एक ऐसे समय में जब इंसान चांद पर बसने की तैयारी कर रहा है, भूख से होने वाली मौतें भय पैदा करती हैं
भूख सिर्फ पेट की नहीं होती। कइयों को पावर, सत्ता, कुर्सी और पैसे की भूख होती है। पेट की भूख से लोग -बच्चे मर जाते हैं। पावर, सत्ता, कुर्सी की भूख दूसरों को मारकर या कुचलकर मिटा ली जाती है। एक में गरीबी, बेबसी दिखती है और दूसरे में कुरूपता एवं अंहकार मगर यहां बात गरीबी से उत्पन्न भूख की।
पिछले सप्ताह राजधानी दिल्ली में तीन मासूम बहनों की मौत भूख से हो गई। सबसे छोटी सुक्का की उम्र 2 वर्ष, पारूल 4 साल और सबसे बड़ी मानसी सिर्फ 8 साल की  थी। इन तीन बहनों की मौत दो सरकारों की नाक नीचे हुई है। एक ने ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देकर सत्ता हासिल की। दूसरे ने ‘हम हैं आम आदमी’ का नारा दिया था। दिल्ली सरकार ने भाजपा-कांग्रेस से इतर वैकल्पिक राजनीति करने का वादा किया था। जिसके केंद्र में आम आदमी यानी गरीब-गुरूबा था। लेकिन हकीकत में आम आदमी पार्टी ने अन्य पारंपरिक राजनीतिक दलों की तरह की राजनीति शुरू की। जिस कारण पार्टी के केंद्र से गरीब लापता हो गया। तभी तो आम आदमी पार्टी की सरकार में तीन मासूमों की मौत भूख से हो गई। हां, दिल्ली सरकार इसके लिए उपराज्यपाल को दोष दे सकती है।
दिल्ली में भूख से बच्चों की मौत सिर्फ इसलिए आश्चर्यचकित नहीं करती है कि यह देश की राजधानी में हुआ, बल्कि यह इसलिए ज्यादा चिंतित करने वाला है कि देश के गरीब क्षेत्रों के लोग भूख से भागकर यहां पेट भरने पहुंचते हैं। मगर भूख ने उनका यहां भी पीछा नहीं छोड़ा। मासूम बच्चिं का पिता मंगल अपने पूरे परिवार के साथ पश्चिम बंगाल से दिल्ली आया था। ताकि यहां भूख से लड़ने का जुगाड़ हो सके। मंगल ने यहां रिक्शा चलाना शुरू किया। रिक्शा चलाकर भी वह अपने परिवार का पेट नहीं भर सका। नतीजा तीन मासूमों की मौत के रूप में आया।
दिल्ली से दूर झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा जैसे राज्यों में भूख से मौत नई खबर नहीं है। मगर दिल्ली के लिए यह नई जरूर है। जिस कारण कई सवाल भी उठने लाजमी हैं। दिल्ली से पहले झारखण्ड में हाल में ही भूख से मौतें हुई हैं। झारखंड के साथ बुंदेलखंड में भी भूख से मौत होती रही है। आखिर 21वीं सदी में जब चांद पर घर बनाने से लेकर देश में बुलेट ट्रेन चलाने पर काम हो रहा हो, उस देश में भूख से मौत शर्मनाक है। यही नहीं सरकारी गोदामों में अनाज सड़ रहा है और लोग भूख से मर रहे हैं।
भूख जैसे गंभीर मुद्दों पर राजनीतिक दल रंग रूप कैसे बदलते हैं, इसका एक उदाहरण यहां देता हूं। वर्ष 1966 में कालाहांडी के महाअकाल के दौरान कई लोगों की मौत भूख से हुई थी। तब राममनोहर लोहिया ने संसद में इस पर सवाल पूछे थे। तब की कांग्रेस सरकार ने उसे भूख से मौत नहीं माना था। तब जनसंघ (आज की भाजपा) इसे भूख से मौत मानती थी। आज भाजपा की झारखंड और केंद्र दोनों जगह सरकार हैं, पर वह नहीं मानती कि गिरीडीह की सावित्री देवी की मौत भूख से हुई। आम आदमी पार्टी सावित्री की मौत को भूख से हुई मौत मानती है, मगर दिल्ली में तीन मासूमों की मौत को भूख से नहीं मानती।
वैश्विक भूख सूचकांक की 119 देशों की सूची में भारत 100वें स्थान पर है। आपको जानकार हैरानी होगी कि दुनिया के कुपोषितों में से करीब 19 करोड़ लोग भारत में हैं। साल 2017 में आई यूएन की एक रिपोर्ट कहती है कि 2016 में दुनिया में कुपोषित लोगों की संख्या करीब 81 करोड़ थी और इसमें भारत का हिस्सा 23 फीसदी है। भारत में पांच साल से कम उम्र के 38 फीसदी बच्चे उचित पोषण की कमी में जीने को मजबूर हैं। ग्लोबल इंडेक्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारत भुखमरी से निपटने में उत्तर कोरिया, बांग्लादेश और ईराक से भी पीछे है। पूरे एशिया में भारत की रैकिंग तीसरे सबसे खराब स्थान पर है। भारत से और भी खराब रैकिंग अफगानिस्तान और पाकिस्तान की है।
