[gtranslate]
Country

लॉकडाउन में पत्रकारों पर मंडराया संकट, अब द हिंदू के मुम्बई ब्यूरो पर तालाबंदी

23 जुलाई को पश्चिमी बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता प्रेस क्लब के ‘प्लैटिनम जुबली’ समारोह के उद्घाटन के मौके पर कहा, “कई जगहों पर पत्रकार नौकरियां खो रहे हैं। एक दिन आप नया चैनल देखते हैं और अगले दिन आप सुनेंगे कि उसने संचालन बंद कर दिया है। एक बार, जब मैंने एक टीवी चैनल की मदद की तो एक एजेंसी ने मुझे पत्र भेजकर पूछा कि मैंने उसकी मदद क्यों की। मेरे ऐसा करने का कारण था कि हम मानवता के बारे में सोचने वाली सरकार हैं। अगर मुश्किल दौर से गुजर रहा पत्रकार मदद मांगता है तो हम मना नहीं करते।”

देश की एक सीएम ने जब यह बात सार्वजानिक की तो बहुत से लोगों को यकीन नहीं आया कि आखिर यह कैसे हो सकता है। जब देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी मीडिया के लोगों को कोरोना योद्धाओं की उपाधि देते हैं और कहते है कि कोई ना इनकी छटनी करेगा ना कोई संस्थान से बाहर करेगा। लेकिन देश के प्रधानमंत्री की बातों को मीडिया मालिकों ने बिल्कुल भी गंभीरता से नही लिया है। इसका उदाहरण हैं पत्रकारों की लगातार होती छटनी और उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जाना।

 

सर्वविदित है कि कोरोना महामारी की इस लड़ाई में डॉक्टरों, स्वास्थ्य कर्मियों और पुलिस के साथ-साथ मीडियाकर्मी भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। पत्रकार लगातार महामारी के प्रकोप के बचाने के लिए महत्वपूर्ण सूचनाएं जनता तक पहुंचा रहे हैं। तमाम खतरा उठाते हुए पत्रकारों ने सरकार, पुलिस, स्वास्थ्य कर्मचारियों और आम जनता की मदद की है। अपने काम के दौरान कई स्थानों पर मीडियाकर्मी कोरोना से संक्रमित भी हुए हैं। इसके बावजूद अब उनकी नौकरी और तनख्वाह पर तलवार लटक रही है। ऐसे पत्रकार योद्धाओं को पुरस्कृत करने की बजाय उन्हें तिरस्कृत किया जा रहा है।

हालात यह है कि लॉकडाउन के तीसरे हफ़्ते में ही इंडियन एक्सप्रेस और बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार ने पत्रकारों की सैलेरी में कटौती की बात कह दी थी। टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार ने संडे मैग्ज़ीन की पूरी टीम को निकाल दिया था। राष्ट्रीय स्तर की एक न्यूज़ एजेंसी ने अपने यहाँ काम करने वालों को सिर्फ़ 60 फ़ीसदी सैलरी देने की घोषणा की है। हिन्दुस्तान टाइम्स मराठी 30 अप्रैल से प्रकाशन बंद हो गया है और संपादक समेत पूरी टीम को घर बैठने के लिए कह दिया गया है। आउटलुक मैग्ज़ीन ने भी प्रकाशन बंद कर दिया है। साथ ही उर्दु का अख़बार नई दुनिया और स्टार ऑफ़ मैसूर अख़बार बंद हो गयें।

दिल्ली-एनसीआर से चलने वाले न्यूज़ चैनल ‘न्यूज़ नेशन’ ने 16 लोगों पर आधारित अंग्रेज़ी डिजिटल की पूरी टीम को नौकरी से निकाल दिया है। इसी तरह ‘द क्विंट’ नाम की वेबसाइट ने अपने 200 कर्मचारियों की टीम में से क़रीब 45 को ‘फ़र्लो’ यानी बिना वेतन की छुट्टियों पर जाने को कह दिया है। द क्विंट’ वेबसाइट ने मालिकों की ओर से टीम के जिन चुनिंदा लोगों को बिना वेतन की छुट्टी पर भेजा है, उन्हें दिये गए पत्र में लिखा है कि संस्थान ने दो वर्ष तक आर्थिक सुस्ती की वजह से बने हालात से लड़ने का प्रयास किया, लेकिन कोरोना वायरस महामारी ने परिस्थितियों को बहुत मुश्किल बना दिया है। अगले कम से कम 3-4 महीने तक वेबसाइट को आर्थिक मोर्चे पर बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। इसी को देखते हुए संस्थान को कड़े निर्णय लेने पड़े हैं।

