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कृष्ण का वैभव बरक़रार , दो IPS पर FIR , निलंबन को तैयार

याद कीजिए 9 महीने पहले की वह तारीख । 9 जनवरी 2020। इस दिन गौतम बुध नगर के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। जिसमें उन्होंने गाजियाबाद के तत्कालीन एसएसपी अजय पाल शर्मा सहित प्रदेश के 5 आईपीएस ऑफिसरो पर गंभीर आरोप लगाए थे। यह आरोप प्रदेश में ट्रांसफर पोस्टिंग के थे। इस ट्रांसफर पोस्टिंग के खेल में उन्होंने पत्रकारों की सहभागिता को भी उजागर किया था। गौतम बुध नगर के तत्कालीन एसएसपी वैभव कृष्ण पर तब यह आरोप लगे थे कि उन्होंने अपने ऊपर चल रहे एक अश्लील वीडियो के मामले को भटकाने के लिए इस मामले को उछाल दिया है।

 

यही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश पुलिस के हाईकमान की तरफ से वैभव कृष्ण को यह तक नोटिस दिया गया कि उन्होंने इस मामले को मीडिया के सामने क्यों उजागर किया ? साथ ही सरकारी दस्तावेजों को मीडिया को लीकेज करने के आरोप में वैभव पर मुकदमें तक दर्ज करने के आदेश हुए थे। यही नहीं बल्कि वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण पुलिस की नजरों में अविश्वसनीय करार दे दिए गए थे ।

 

लेकिन आज 10 महीने बाद वैभव कृष्ण की भ्रष्टाचार के मामले पर जीत हुई है। दस महीने पहले वैभव कृष्ण ने जिस भ्रष्टाचार के मामले पर आगाज किया था आज वह अंजाम तक पंहुचा है। फ़िलहाल मेरठ विजलेंस ने दो आईपीएस अजयपाल शर्मा और हिमांशु कुमार और तीन पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज कर दी है। इसके साथ ही योगी सरकार अब दोनों आरोपी आईपीएस पर निलंबन की तयारी कर रही है।

 

गौरतलब है कि दस महीने पहले गौतमबुद्ध नगर जिले के तत्कालीन वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण ने एक सनसनीखेज मामले को प्रदेश के डीजीपी के सामने उजागर किया था।जिसमे उत्तर प्रदेश पुलिस की ट्रांसफर पोस्टिंग की पोल खोली गई थी। जिसमे उन्होंने प्रदेश के कई अफसरों के साथ ही पत्रकारों के इस खेल में शामिल होने के सबूत दिए थे। लेकिन प्रदेश पुलिस मुख्यालय इस मामले पर रहस्यमय चुप्पी साध गया।

 

इसके एक माह बाद वैभव कृष्ण ने मीडिया के समक्ष कहा कि महीने भर पहले ही उन्होंने उत्तर प्रदेश शासन को एक अति संवेदनशील रिपोर्ट भेजी थी, जिसमें एक संगठित गिरोह के बारे में अवगत कराया गया था। ये लोग गौतमबुद्ध नगर और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में एक संगठित गिरोह बनाकर ठेके दिलवाने, तबादला कराने तथा अपराधिक कृत्य कराने का गिरोह चला रहे हैं।

 

वैभव कृष्ण ने सरकार को जो रिपोर्ट भेजी थी, उसमें रामपुर के पुलिस अधीक्षक अजयपाल शर्मा, गाजियाबाद के एसएसपी सुधीर सिंह, बांदा के पुलिस अधीक्षक गणेश साहा, कुशीनगर के पूर्व पुलिस अधीक्षक राजीव नारायण मिश्र और सुल्तानपुर के एसपी हिमांशु कुमार, मुख्य सचिव के मीडिया निदेशक दिवाकर खरे समेत कई पत्रकारों और कुछ अधिकारियों का नाम शामिल था। सरकार ने पांचों आईपीएस अफसरों को उनके जिलों से हटा दिया था। साथ ही मुख्य सचिव के मीडिया निदेशक पर भी कार्रवाई की गई थी।

 

करप्शन के आरोपों के घेरे में आई पांचों आईपीएस अफसरों के खिलाफ जांच के लिये सीएम योगी आदित्यनाथ के आदेश पर एसआईटी का गठन किया गया । इस एसआईटी का नेतृत्व डीजी विजिलेंस हितेश चंद्र अवस्थी किया, जबकि आईजी एसटीएफ अमिताभ यश व एमडी जल निगम विकास गोठवाल को इसका सदस्य बनाया गया । एसआईटी को पिछले साल ही 15 दिन में जांच पूरी कर रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया। लेकिन 15 दिन की बजाय यह जाँच रिपोर्ट मार्च में पूरी हुई।

 

 एसआईटी की रिपोर्ट मिलने के बाद शासन ने विजिलेंस को इस मामले की जांच सौंप दी गई। इस रिपोर्ट में दो आईपीएस के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की संस्तुति की गई थी। शासन के निर्देश पर विजिलेंस ने इस मामले की जांच शुरू कर तथ्यों को जुटाते हुए रिपोर्ट तैयार की है। फ़िलहाल मेरठ बिजलेंस ने इस मामले पर दो आईपीएस और तीन पत्रकारों पर एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए है।

 

बिजलेंस की इस एफआईआर में आईपीएस अजय पल शर्मा और आईपीएस हिमांशु कुमार के साथ ही कथित पत्रकार चंदन राय, स्वप्निल राय और अतुल शुक्ला का नाम भी शामिल है।  इन सभी पर सरकारी अधिकारी को भ्रष्टाचार के लिए प्रेरित करने का आरोप है। सभी के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट की धारा 8 और 12 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। इस मामले में विजलेंस ने नौ ऑडियो रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर पेश किए थे। जिनमे आईपीएस अजयपाल शर्मा और पत्रकारों की बातचीत है। इन ऑडियो में ट्रांसफर पोस्टिंग के लिए 80 लाख रुपये की बातें हो रही है।

साथ ही ग्रेटर नोएडा के एक गैंगस्टर अनिल भाटी से भी जेल में होने के दौरान भी अजयपाल शर्मा की चैटिंग सामने आई थी। जिससे लेनदेन का मामला भी उजागर हुआ था। इसके अलावा विजलेंस को और भी कई पुख्ता सबूत हाथ लगे है। जिनके आधार पर अजयपाल शर्मा और हिमांशु कुमार के खिलाफ एफआईआर हुई है। इसके अलावा आईपीएस डॉ.अजय पाल शर्मा पर उनकी कथित पत्नी दीप्ति शर्मा ने उत्पीड़न व झूठे मुकदमों में फंसाने के गंभीर आरोप लगाए थे। मामले में डॉ.अजय पाल के अलावा कुछ अन्य पुलिसकर्मी भी आरोपों के घेरे में हैं।

 

गाजियाबाद के साहिबाबाद स्थित आस्था अपार्टमेंट में रहने वाली वकील दीप्ति शर्मा उस वक्त दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहीं थीं। उनका दावा था कि 2016 में अजय पाल शर्मा के साथ उनकी शादी गाजियाबाद में रजिस्टर्ड भी हुई थी।  दीप्ति का कहना था कि डॉ. अजय पाल से उनके रिश्ते कुछ बातों को लेकर खराब हो गए थे।  इस संबंध में उन्होंने महिला आयोग, पुलिस विभाग, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में शिकायत भी की थी। शिकायती पत्रों के साथ उन्होंने शादी के सबूत भी लगाए थे।

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