आगामी 2019 के लोकसभा चुनाव के पहले विधानसभा चुनाव जारी हैं। छत्तीसगढ़ में एक चरण के चुनाव तो हो भी गए। वैसे तो पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं। मगर सुर्खियों में सिर्फ राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ ही हैं। तीनों राज्यों में भाजपा की सरकार है। खास बात यह है कि इन राज्यों के विधानसभा चुनाव की खबरें उस तरह से सुर्खियां नहीं बन पा रही है। जैसे उम्मीद की जा रही हैं। इसके पीछे एक वजह यह भी बताई जा रही है कि मीडिया और केंद्र सरकार का सारा ध्यान आगामी लोकसभा चुनाव पर है। चूंकि इन तीन राज्यों में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ भी नहीं है, जो कुछ भी खोना है वह भाजपा को। इसी कारण यहां खोने से भाजपा भयभीत भी है।

राजस्थान में महारानी के खिलाफ माहौल बताया जा रहा है। जिसका लाभ सीधे कांग्रेस को मिल सकता है। नतीजे कुछ भी हों मगर महारानी फॉर्म में हैं। यहां भाजपा ने दूसरी सूची भी जारी कर दी। दूसरी सूची में 31 उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की गई है। भाजपा ने इसके पहले 131 लोगों की सूची जारी की थी। दो सौ विधानसभा सीटों पर 28 नवंबर को वोटिंग होगी और नतीजे 7 दिसंबर को आएंगे। भाजपा की इस सूची में 15 विधायकों को शामिल नहीं किया गया। भाजपा ने अब तक जिन 162 उम्मीदवारों का ऐलान किया है उनमें निवर्तमान मंत्री बाबूलाल वर्मा, राजकुमार रिनवा, धन सिंह रावत और विधायक ज्ञानदेव आहुजा का नाम भी इसमें शामिल नहीं है।

इस बीच राजस्थान भाजपा से कई लोगों का मोहभंग हुआ और उन्होंने पार्टी छोड़ कांग्रेस का हाथ थाम लिया। भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह के पुत्र मानवेंद्र भी सूची जारी होने से बहुत पहले ही भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। यह प्रदेश भाजपा के लिए बड़ा झटका था। राज्य सरकार में मंत्री सुरेंद्र गोयल ने भी पार्टी छोड़ी। भाजपा के पूर्व महासचिव कुलदीप धाकड़ ने अपनी उपेक्षा से दुखी होकर पार्टी छोड़ी है। 14 नवंबर को भाजपा को एक और बड़ा झटका तब लगा जब भाजपा सांसद हरीश मीणा कांग्रेस में शामिल हो गए। कांग्रेस की राज्य ईकाई के अध्यक्ष सचिन पायलट और महासचिव अशोक गहलोत की उपस्थिति में दौसा के सांसद और राजस्थान के पूर्व पुलिस महानिदेशक हरीश मीणा को औपचारिक रूप से कांग्रेस में शामिल किया गया।

राजनीतिक पंडितों के अनुसार मतदान के पूर्व नेताओं की एक पार्टी से दूसरी पार्टी में शिफ्टिंग नतीजों का भी संकेत होता है। जिस पार्टी के पक्ष में माहौल होता है। उसके प्रति नेताओं को झुकाव ज्यादा होता है। कांग्रेस के पक्ष में एक और अच्छी बात यह हुई है कि प्रदेश के दो दिग्गजों सचिन पायलट और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच समझौते के संकेत दिखाई देने लगे हैं।

मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति उस तरह से नहीं दिखाई दे रही है। अलबत्ता भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने जैसे अपनी पूरी शक्ति वहां झोक दी है। अभी 15 नवंबर को वे फिर से मध्य प्रदेश रवाना हो गए। यह उनका 12 दिनों का दौरा है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यहां अपनी बदौलत मोर्चा संभाला। वे पिछले तीन टर्म से मुख्यमंत्री हैं। उनको यहां मध्य प्रदेश का मोदी कहा जाने लगा है। प्रदेश में 28 नवंबर को मतदान होना है और 11 दिसंबर को नतीजे घोषित कर दिए जाएंगे। कहा जा सकता है कि यह चुनाव परवान चढ़ रहा है। कांग्रेस के कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया से जो उम्मीदें थी उसके बरक्स उनका प्रदर्शन कमतर दिखाई दे रहा है। इन नेताओं में आक्रमकता का अभाव है। जो है सब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के ही भरोसे है।

छत्तीसगढ़ भले ही छोटा राज्य है। मगर यहां नक्सलियों की मौजूदगी ने प्रदेश को अशांत कर दिया है। उसका चुनाव पर भी फर्क पड़ता है। लेकिन पहले चरण में 70 प्रतिशत मतदान इस बात का सबूत है कि नक्सिलयों के चुनाव बहिष्कार की अपील को लोगों ने अनुसुना कर दिया है। नक्सिलयों के बंद-बहिष्कार के बावजूद वोटरों में गजब का जोश दिखाई दिया। यहां कांग्रेस-भाजपा की सीधी लड़ाई थी, जिसे अजीत जोगी और बसपा गठबंधन ने त्रिकोणीय बना दिया। भाजपा के रमण सिंह भी तीन बार से मुख्यमंत्री हैं। कहा जा रहा है कि इस बार भी उनकी वापसी हो सकती है। क्योंकि अजीत जोगी-बसपा गठबंधन कांग्रेस के वोट काट रहा है।

कुल मिलाकर तीनों प्रदेश में स्थानीय सवाल और मुद्दे चुनाव में ज्यादा हावी हैं। लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार का कार्य भी वोटरों का ही मन प्रभावित कर रहा है। राष्ट्रीय मुद्दों की इन चुनावी भाषणों में चर्चा जरूर हुई। इन मुद्दों ने वोटरों को प्रभावित भी किया है। लेकिन राज्यों में मामला अपने प्रदेश हित के लिए मुख्यमंत्री चुनने का भी होता है। इस कारण स्थानीय सियासी स्थिति को मतदाता ज्यादा अहमियत देते हैं। यह भी कहा जा रहा है इन तीन राज्यों के नतीजे आगामी लोकसभा चुनाव से पहले के सेमिफाइनल भी है। यह 2019 का संकेत देंगे कि माहौल किसके पक्ष में हैं। सारा मामला माइंड गेम का भी है। तीनों राज्यों में से कहीं भी सत्ता खोना भाजपा का मनोबल कम करेगा। बेशक राज्यों में सफलता असफलता के लिए यहां मुख्यमंत्री ज्यादा जिम्मेदार है। मगर पार्टी की कामयाबी नाकामी को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़कर देखा जा रहा है।

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