बुंदेलखंड में भी हर साल भूख से लोगों की मौत होती है। इसे समझने के लिए साल 2015 में एक सर्वे किया गया था। जिसकी रिपोर्ट 2016 में जारी की गई थी। इस रिपोर्ट में सिस्टम पर गहरी चोट की गई थी। इस सर्वे को बुंदेलखण्ड ड्राउट इंपैक्ट असेस्मेंट सर्वे 2015 कहा गया। जिसमें हैरान और परेशान कर देने वाले तथ्य सामने आए थे। सर्वे में दावा किया गया था कि 108 गांवों के 53 फीसदी गरीब परिवारों को 8 महीने तक दाल नसीब नहीं हुई थी। 69 फीसदी गरीब लोगों ने दूध नहीं पिया था। सर्वे में कहा गया था कि बुंदेलखंड में हर 5वां परिवार हफ्ते में कम से कम एक दिन भूखा सोता है। सर्वे के मुताबिक पिछले वर्ष बुंदेलखंड के 38 फीसदी गांवों में भूख से मौतें हुई थीं।
यूनाइटेड नेशन की 2015 की रिपोर्ट कहती है कि भारत में एक्सट्रीम पॉवरटी यानी भयानक गरीबी के हालात में रहने वाले लोगों की संख्या करीब 30 करोड़ है। आपको ये जानकर हैरानी होगी कि दुनियाभर में भुखमरी का शिकार होने वाले कुल लोगों का एक चौथाई हिस्सा भारत में ही रहता है। 2015 के ग्लोबल हंगर इंडैक्स के मुताबिक, भुखमरी का सामना करने वाले लोगों की संख्या सबसे ज्यादा भारत में है। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत में साढ़े 19 करोड़ लोगों को जरूरत के मुताबिक भोजन नहीं मिलता है। यानी 30 करोड़ लोग भयानक रूप से गरीब हैं और 19 करोड़ लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिलता। भारत में 5 साल से कम उम्र के 40 फीसदी से ज्यादा बच्चों का वजन, तय मानकों से बेहद कम है।
एक आंकड़े के मुताबिक देश में हर रोज 18 करोड़ लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। फोरम फॉर लर्निंग एंड एक्शन विद इनोवेशन एंड राइगर की रिपोर्ट कहती है कि भारत में 5 साल के कम उम्र के 50 फीसदी बच्चों की मौत कुपोषण की वजह से होती है। हेल्पेज इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 5 करोड़ लोग भूखे पेट सोने पर मजबूर हैं। यानी भूख उम्र में फर्क नहीं करती, चाहे बच्चे हों या बुज़ुर्ग भूख की मार सब पर पड़ती है। केंद्र और राज्य दोनों के स्तर पर भूख से होने वाली मौत को रोकने के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। जिनमें बीपीएल योजना, अंत्योदय अन्न योजना और अन्नपूर्णा योजनाएं शामिल हैं। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून देश की दो तिहाई आबादी को सस्ता अनाज देने की गारंटी भी देता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। इस हकीकत को ऐसे समझा जा सकता है।
देश में हर साल 2 करोड़ 10 लाख टन गेंहू बर्बाद होता है। यह ऑस्ट्रेलिया में गेहूं के कुल उत्पादन के बराबर है। वर्ष 2010 से 2015 के बीच 26 हजार टन से ज्यादा गेंहू फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एफसीआई) के गोदाम में पड़े-पड़े बर्बाद हो गया। सही रख-रखाव, ट्रांसपोर्ट और दूसरे कारणों से देश में 40 फीसदी से ज्यादा फल और सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं। मगर गरीबों की थाली तक नहीं पहुंचती। वर्ष 2028 तक भारत की आबादी 145 करोड़ होने का अनुमान है। अगर जल्द ही उचित कदम नहीं उठाए गए तो हालात बहुत खराब हो जाएंगे।
  • भूख से निपटने में भारत अपने पड़ोसी देशों से काफी पीछे है। रिपोर्ट के मुताबिक चीन (29वें), नेपाल (72वें), म्यांमार (77वें), श्रीलंका (84वें) और बांग्लादेश (88वें) स्थान पर रहे। भारत का सौंवा स्थान है।
  • 20,000 बच्चे दुनियाभर में भूख के कारण रोज मरते हैं।
  • 80 प्रतिशत लोग 10 डॉलर प्रतिदिन से कम पर गुजर- बसर करते हैं।
  • दुनिया में हर 9 में से 1 आदमी रोज भूखे सोने को मजबूर।
  • दुनिया में 80.5 करोड़ लोगों को भरपेट खाने को नहीं मिलता।
  • इनमें 79.1 करोड़ लोग विकासशील देशों के हैं।
  • 52.6 करोड़ लोग एशिया में आधा पेट खाने को मजबूर।
  • हर साल एड्स, मलेरिया और टीबी से कुल जितने लोग मरते हैं, उससे ज्यादा लोगों को भूख निगल जाती है।
  • 13.5 प्रतिशत विकासशील देशों की आबादी का वह हिस्सा है, जो कुपोषण का शिकार है। 

