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कम मतदान, किसे फायदा-नुकसान

आम चुनाव 2024 के लिए मतदान का पहला चरण 19 अप्रैल और दूसरा चरण 26 अप्रैल को हुआ था। अब तीसरा चरण 7 मई को होगा, जिसमें 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 94 सीट शामिल हैं। लेकिन अभी तक संम्पन हुए दोनों चरणों में मतदान प्रतिशत में गिरावट होने को लेकर नई बहस और सियासी गुणा-भाग का दौर शुरू हो गया है। पूछा जा रहा है कि कम वोटिंग से किसे फायदा और किसे नुकसान होगा। गौरतलब है कि 19 अप्रैल को 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की कुल 102 सीटों पर वोटिंग हुई। पहले फेज की वोटिंग में करीब 63 फीसदी वोट पड़े। जबकि इन्हीं सीटों पर 2019 के आम चुनाव में 66.44 प्रतिशत मतदान हुआ था। दूसरे चरण में 26 अप्रैल को 12 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की कुल 88 सीटों पर मतदान हुआ जिसमें 63 फीसदी मतदाताओं ने ही अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया जबकि 2019 में इन्हीं सीटों पर 70.05 प्रतिशत मतदान दर्ज गया किया था।

दूसरे चूरण में त्रिपुरा में सबसे ज्यादा करीब 78.63 प्रतिशत मतदाताओं ने मतदान किया, वहीं महाराष्ट्र, बिहार और उत्तर प्रदेश में सबसे कम 54 फीसदी के आस-पास वोट डाले गए। जबकि असम में 70.68 प्रतिशत लोगों ने वोट डाला। दूसरी तरफ छत्तीसगढ़ में 73.05, मध्य प्रदेश 56.60, राजस्थान 63.74, जम्मू-कश्मीर 71.63, कर्नाटक 67, केरल 65, पश्चिम बंगाल 71.84 और मणिपुर में 77.18 प्रतिशत लोगों ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। हालांकि ये अनुमानित आंकड़े हैं, इनमें थोड़ा-बहुत ऊपर नीचे हो सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कम मतदान अच्छी खबर नहीं है। इससे समझ में आता है कि लोकसभा चुनाव को लेकर मतदाताओं में कुछ उदासीनता है। अगर हम 2019 के आम चुनाव से तुलना करें तो उदासीनता साफ दिखाई पड़ती है। कम वोटिंग से किसे फायदा मिलेगा और किसका नुकसान होगा वास्तव में इसका कोई हिसाब नहीं होता है। कई बार कम मतदान होने के बाद भी सरकारें जीत जाती हैं तो कई बार हारती भी हैं। बीते 17 लोकसभा चुनावों में वोटिंग फीसदी देखें तो 5 बार मतदान घटा है जिसमें 4 बार सरकार बदली है और 7 बार मतदान बढ़ा तो 4 बार सरकार बदली है।

अगर दूसरे फेज में उत्तर प्रदेश की 8 सीटों पर हुई वोटिंग की बात करें तो इनमें अमरोहा में सबसे ज्यादा 62 प्रतिशत वोटिंग हुई है। जबकि 2019 में इस सीट पर 71 फीसदी मतदान दर्ज किया गया था। मथुरा में पिछले चुनाव में 61 फीसदी मतदान हुआ था लेकिन इस बार महज 47 प्रतिशत मतदाताओं ने ही मतदान किया। ऐसी स्थिति में जानकार कहते हैं कि कम मतदान इसलिए बुरी खबर है कि भारतीय मतदाता अभी भी तटस्थ हैं। कम वोटिंग ट्रेंड का राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कोई बात न निकल आए, लेकिन एक विशेष सीट पर और विशेष क्षेत्र पर कम वोटिंग के अपने मायने और अपनी वजहें हो सकती हैं। दूसरी तरफ केरल की सभी 20 सीटों पर मतदान हो गया है। यहां पिछले 3 चुनावों से बीजेपी के हाथ खाली हैं। इस बार बीजेपी ने यूडीएफ और एलडीएफ के बीच में एंट्री मारी है। पीएम मोदी ने केरल में कम से कम 10 सीटें जीतने की बात कही है। दूसरे फेज में शशि थरूर की तिरुवनंतपुरम सीट पर 31.3 पथानामथिट्टा 29, त्रिशूर में 28.2, अट्टिंगल 24.7 और पलक्कड़ में 21.3 प्रतिशत वोटिंग हुई है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि क्या बीजेपी केरल में कोई गेम कर सकती है?

राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ‘केरल में जरूर बीजेपी जोर लगा रही है लेकिन यहां लोकल राजनीति को भी देखना पड़ेगा। एलडीएफ और यूडीएफ के बीच जो राजनीति हो रही है, उसका असर भी दिखेगा। राज्य में अभी एलडीएफ की सरकार है। एलडीएफ ये कोशिश कर रही है कि लोकसभा चुनाव में भी अच्छा प्रदर्शन किया जाए।’ दक्षिण भारत में कर्नाटक की 28 सीटों में से 14 सीटों पर दूसरे चरण में मतदान हुआ। पिछले चुनाव में बीजेपी ने यहां 28 में से 25 सीटें जीती थी, लेकिन पिछले साल हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने बाजी पलट दी और राज्य की सत्ता में आ गई। ऐसे में सवाल है कि क्या बीजेपी पिछले लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन दोहराएगी या कांग्रेस लोकसभा सीटों पर कब्जा कर पाएगी?

जानकार कहते हैं कि केरल में तो मुश्किल लगता है, लेकिन कर्नाटक में संभावनाएं हैं। कर्नाटक का इतिहास देखें, तो विधानसभा में जिस तरह से वोट होता है, उससे अलग लोकसभा का वोट होता है। लोकसभा चुनाव में बीजेपी के पक्ष में फिर से वोट हो सकता है। अगर महाराष्ट्र की बात करें तो यह महत्वपूर्ण राज्य है। यहां लोकसभा की 48 सीटें हैं जो बहुत बड़ा नंबर है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि शिवसेना में दरार और दो फाड़ के बाद पहली बार पता चलेगा कि असली शिवसेना कौन है। ये पहली बार हो रहा है कि उद्धव ठाकरे वाली शिवसेना अब बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ रही है। यहां फिलहाल वेट एंड वॉच वाली स्थिति है।

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