अब तलवार द हिंदू पर लटक गई है। द हिंदू अखबार के मुंबई ऑफिस से सूचना है कि पूरी सिटी टीम को 25 जून से नौकरी पर न आने के लिए बोल दिया गया है। चर्चा है कि द हिंदू प्रबंधन ने मुंबई संस्करण को बंद करने का फैसला कर लिया है। इसी कारण सिटी टीम को गुडबाई बोला गया है। सिटी टीम से आशीष रुकियार, पीयूष पांडेय, आदित्य आनन्द, गौतम मेंगले, ज्योति शेलार, तन्वी देशपांडे, अजित महाले, फ़ोटो एडिटर प्रशांत नकवे समेत कई अन्य को छंटनी के दायरे में लाया गया है।

लॉकडाउन में पत्रकारों पर मंडराया संकट, अब द हिंदू के मुम्बई ब्यूरो पर तालाबंदी

केवल आलोक देशपांडे (पोलिटिकल ब्यूरो) और सोनम सहगल (कोर्ट बीट) की नौकरी बची है। चर्चा है कि रेजिडेंट एडिटर को दिल्ली शिफ्ट कर दिया जाएगा। हालांकि इस छंटनी का प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने संज्ञान लिया है। पीसीआई ने इस बाबत संस्थान को एक पत्र भी लिखा है।

ऑल इंडिया प्रेस रिपोर्टर वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार आचार्य श्रीकांत शास्त्री इस बारे में कहते हैं कि लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ ख़ास कर छटनी ग्रस्त पीड़ित पत्रकारों व प्रेस कर्मियों को केंद्र व् राज्य सरकारों द्वारा तिरष्कृत किया जा रहा है। श्रम रोज़गार गारन्टी एवं सामजिक सुरक्षा के मौजूदा क़ानून का मीडिया में अनुपालन नहीँ दिख रहा है।

मीडिया संस्थानों में कोरोना काल में सैंकड़ो पत्रकारों को बिना सैलरी दिए ही बाहर कर दिया गया है। गुहार लगाने पर उनके साथ गलत व्यवहार किया जा रहा है। सारे मीडिया संस्थानों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों का घोर उल्लंघन कर रहें हैं। पत्रकारों को न तो कोई नियुक्ति पत्र दिया जाता है और न ही नौकरी की कोई गारंटी दी जाती हैं। यहां तक की अपनी मर्ज़ी से नौकरी से निकाल दिया जाता है। इन शोषित पीड़ित पत्रकारो की रोजगार सुरक्षा हेतु सरकारों द्वारा कोई सुध नहीं ली जा रही हैं। करोना काल के मद्देनजर पीड़ित पत्रकार अपनी रोजगार एवं सुरक्षा हेतु न्यायालय में अपनी व्यथा की अर्जी भी नहीं दे पा रहे हैं। मीडिया संस्थानों में साजिशकर्ताओं के शिकार हो रहे हैं।

गौरतलब है कि वर्ष 1978 में ही बनी ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया’ भी मीडिया और पत्रकारों से जुड़ें मामलों पर मुखर रही है। हालांकि मौजूदा मीडिया सेक्टर के संकट पर एडिटर्स गिल्ड ने अभी तक कोई टिप्पणी नहीं की है। कहा जाने लगा है कि ‘एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया’ की यह रहस्यमय चुप्पी कही पत्रकारों के पेट पर मारी जा रही लात का भविष्य में कोई नई रणनीति का संकेत तो नहीं?

You may also like

MERA DDDD DDD DD