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जयंती विशेष :पराक्रमी ही नहीं विद्वान व चिंतक भी थे शहीद-ए-आजम भगत सिंह

आज़ादी के लिए हंसते- हंसते फांसी पर चढ़ जाने वाले क्रांतिकारी भगत सिंह की आज जयंती है। ये भारत मां के वही सच्चे सपूत हैं जिन्होंने अपना लहू वतन के नाम किया तो आज हमें आज़ादी का ज़श्न हर साल मनाने का मौका मिलता है। भगत सिंह करतार सिंह सराभा और लाला लाजपत राय से अत्यधिक प्रभावित थे। 13 अप्रैल 1919 को जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड ने भगत सिंह के बाल मन पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला। लाहौर के नेशनल कॉलेज़ की पढ़ाई छोड़कर भगत सिंह 1920 में महात्‍मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे अहिंसा आंदोलन में भाग लेने लगे, जिसमें गांधी जी विदेशी समानों का बहिष्कार कर रहे थे। 14 वर्ष की आयु में ही भगत सिंह ने सरकारी स्‍कूलों की पुस्‍तकें और कपड़े जला दिए। इसके बाद इनके पोस्‍टर गांवों में छपने लगे।शहीद भगत सिंह पराक्रमी होने के साथ-साथ विद्वान व चिंतक थे। अपने जीवन की चिंता किए बगैर भगत सिंह और उनके क्रांतिवीर साथियों ने ऐसे साहसिक कार्यों को अंजाम दिया, जिनका देश की आजादी में बहुत बड़ा योगदान रहा।

महात्‍मा गांधी ने जब 1922 में चौरीचौरा कांड के बाद असहयोग आंदोलन को खत्‍म करने की घोषणा की तो भगत सिंह का अहिंसावादी विचारधारा से मोहभंग हो गया। उन्‍होंने 1926 में देश की आजादी के लिए नौजवान भारत सभा की स्‍थापना की। शहीद वीर भगत सिंह के जीवन का एक और खूबसूरत पहलू यह है कि वे टीम वर्क  के महत्व को बखूबी समझते थे। लाला लाजपतराय के प्रति उनका समर्पण हो या फिर चंद्रशेखर आजाद, सुखदेव, राजगुरु समेत क्रांतिकारियों के साथ उनका जुड़ाव उनके लिए, कभी व्यक्तिगत गौरव, महत्वपूर्ण नहीं रहा।

भगत सिंह क्रांतिकारी देशभक्त ही नहीं, बल्कि एक अध्ययनशीरल विचारक, कलम के धनी,  लेखक, पत्रकार और महान मनुष्य थे। उन्होंने 23 वर्ष की छोटी-सी आयु में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का विषद अध्ययन किया था। उन्होंने ‘अकाली’ और ‘कीर्ति’ दो अखबारों का संपादन भी किया। करीब दो साल भगत सिंह जेल में भी रहे। इस दौरान वे लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त करते रहे। जेल में रहते हुए उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। उस दौरान उनके लिखे गए लेख व परिवार को लिखे गए पत्र आज भी उनके विचारों के दर्पण हैं।

अपने लेखों में उन्होंने कई तरह से पूंजीपतियों को अपना शत्रु बताया है। उन्होंने लिखा कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहे एक भारतीय ही क्यों न हो, वह उनका शत्रु है। उन्होंने जेल में अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’? जेल में भगत सिंह व उनके साथियों  ने 64 दिनों तक भूख हड़ताल की। उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने तो भूख हड़ताल में अपने प्राण ही त्याग दिए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार 27 सितम्बर को अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ की 69वीं कड़ी के जरिए देशवासियों को संबोधित किया। कई मुद्दों पर अपना विचार रखने के साथ ही उन्होंने भगत सिंह के बारे में भी विस्तार से चर्चा की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस कार्यक्रम में भगत सिंह को कुछ इस तरह से याद किया, “मन मैं आपको अतीत के एक हिस्से में ले जाना चाहता हूं। एक-सौ-एक साल पुरानी बात है। 1919 का साल था। अंग्रेजी हुकूमत ने जलियांवाला बाग में निर्दोष लोगों का कत्लेआम किया था। इस नरसंहार के बाद एक 12 साल का लड़का उस घटनास्थल पर गया। वह खुशमिजाज और चंचल बालक, लेकिन, उसने जलियांवाला बाग में जो देखा, वह उसकी सोच के परे था। वह स्तब्ध था, यह सोचकर कि कोई भी इतना निर्दयी कैसे हो सकता है। वह मासूम गुस्से की आग में जलने लगा था। उसी जलियांवाला बाग में उसने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ने की कसम खाई। क्या आपको पता चला कि मैं किसकी बात कर रहा हूं? हां, मैं शहीद वीर भगत सिंह की बात कर रहा हूं। 28 सितंबर को हम शहीद वीर भगत सिंह की जयंती मनाएंगे। मैं समस्त देशवासियों के साथ साहस और वीरता की प्रतिमूर्ति शहीद वीर भगत सिंह को नमन करता हूं।”

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