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आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का कद पंजाब विधानसभा चुनाव बाद खासा बढ़ गया है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि सभी क्षेत्रीय दलों के स्थापित चेहरों को पिछाड़ केजरीवाल नंबर वन क्षत्रप बन उभर चुके हैं। इस समय पूरे देश में आप अकेली ऐसी रिजनल पार्टी है जिसकी दो प्रदेशों में सरकार चल रही है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की भी अब मात्र दो राज्यों में अपनी सरकार है और तीन अन्य राज्यों में वह गठबंधन सरकारों की जूनियर पार्टनर मात्र है। इस वर्ष प्रकाशित अपनी एक सूची में अंग्रेजी दैनिक ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने केजरीवाल को देश के सबसे शक्तिशाली सौ लोगों में शामिल करते हुए नौवें नंबर पर रखा है। खास बात यह कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी इस सूची में शामिल अवश्य हैं लेकिन उनका स्थान केजरीवाल से कहीं नीचे रखा गया है। इस सूची में केजरीवाल से ऊपर नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, योगी आदित्यनाथ, मोहन भागवत, अजीत डोभाल, मुकेश अंबानी और गौतम अडानी का नाम है। वर्ष 2021 की इसी सूची में केजरीवाल को 27वां स्थान दिया गया था।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक इस सूची में केजरीवाल के बाद स्थान पाईं हैं। जाहिर है पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद केजरीवाल का कद तेजी से बढ़ गया है। राजनीतिक हलकों में चर्चा गर्म है कि इस वर्ष होने जा रहे गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी जिस ताकत से अपनी तैयारियों में जुट चुकी है उससे कांग्रेस को न केवल भारी नुकसान होना तय है बल्कि इन दोनों ही राज्यों में आप मुख्य विपक्षी दल भी बन सकती है। चर्चा इस बात को लेकर भी खासी तेज हो चली है कि 2023 में प्रस्तावित 9 राज्यों के विधानसभा चुनावों के लिए भी आम आदमी पार्टी ने अभी से अपनी तैयारियां शुरू कर डाली हैं।

सूत्रों की मानें तो कर्नाटक में आप की सबसे ज्यादा राजनीतिक गतिविधियां देखी जा रही हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी आप ने अपनी राज्य इकाइयों को दुरुस्त करने का काम शुरू कर दिया है। पंजाब में मिली सफलता के तुरंत बाद आप ने गुजरात, हिमाचल, हरियाणा, कर्नाटक, तेलंगाना, छत्तीसगढ़, बिहार और राजस्थान के लिए अपने प्रभारियों की नियुक्ति कर स्पष्ट संदेश दे ही दिया है कि आने वाले समय में वह एक मजबूत राष्ट्रीय विकल्प बन उभरना चाह रही है। राजनीतिक विशेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी की रणनीति उन राज्यों में खुद को मजबूत करने की है जहां सरकार तो भाजपा की है लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस है। जाहिर है ऐसा करने के पीछे उद्देश्य कांग्रेस को कमजोर कर राष्ट्रीय स्तर पर उसका विकल्प बन उभरना है। यही कारण है कि पार्टी ने अपनी गतिविधियों को गुजरात, कर्नाटक और हरियाणा में तेज कर दिया है।

आप का मानना है कि इन तीनों ही राज्यों में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त एंटी इन्कमबेंसी का माहौल है जिसे गुटबाजी के चलते कांग्रेस भुना पाने में असफल होती नजर आ रही है। ऐसे में अपने विकास मॉडल के सहारे आप का लक्ष्य कांग्रेस के वोट बैंक में सेंधमारी कर अपनी पकड़ मजबूत करने के साथ-साथ कांग्रेस को कमजोर करना भी है। केजरीवाल को नजदीक से समझने वालों की मानें तो इस बार वे जल्दबाजी में नहीं हैं। 2014 के आम चुनाव में मिली करारी शिकस्त से सबक ले चुके केजरीवाल अब 2029 के आम चुनाव पर अपना फोकस केंद्रित कर चुके हैं। 2014 में आप को दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों में हार कर सामना करना पड़ा था। 2019 में भी सातों ही सीटें भाजपा के खाते में गई थी। दिल्ली में मिली दो बड़ी हार का बाद अब केजरीवाल फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। उनका लक्ष्य 2024 के आम चुनाव से पहले पार्टी को हर उस राज्य में मजबूत करना हैं जहां इन दो वर्षों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। कुल मिलाकर केजरीवाल ने मात्र दस बरस के भीतर खुद को और अपनी पार्टी को भारतीय राजनीति में स्थापित कर डाला है। अब उनका लक्ष्य क्षत्रपों की राजनीति से बाहर निकल खुद को राष्ट्रीय स्तर का नेता और आम आदमी पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा दिलाना है।

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