परिजनों को पार्टी में आगे करने के चलते है। पूर्व मुख्यमंत्री और पार्टी के संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद के ज्यादातर सहयोगियों की नाराजगी नईम अख्तर को लेकर भी बताई जाती है। पीडब्लूडी महकमे के वजीर रह चुके नईम अख्तर पर पार्टी छोड़ने वाले नेताओं ने गंभीर भ्रष्टाचार के आरोप तक लगाए हैं। राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने इन आरोपों की जांच करने के लिए तत्काल एक आयोग गठित कर महबूबा की मुश्किलों को बढ़ाने का काम किया है। कुल मिलाकर पार्टी के भीतर महबूबा की नेतृत्व क्षमता को लेकर उठा बवंडर हाल फिलहाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। जाहिर है पीडीपी में मची रार से सबसे ज्यादा उत्साहित नेशनल कांफ्रेंस है जो अगले विधानसभा चुनावों में सत्ता में वापसी के सपने संजो रही है।

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