‘गरीबी सिर्फ राजनीतिक मुद्दा’

वरिष्ठ समाजशास्त्री इम्तियाज अहमद से बातचीत
भूख से हुई मौत पर आप क्या कहेंगे?
इस सब पर कह और लिखकर अब थक गया हूं। परिवर्तन कुछ नहीं हुआ। फिर भी मैं निराश नहीं हूं। देश-प्रदेश में किसी की भी सरकार हो। सब एक जैसा है। जिन्होंने दशकों तक विपक्ष में रहकर आम आज सत्ता में आने के बाद उन्होंने क्या बदलाव कर लिया? गरीबी-किसानी सिर्फ राजनीतिक मुद्दा भर रह गया है।
भुखमरी समाज से जुड़ी है या आर्थिकी से?
दोनों से। हम किसे समाज कहते हैं। हमारा पड़ोसी भूख से मर रहा है और हम अच्छी नींद सो रहे हैं। यह समाज नहीं है। आर्थिकी तो है ही। यह अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ रही खाई की उपज है। पहले भुखमरी अनाज की कमी के कारण होती थी, आज भंडार भरा हुआ है। फिर भी भूख से लोग मर रहे हैं।
गरीबों को अनाज उपलब्ध कराने के लिए कई सरकारी योजनाएं हैं फिर भी मौतें हो रही हैं?
सरकार की सभी योजनाओं में भ्रष्टाचार की दीमक लगी हुई है। जो बिना पानी पीए पूरे अनाज को खोखला कर देती है।

‘केजरीवाल सरकार जिम्मेदार’

दिल्ली विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता से बातचीत
दिल्ली में भूख से तीन बच्चियों की मौत के लिए आप किसे जिम्मेदार मानते हैं?
इसकी पूरी जिम्मेवारी दिल्ली की केजरीवाल सरकार की है। दिल्ली में अधिकतर प्रवासी लोग हैं। लाखों गरीब प्रवासियों के राशन कार्ड बने हुए हैं। जिसमें 4 लाख से अधिक राशन कार्ड फर्जी हैं। सरकार को फर्जी राशन कार्ड को केंसल कर बाद में आए गरीब लोगों को देना चाहिए था। मगर केजरीवाल सरकार उन फर्जी राशन कार्ड के अनाज का घोटाला कर रही है।
यह मौतें तो केंद्र सरकार की नाक नीचे भी हुई हैं?
ऐसा आप मानते हैं। केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों को सिर्फ अनाज उपलब्ध कराती है। उसका वितरण राज्य सरकार को करना होता है। यदि केंद्र सरकार दिल्ली के हिस्से का अनाज नहीं देती तब आप केंद्र को भी दोषी मान सकते थे। केंद्र से हर साल दिल्ली को कोटे से ज्यादा अनाज मिल रहा है।
भूख से मौत झारखण्ड, बुंदेलखंड और महाराष्ट्र जैसे बीजेपी शासित राज्यों में भी हुई हैं। उसके लिए तो आप वहां की बीजेपी सरकार को जिम्मेवार मानेंगे?
उन राज्यों के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। इसलिए उस पर कहना सही नहीं होगा।

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