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देश की सर्वाधिक वीआईपी सीट यानी वाराणसी संसदीय क्षेत्र। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी 5 लाख 81 हजार से भी अधिक वोट हासिल कर पीएम की कुर्सी तक पहुंचे थे। आजादी के बाद से हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के बाद भाजपा ही एक ऐसा दल है जिसने सबसे अधिक 6 बार इस सीट से जीत दर्ज की है। कांग्रेस के खाते में 7 बार जीत दर्ज है तो सीपीआई (एम), बीएलडी और जनता दल प्रत्याशियों को भी एक-एक बार जीत का स्वाद मिल चुका है लेकिन इस बार मोदी का यह संसदीय क्षेत्र स्थानीय निवासियों के गुस्से का शिकार बना हुआ है। यदि बनारस की जनता को पीएम का कार्यकाल समझ में नहीं आया होगा तो इस सीट पर जीत का अंतर कम हो सकता है लेकिन हार की गुंजाइश दूर तलक नजर नहीं आती।
जीत के अंतर की बात इसलिए कही जा रही है क्योंकि इस बार बनारस की आम जनता से लेकर साधू-संत और संयासी भाजपा के कार्यकलापों से बेहद रुष्ट हैं। यह नाराजगी काशी विश्वनाथ मन्दिर के उस काॅरीडोर को लेकर है जिसने इस योजना के तहत न सिर्फ सैकड़ों की संख्या में ऐतिहासिक प्राचीन मन्दिरों को ध्वस्त कर दिया बल्कि आम जनता के सिर से छत भी छीन ली। यहां तक कि बेरोजगारों को प्रत्येक वर्ष 2 करोड़ रोजगार देने का दावा करने वाली सरकार में सैकड़ों का रोजगार तक छीन लिया गया। ये वे लोग थे जो छोटी-बड़ी दुकानों के सहारे अपना और अपने परिवार का पेट पालते चले आ रहे थे। अब इन सबके समक्ष रोजी-रोटी का संकट है।
मौजूदा स्थिति यह है कि वीआईपी सीट बनारस के साधू-संतों-महंतों सहित आम जनता में सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक विरोध देखा जा रहा है। काशी विश्वनाथ मंदिर के विकास और काॅरीडोर के नाम पर सैकड़ों वर्ष पुराने ऐतिहासिक प्राचीन मंदिरों से लेकर घरों तक को तोड़ा जा रहा है। आश्वासन दिया जा रहा है कि जिनके घर विकास की जद में आने की वजह से तोड़े जायेंगे उनके परिवार में से एक व्यक्ति को नौकरी दी जायेगी, जिसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती क्योंकि यह दावा भी सिर्फ मौखिक है।
केन्द्र और राज्य सरकार के खिलाफ आक्रोश का इससे प्रबल उदाहरण और क्या हो सकता है तो जिन साधू-संतों ने विगत लोकसभा चुनाव और विगत विधानसभा चुनाव में भाजपा का परचम हाथ में लेकर जोर-शोर से समर्थन किया था वे ही साधू-संयासी अब सरकार की मुखालफत कर रहे हैं।
काशी में एक मंदिर के महंत खासे रूष्ट हैं उनका कहना है कि काशी के विकास की बात की जा रही है लेकिन सच्चाई यह है कि काशी का विनाश किया जा  रहा है। काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर जाने के लिए सरकार ने यहां पर एक गलियारा (काॅरीडोर) प्रस्तावित किया है। गलियारा बनाने के लिए यहां कि उन मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है जिनका वर्णन पुराणों में भी किया गया है। महंत के मुताबिक अभी तक विभिन्न मन्दिरों की 232 मूर्तियां तोड़ी जा चुकी हैं।
ज्ञात हो योगी सरकार ने काशी विश्वनाथ मन्दिर की ओर जाने वाले रास्ते को 50 फीट चैड़ा करने की योजना बनायी है। इस योजना की आधारशिला प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 08 मार्च 2019 को रखी जा चुकी है।
मंदिर के एक महंत ने मीडिया को दिए गए अपने बयान में आरोप लगाया है कि 5000 साल पुरानी इस नगरी के विनाश की साजिश में देश के प्रधानमंत्री से लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तक शामिल हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार काशी नगर की स्थापना भगवान शिव ने 5000 वर्ष पूर्व की थी। यही वजह है कि काशी को देश का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल भी माना जाता है।
भाजपा सरकार के कार्यकलापों से रूष्ट महंत का कहना है कि नरेन्द्र मोदी स्वयं को हिन्दुओं का अगुवाकार कहते हैं तो दूसरी ओर गेरुआ वस्त्र पहनने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं को मठ का महंत बताते हैं लेकिन ये लोग ऐसा काम कर रहे हैं जो हिन्दुओं के घोर विरोधी भी करने में हिचकिचाएं। महंत का आरोप है कि ऐसा देखकर तो यही कहा जा सकता है कि ये असली संयासी तो दूर की बात ये असली हिन्दू भी नहीं हो सकते।
एक जानकारी के मुताबिक काॅरीडोर के लिए अब तक 250 से ज्यादा घरों को गिराया जा चुका है। इनमें से कुछ घर तो ऐसे थे जो 300 वर्ष पुराने थे। स्थानीय जनता ने भी खुलकर विरोध किया लेकिन सरकार की दबंगई के आगे किसी की एक नहीं चली।
वैसे नियम तो यही हैं कि यदि सरकार अपनी किसी योजना के लिए किसी के सिर से छत हटाती है तो उसके एवज में उसे छत दी जानी चाहिए लेकिन यूपी सरकार अपनी इस योजना को पूरा करने के लिए स्थानीय निवासियों के सिर से छत तो छीन रही है लेकिन छत हटाने एवज में लगभग दोगुना मुआवजा देकर काम चला रही है। रही बात उन दुकानदारों की जिनकी दुकानें इस योजना के तहत शहीद कर दी गयीं है उन्हें आश्वासन दिया जा रहा है कि भविष्य में जब कभी काॅरीडोर में दुकाने बनेंगी, उन्हें दी जायेंगी लेकिन किसी प्रकार का लिखित आश्वासन नहीं दिया गया है। स्पष्ट है कि फिलहाल इस योजना के तहत सैकड़ों दुकानदारों की रोजी-रोटी तो छीनी जा चुकी है साथ ही भविष्य भी अंधकार में है। एक स्थानीय निवासी ने मीडिया को दिए बयान में कहा है कि उनकी मर्जी तो नहीं थी लेकिन कोई विकल्प भी शेष नहीं था। काशी एक ऐसा शहर है जहां आज भी अधिकतर घरों की दीवारें एक-दूसरे से मिली हुई हैं लिहाजा एक दीवार के गिरते ही दूसरे घर का गिर जाना तय है। काशी की जनता मोदी और योगी सरकार को फासीवादी सरकार की संज्ञा दे रही है।
जहां एक ओर स्थानीय जनता मीडिया के समक्ष खुलकर सरकार की जोर-जबरदस्ती की कहानी कह रही है वहीं दूसरी ओर स्थानीय प्रशासन इन समस्त आरोपों को एक सिरे से नकार रहा है। स्थानीय प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि उसने किसी भी मन्दिर को ध्वस्त नहीं किया है जबकि तस्वीरें गवाह हैं कि काशी विश्वनाथ मंदिर के विकास और काॅरीडोर के नाम पर सैकड़ों वर्ष पुराने ऐतिहासिक मंदिरों से लेकर घरों को ध्वस्त किया जा रहा है।

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