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कोरोना से लड़ने के बजाए नेताओं पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की सियासत हावी

कोरोना से लड़ने के बजाए नेताओं पर एक-दूसरे को नीचा दिखाने की सियासत हावी

दिल्ली में कोरोना से भी बड़ी जंग सियासी दबदबे की है नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर अब केंद्र और दिल्ली दोनों सरकारें समान रूप से चिंतित दिखाई दे रही हैं। दोनों सरकारें इस संकल्प के साथ आगे बढ़ने की बातें कर रही हैं कि देश की राजधानी को जल्दी ही कोरोना मुक्त किया जाएगा। आज जबकि दिल्ली में कोरोना के मामले 41 हजार से अधिक और एनसीआर में 47 हजार हो गए हैं, ऐसे में सरकारें सकारात्मक संकल्प के साथ आगे आकर कोई ठोस काम करती हैं तो निश्चित ही जनता को सुकून मिलेगा।

लेकिन कहीं ऐसा न हो कि संकल्प शक्ति हाशिये पर चली जाए और एक दूसरे को नीचा दिखाने की सियासत हावी हो जाए। संदेह इसलिए भी उठने स्वाभाविक हैं कि अब तक दोनों ओर के सियासी संदेश भी कुछ ऐसे ही हैं। जब जिसको मौका मिल रहा है, वह हमला करने से जरा भी नहीं चूक रहा है। वास्तव में दिल्ली की सियासी जमीन को पाने के लिए हर पार्टी लालायित रहती है। फिर भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच तो यहां पिछले कुछ वर्षों से सीधी लड़ाई चल रही है।

कोरोना काल में भी भविष्य की सियासत के लिए दोनों सजग हैं और अपने-अपने हिसाब से यह जतलाने की कोशिश में हैं कि जनहित में वे काफी चिंतित हैं। पिछले दिनों आम आदमी पार्टी की ओर से हमला किया गया कि केंद्र सरकार दिल्ली को कोरोना से निपटने में मदद नहीं कर रही है और जब दिल्ली सरकार ने अपनी जनता के हित में इलाज को लेकर ठोस फैसला लिया तो केंद्र सरकार ने उपराज्यपाल(एलजी) के माध्यम से उसे भी पलट डाला। इस हमले के जरिए दिल्ली सरकार ने एक ओर यह संदेश दिया कि दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाएं भाजपा शासित पड़ोसी राज्यों उत्तर प्रदेश या हरियाणा से बेहतरीन हैं, तभी तो वहां के लोग यहां इलाज के लिए आ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश देने में भी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने देर नहीं लगाई कि कोरोना से निपटने के लिए वे केंद्र के हर फैसले के साथ हैं और दिल्ली में सभी को इलाज मिलेगा।

केजरीवाल ने यह भी संदेश दिया कि उनकी सरकार संकीर्ण नहीं है, बल्कि अपने राज्य की जनता की परेशानी को प्राथमिकता में लेना उसका धर्म है। जरूरत पड़ी तो वह अपने राज्य के साथ ही पूरे देश की जनता के हित में केंद्र के साथ कंधा से कंधा मिलाकर चलने को तैयार हैं। केजरीवाल अपना संदेश दे गए कि वे सकारात्मक सोच रखते हैं, लेकिन केंद्र सरकार दिल्ली को मदद नहीं कर रही है। केंद्र सरकार को लेकर यह भी सवाल उठे कि आखिर केंद्र शासित प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते दिल्ली के प्रति उसका भी दायित्व बनता है। ऐसे में केंद्र सरकार भला कैसे पीछे रह सकती थी।

दिल्ली को कोरोना से निपटने के लिए केंद्र ने अपनी ओर से न सिर्फ स्वास्थ्य सेवाओं की फेहरिस्त जारी कर दी, बल्कि केंद्रीय गृह मंत्री ने सर्वदलीय बैठक का आयोजन कर यह भी जतला दिया कि सरकार इस मसले पर गंभीर है। केंद्र सरकार ने संदेश दिया कि वह दिल्ली की जनता के प्रति अपना दायित्व निर्वहन करने के प्रति प्रयासरत है। केंद्र के संदेश में सियासी संकेत इसलिए भी साफ झलकते हैं कि भाजपा के नेता भी दिल्ली सरकार के खिलाफ जमकर पारी संभाले हुए हैं।

एक ऐसे समय में जब दिल्ली और केंद्र साथ मिलकर किसी समस्या से जूझ रहे हों, प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष आदेश गुप्ता ने सीएम अरविंद केजरीवाल पर कटाक्ष किया कि संकट के वक्त में टीवी पर आने से बात नहीं बनती। जमीन पर काम करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि छोटे और मिडिल नर्सिंग होम्स को कोविड-19 अस्पतालों में बदलने से दिल्ली में हालत और खराब हो जाएंगे। दिल्ली में अगर वेंटीलेटर्स की संख्या नहीं बढ़ी तो स्थिति बेकाबू हो जाएगी। यानी भाजपा की ओर से साफ संदेश है कि मुख्यमंत्री केजरीवाल दिल्ली को संभालने में असक्षम हैं।

जनता के बीच तो यहां तक बातें हो रही हैं कि दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों का बहाना बनाकर भाजपा केजरीवाल सरकार को गिरा भी सकती थी, लेकिन वह जानती है कि इससे वह खुद कटघरे में आ जाएगी। अतीत में जब केंद्र की कांग्रेस सरकार ने राज्यों की चुनी हुई भाजपा सरकारें गिराई थीं तो तब भाजपा ने इसे लोकतंत्र पर हमला बताकर तीव्र विरोध किया था। लिहाजा वह अपने सिर पाप नहीं लेना चाहेगी और दिल्ली की धरती पर फिर से काबिज होने के लिए उसकी रणनीति यही साबित करने की रहेगी कि केजरीवाल एक कमजोर मुख्यमंत्री हैं। अब देखना है कि भविष्य को लेकर इस सियासी जंग में दिल्ली की जमीन पर केजरीवाल सफल हो पाते हैं या फिर केंद्र।

-दाताराम चमोली

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