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खबरों में ‘खबर लहरिया’

ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामित हुई फिल्म ‘राइटिंग विद फायर’ विश्व स्तर पर प्रशंसा तो बटोर रही है लेकिन जिस अखबार ‘खबर लहरिया’ की कहानी को इस फिल्म में दिखाया गया है, उस अखबार के संचालक और उससे जुड़े पत्रकारों ने इस फिल्म से खुद को अलग करते हुए पूरे मामले को विवादित बना डाला है

भारतीय फिल्म ‘राइटिंग विद फायर’ पिछले कुछ दिनों से काफी चर्चा में है। इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म को 94वें अकादमी पुरस्कार ऑस्कर-2022 में शामिल किया गया। लेकिन ऑस्कर जीतने में कामयाब नहीं रही। इसकी जगह बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फीचर फिल्म ऑस्कर 2022 का अवार्ड ‘समर ऑफ सोल’ को मिला है। भले ही ‘राइटिंग विद फायर’ फिल्म ने ऑस्कर अवार्ड न जीता हो लेकिन इसकी दुनियाभर में सराहना की जा रही है। सुष्मित घोष और रिंटू थॉमस द्वारा निर्देशित, निर्मित और संपादित फिल्म ‘राइटिंग विद फायर’ उत्तर प्रदेश की दलित महिला पत्रकारों द्वारा संचालित समाचार पत्र ‘खबर लहरिया’ की कहानी पर आधारित है। ‘खबर लहरिया’ को चलाने वाली महिलाएं, देश के सबसे कमजोर और हाशिए पर पड़े तबकों, मसलन दलितों, मुसलमानों और आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। इनमें से कई महिलाएं बाल खनन मजदूर रह चुकी हैं। बाल विवाह की शिकार, घरेलू हिंसा और शोषण की शिकार औरतें भी इसका हिस्सा हैं।

इन सभी महिलाओं ने समाज में भेदभाव और शोषण को सहा है। ये महिलाएं जो खबर सुनाती हैं, उनमें से कई खबरों में तो खुद उनकी आपबीती होती है। ‘राइटिंग विद फायर’ डॉक्यूमेंट्री फिल्म उस समय बनाई गई है, जब भारत में पत्रकारिता मुश्किल दौर से गुजर रही है। इस वक्त देश के बहुत ही नामी पत्रकार बिना कोई सवाल किए सरकार की बातों को दोहराते हैं तो वहीं सरकार के खिलाफ बोलने वाले या तो जेल जाते हैं या बेवजह मीडिया संस्थानों से निकाले जाते हैं। ऐसे वक्त में इस फिल्म ने ‘खबर लहरिया’ के पत्रकारों और भारतीय पत्रकारिता को अंतरराष्ट्रीय फोकस पर ला दिया है। इस डॉक्यूमेंट्री के चलते ‘खबर लहरिया’ की टीम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। फिल्म निर्माताओं के अनुसार ‘खबर लहरिया’ के पत्रकारों को कई अंतरराष्ट्रीय समारोह और पैनल चर्चाओं का हिस्सा बनने का मौका मिला। लेकिन टीम ‘खबर लहरिया’ ने इस डॉक्यूमेंट्री पर बड़े सवाल खड़े करते हुए इससे खुद को दूर कर खासा विवाद पैदा कर डाला है। ‘खबर लहरिया’ की टीम ने अपने एक बयान में कहा है कि ‘इस फिल्म में एक राजनीतिक दल’ के मुद्दों को ही केंद्रित कर दिखाया है। लेकिन यह हमारा सच नहीं है। पिछले दो दशकों से कई पार्टियों के बारे में खबरें दी हैं और सभी को तब आईना दिखाया है, जब उन्होंने अपने किए गए वादे पूरे नहीं किए। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि ‘हमें गर्व है कि उनकी उपलब्धियों पर एक फिल्म बनाई गई लेकिन काश इसका बेहतर चित्रण होता।’

‘खबर लहरिया’ के इस बयान से सकते में आए फिल्म निर्देशक रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष का बयान सामने आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘उन्हें विश्वास नहीं है कि इस फिल्म में ‘खबर लहरिया’ अखबार को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। हमने वर्ष 2016-19 के दौरान एक स्वतंत्र प्रहरी के रूप में ‘खबर लहरिया’ अखबार की भूमिका को अपनी फिल्म में दर्शाया है। इस अवधि के दौरान प्रदेश में सत्तारूढ़ दल सबसे महत्वपूर्ण दल था और इसलिए संपादकीय रूप से हमने उनकी रिपोर्टिंग के उस पहलू पर ध्यान केंद्रित किया जो महत्वपूर्ण था।’ रिंटू थॉमस और सुष्मित घोष का कहना है कि जब उन्होंने ‘खबर लहरिया’ पर एक फिल्म बनाने के लिए वर्ष 2016 में ‘खबर लहरिया’ से संपर्क किया तो हमने यह स्प्ष्ट कर दिया था। दूसरी तरफ ‘लहरिया’ की सह-संस्थापक कविता बुंदेलखंडी और मीरा देवी का कहना है कि ‘हमारे पास व्यापक काम है और हमने हर तरह की रिपोर्टिंग की है। इसका प्रमाण हमारे वीडियो चैनल पर है। हमारा अपना संदेश और अपने मूल्य है। पहले भी ‘खबर लहरिया’ पर प्रशंसनीय फिल्में बन चुकी हैं। हमने नहीं सोचा था कि यह फिल्म ऐसी एकतरफा कहानी होगी जो उनके अपने एजेंडे के अनुसार बनाई गई हो, न कि हमारे काम के अनुसार।’

फिल्म निर्माताओं के अनुसार, इनमें एक लंबा साक्षात्कार शामिल है जो मीरा देवी ने एम्सटर्डम में एक वृत्तचित्र समारोह में फिल्म निर्माताओं के साथ किया था। इसके जवाब में बुंदेलखंडी कहती हैं कि ‘लहरिया अखबार’ टीम ने फिल्म निर्माताओं को अपनी चिंताओं से तभी अवगत करा दिया था। जब उन्होंने पहली बार फिल्म को देखा था। गौरतलब है कि ‘खबर लहरिया’ के संघर्ष पर बनी फिल्म को ऑस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित होने के बाद कई विदेशी समीक्षकों ने तारीफ की है। भारत में भी इस डॉक्यूमेंट्री फिल्म को लेकर काफी दिलचस्पी जगी है। ‘राइटिंग विद फायर’ के बारे में ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने लिखा कि ‘पत्रकारिता पर बनी तमाम फिल्मों में से ये शायद सबसे ज्यादा प्रेरणा देने वाली है। ‘खबर लहरिया’ की शुरुआत 20 बरस पहले उत्तर प्रदेश के बेहद पिछड़े कहे जाने वाले बुंदेलखंड इलाके में एक पन्ने के प्रकाशन से हुई थी। ‘खबर लहरिया’ का मतलब है समाचारों की लहरें। अब ये समाचार सेवा पूरी तरह से डिजिटल हो चुकी है। यू-ट्यूब पर इसके पांच लाख से ज्यादा सब्सक्राइबर हैं और हर महीने इस चैनल को औसतन एक करोड़ व्यूज मिलते हैं। ‘राइटिंग विद फायर’ डॉक्यूमेंट्री में ‘खबर लहरिया’ के प्रिंट से डिजिटल चैनल के रूप में हुए बदलाव को बखूबी पेश किया गया है।

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