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विदेशी कर्ज में डूबा भारत, हर भारतीय पर औसतन 30,776 का कर्ज

विश्व की महाशक्ति अमेरिका समेत दुनिया के तमाम देश पहले से ही गरीबी की मार झेल रहे हैं। ऐसे में विश्व बैंक की ताजा रिपोर्ट ने कर्ज की मार झेल रहे देशों को और चिंता में डाल दिया है।

विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, 2020 में गरीबी की मार झेल रहे देशों पर 12 फीसदी की वृद्धि के साथ कर्ज का बोझ बढ़कर रिकॉर्ड 65 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच चुका है। ये देश पहले से ही कर्ज में थे और कोरोना संकट के कारण ये और भी कर्ज के गर्त में धंसते जा रहे हैं। अक्टूबर 2021 को वर्ल्ड बैंक की ओर से जारी नई रिपोर्ट ‘इंटरनेशनल डेब्ट स्टेटिस्टिक्स 2022’ में ये जानकारी सामने आई है।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी ने दुनियाभर के देशों की अर्थव्यवस्था पर प्रहार किया है। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए तमाम देशों द्वारा बड़े पैमाने पर वित्तीय और मौद्रिक प्रोत्साहन पैकेज जारी किए गए। जिनका उद्देश्य था कि स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार के साथ-साथ गरीब और कमजोर तबके को महामारी से हुए नुकसान से उबरने में सहायता देना। लेकिन इसके विपरीत दुनिया के पिछड़े देशों पर कर्ज का बोझ पहले के मुकाबले और बढ़ गया है।

गौरतलब है कि कोरोना महामारी से पहले भी निम्न आय और माध्यम आय वाले देश अच्छी स्थिति में नहीं थे। महामारी से पहले भी कई निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति अच्छी नहीं थी। ये देश एक ओर धीमी आर्थिक वृद्धि और दूसरी ओर उच्च सार्वजनिक और विदेशी कर्ज के तले दबे हुए थे। वहीं अगर कम और मध्यम आय वाले देशों पर कुल विदेशी कर्ज की बात करें तो 2020 में यह 5.3 प्रतिशत बढ़कर 654.9 लाख करोड़ रुपये हो गया।

रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज से जुड़े संकेतक इस बात का संकेत देते हैं कि पूरी दुनिया में हालात खराब हो गए हैं। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि विदेशी ऋण में वृद्धि ने सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) और निर्यात वृद्धि को पीछे छोड़ दिया। चीन को छोड़कर निम्न और मध्यम आय वाले देशों में विदेशी ऋण-से-जीएनआई अनुपात 2019 में 37 प्रतिशत से बढ़कर 2020 में 42 प्रतिशत हो गया , उनका ऋण-से-निर्यात अनुपात 126 प्रतिशत से बढ़ गया। 2019 में 2020 में 154 प्रतिशत हो गया।

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इस आर्थिक संकट को देखते हुए कम आय वाले देशों की मदद करने के लिए विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुरोध पर अप्रैल 2020 में G-20 ऋण सेवा निलंबन पहल (DSSI) शुरू की गई थी। कुल मिलाकर 2020 में बहुपक्षीय करदाताओं ने निम्न और मध्यम आय वाले देशों को 8.8 लाख करोड़ रुपये दिए, जो पिछले एक दशक में सबसे अधिक है। इसी तरह कम आय वाले देशों में विदेशी सार्वजनिक ऋण 25 प्रतिशत बढ़कर 5.34 लाख करोड़ रुपये हो गया। वहीं, आईएमएफ समेत अन्य बहुपक्षीय करदाताओं ने कुल 3.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज दिया।

रिपोर्ट में जारी आंकड़ों को देखें तो भारत पर कुल विदेशी कर्ज 42.5 लाख करोड़ रुपये है। इस हिसाब से हर भारतीय करीब 30,776 रुपये के कर्ज में दब गया है। गौरतलब है कि यह कर्ज का बोझ 2010 में लगभग 21.9 लाख करोड़ रुपये था, जो पिछले 10 वर्षों में 96 प्रतिशत बढ़कर 2020 में 42.5 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इसमें से केवल 84,254 करोड़ रुपये ब्याज का भुगतान किया जाना है।

इस संबंध में विश्व बैंक समूह के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मुख्य अर्थशास्त्री कारमेन रेनहार्ट ने कहा, “दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाएं तेजी से बढ़ते कर्ज और इससे उत्पन्न चुनौतियों का सामना कर रही हैं। संकट के लिए तैयार रहने की जरूरत है।” इतना ही नहीं, रिपोर्ट में कहा गया है कि बढ़ते कर्ज और उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं से उबरने के लिए कर्ज में पहले से ज्यादा पारदर्शिता लाना जरूरी है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इन देशों को इसे कम करने के लिए उचित रूप से ऋण जोखिम का आकलन और प्रबंधन करने की आवश्यकता है, जिसके लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इस संबंध में विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष डेविड मालपस ने कहा, “हमें बढ़ते कर्ज की इस समस्या के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत है, जिसमें कर्ज में कमी, तेजी से पुनर्गठन और बेहतर पारदर्शिता शामिल है।”

साभार : डाउन टू अर्थ

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