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लालू का बिखरता साम्राज्य, नहीं संभाल पा रहे तेजस्वी

लालू का बिखरता साम्राज्य, नही संभाल पा रहे तेजस्वी

कुछ दिनों पहले राष्ट्रीय जनता दल  की एक रैली हो रही थी। रैली में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के पुत्र तेजस्वी यादव मंच पर कुछ इस अंदाज में बैठे थे कि लालू के करीबी रहे वरिष्ठ नेताओं को उनका यह अंदाज रास नहीं आया। तेजस्वी यादव का पैर के ऊपर पैर रखकर बैठना और अपनी पार्टी के तथा पिता के करीबी नेताओं को मान-सम्मान न देना राजद के वरिष्ठ नेताओं को बहुत अखर रहा है।

सुत्र बताते हैं कि कुछ समय पहले सीवान में एक रैली थी। मंच पर तेजस्वी यादव और राजद के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे। तेजस्वी आए और मंच पर कुछ इस तरह से बैठे की अवध बिहारी चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेताओं को पसंद नहीं आया। उसके कुछ देर बाद अवध बिहारी चौधरी मन-ही-मन नाराज होकर वहां से उठे और चले गए। उसके बाद से अवध बिहारी चौधरी ऐसे मंचों पर कम दिखने लगे। अवध बिहारी चौधरी कभी लालू यादव का राजनीतिक साया कहे जाते थे।

देखा जाए तो चारा घोटाला में जब से लालू प्रसाद यादव जेल गए हैं उनका कुनबा और पार्टी बिखरने की ओर जाती हुई दिख रही है। पहले तो उनके परिवार में उनके वारिस को लेकर आपसी तकरार। फिर रही सही कसर बहू ऐश्वर्या राय के द्वारा हुए केस दर्ज और तलाक की नौबत ने बिहार में लालू परिवार की कमजोरी को जगजाहिर कर दिया। पिछले साल अक्टूबर महीने की बात है जब लालू के बहुत करीबी रहे विधायक महेश्वर यादव ने यह कहकर सनसनी फैला दी कि राजद के कुछ नेताओं के अंदर बगावत के तेवर उभरने लगे हैं। पार्टी में जल्द ही दरार पड़ सकती है। महेश्वर यादव का यह कहना बिहार की राजद राजनीति में बहुत बड़े संकेत देता हुआ प्रतीत होता है। अगर तेजस्वी यादव चाहते तो इस संकेत को समझते हुए लालू के करीबी रहे वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में रखने का प्रयास करते। लेकिन देखने में आया कि तेजस्वी ऐसा नहीं कर पाए।

बहरहाल, लालू प्रसाद यादव के साथ साए की तरह रहकर उनके सत्ता प्रतिष्ठान को मजबूत करने वाले उनके स्तंभ आज अपने-आपको हाशिए पर जाते हुए महसूस करने लगा है। यहां तक कि वह अब पार्टियों के कार्यक्रमों और मीटिंग से भी दूर नजर होते आ रहे हैं। इसी के साथ लोकसभा चुनाव के दौरान लालू के करीबी रहे पुराने नेता अली अरशद फातमी भी तेजस्वी यादव से नाराज होकर पार्टी छोड़ चुके हैं।

तेजस्वी यादव की असफल होती राजनीति का यह एक पहलू है। दूसरा पहलू यह भी है कि तेजस्वी यादव फिलहाल लालू प्रसाद यादव के समय के वरिष्ठ और वृद्ध नेताओं को दरकिनार करके युवाओं को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं। इसका नुकसान उन्हें इस तरह उठाना पड़ रहा है कि राजनीतिक अपरिपक्व नेता आगे आ रहे हैं और अनुभव वाले सुलझे हुए नेता पीछे जा रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ पार्टी के साथ-साथ तेजस्वी यादव को अपने बिखरते परिवार की भी चिंता सताए जा रही है। देखा जाए तो राज्य में आंतरिक कलह सिर्फ राज राजद के नेताओं के अंदर ही नहीं बल्कि उनके परिवार में भी गहरे तक पैठ बना चुका है। आज पूरा लालू यादव का परिवार इस जद में आ चुका है।

तेजस्वी के छोटे भाई तेज प्रताप यादव की पत्नी ऐश्वर्या राय के साथ खराब होते रिश्ते हर बार अखबार की सुर्खियां बनते हैं। यहां तक कि ऐश्वर्या राय के द्वारा लालू परिवार खासकर उनकी पत्नी राबड़ी देवी पर लगाए जाने वाले आरोप उनकी पारिवारिक छवि को धूमिल करते हुए नजर आ रहे हैं। हालांकि, दोनों पति पत्नियों में फिलहाल बात तलाक तक पहुंच चुकी है। लेकिन पारिवारिक कलह के बाद राजद नेताओं को इसके साइड इफेक्ट का अंदाजा होने लगा है।

लालू यादव के जमाने के पार्टी के वरिष्ठ नेता अब जैसे साइड होने लगे हैं। शायद यही वजह रही कि गत वर्ष हुए लोकसभा के चुनाव में राजद को विपरीत परिणाम देखने पड़े। अब फिलहाल पार्टी के लिए महत्वपूर्ण बात बिहार में अक्टूबर माह में होने वाले विधानसभा चुनाव हैं। इन चुनावों में राजद की स्थिति क्या होगी यह तो आने वाला ही समय बताएगा।

लेकिन फिलहाल राजद के पुराने स्तंभ वरिष्ठ नेता फिलहाल अपने आप को लालू के जेल जाने के बाद अकेला महसूस करने लगे हैं। शायद यही वजह है कि वह अलग-थलग पड़ गए हैं। हालांकि, बीच-बीच में वह तेजस्वी यादव को आगाह करते रहते हैं। ऐसे ही एक राजद के कद्दावर नेता रघुवंश प्रताप सिंह है। जो तेजस्वी की नेतृत्व शैली पर कई बार प्रश्नचिन्ह लगा चुके हैं।

उन्होंने तेजस्वी को कई बार आगाह किया कि राजद के कुछ पुराने नेता टूट सकते हैं। इसका असर पिछले दिनों लोकसभा चुनाव में सामने आया था राजद के लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद तो जैसे राजद बैकफुट पर आ गई है। जिसका असर आने वाले विधानसभा चुनाव में भी दिख सकता है। अगर यही हालात रहे तो बिहार की कभी सबसे बड़ी पार्टी आज तीसरे नंबर पर पहुंच सकती है।

दूसरी तरफ कांग्रेस से गठबंधन की संभावनाएं भी दिनों दिन छीण होती जा रही है। हालांकि, दिल्ली के विधानसभा चुनाव में राजद का कांग्रेस से गठबंधन हुआ था। इस गठबंधन में राजद को विधानसभा चुनाव लड़ने के लिए कांग्रेस ने 4 सीट दी थी। राजद चारों सीटों पर अपने प्रत्याशियों की जमानत जब्त होने होने से नहीं बचा सकी।

चर्चा थी कि दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस और राजद मिलकर बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति बना सकते हैं। लेकिन सुनने में आ रहा है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुई करारी हार के बाद कांग्रेस ने राजद की तरफ से मुंह मोड़ लिया है। ऐसे में गठबंधन की बात करना भी संभव नहीं लग रहा है।

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