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आखिरकार अफगानिस्तान में शांति का रोडमैप बनाने वाले देशों में शामिल हुआ भारत 

 रूस और भारत की दोस्ती शीत युद्ध से पहले की है, जब रूस सोवियत संघ हुआ करता था।  शीत युद्ध के बाद सोवियत संघ का विघटन हुआ और दुनिया एकध्रुवीय हो गई। इसके बाद से रूस और भारत के संबंधों में काफी बदलाव आए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब पहली बार रूसी राष्ट्रपति व्लािदमीर पुतिन से मिले थे तो भारत-रूस रिश्तों के बारे में उन्हें अपने अंदाज में आश्वस्त करने की कोशिश की थी। कहा था, ‘भारत में किसी बच्चे से पूछिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का सर्वश्रेष्ठ मित्र कौन है, तो वह रूस का नाम लेगा।’ बहरहाल, यह याद दिलाने की जरूरत पड़ी, यही इसका संकेत है कि वह लंबा दौर अतीत की बात हो गई जब इन दोनों देशों के रणनीतिक एवं सामरिक हितों में समन्वय बना रहता था। आज भारत अपने रक्षा और कारोबारी रिश्तों को बहुआयामी बनाने की कोशिश में है। इस क्रम में अमेरिका और उसके सहयोगी देश भारत के लिए बेहद अहम हैं। इस सब के  बीच खबरें आ रही थी कि  अफ़गानिस्तान में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप  में शामिल छह देशों की इस सूची में भारत को शामिल नहीं किया गया है। लेकिन कहा जा रहा है कि इस नए मैकेनिज़म को अमेरिका ने सुझाया है वहीं रूस ने जो योजना सुझायी थी उसमें भारत को इन देशों की सूची में शामिल नहीं किया गया था।

 रूस और चीन के बीच बढ़ती नज़दीकी के बीच रूस ने जो तऱीका सुझाया था, उसमें रूस, चीन, अमेरिका, पाकिस्तान और ईरान को बातचीत के मेज पर रखे जाने की बात कही गई थी। लेकिन भारत आख़िरकार अफ़गानिस्तान में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप पर फ़ैसला लेने वाले छह देशों की सूची में शामिल हो गया है।  बीते छह महीने से भारत इसके लिए लगातार कोशिश कर रहा था।

सूत्रों के मुताबिक एक अधिकारी ने  बताया कि ऐसा पाकिस्तान के कहने पर किया गया था जो नहीं चाहता कि भारत इस इलाक़े में शांति के लिए तैयार किए जा रहे रोडमैप का हिस्सा बने , लेकिन भारत इस पर लंबे वक़्त से काम कर रहा था और इसके लिए सभी भारत ने अफ़गानिस्तान और उससे बाहर सभी अहम किरदारों से संपर्क साधा ताकि वह बातचीत की इस टेबल का हिस्सा बन सके।

अब इस टीम का हिस्सा होने के कारण भारत को उम्मीद है कि वह विशेष रूप से आतंकवाद, हिंसा, महिलाओं के अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों को लेकर नियमों को तय करने में अहम भूमिका निभाएगा। भारत का  मानना है कि वह एक अफ़ग़ानिस्तान-नेतृत्व वाली, अफ़ग़ानिस्तान-नियंत्रित और अफ़ग़ानिस्तान के स्वामित्व वाली प्रणाली चाहता है, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में ज़मीनी हक़ीक़त कुछ ऐसी रही है कि यहां  ऐसा हो नहीं सका है।

 खबरों के  अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने पिछले सप्ताह अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी और हाई काउंसिल फोर नेशनल रिकंसिलिएशन के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला को एक चिट्ठी भेजी थी जिसमें संयुक्त राष्ट्र के संरक्षण में एक रिजनल कॉन्फ्रेंस के गठन का प्रस्ताव दिया गया था।  इसके अंतर्गत अमेरिका, भारत, रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान के विदेश मंत्री एक साथ मिलकर अफ़गानिस्तान में बेहतरी लाने की कोशिश करेंगे।

सूत्रों का कहना है कि भारत की ओर से इस बातचीत का हिस्सा विदेश मंत्री एस. जयशंकर हो सकते हैं। यह  लंबे वक़्त से जारी भारत की कूटनीति का फल है।  पिछले साल सितंबर में अफ़ग़ानिस्तान के पूर्व उपराष्ट्रपति अब्दुल रशीद दोस्तम की भारत यात्रा के दौरान इस पर बातचीत हुई थी।  फिर अफ़गानिस्तान के पूर्व सीईओ अब्दुल्ला-अब्दुल्ला और अफ़ग़ानिस्तान नेता अता मोहम्मद से बीते साल अक्टूबर में इसे लेकर चर्चा हुई थी। इसके बाद इस साल जनवरी में भारतीय एनएसए अजीत डोभाल की गुपचुप अफ़गानिस्तान यात्रा भी इसी कोशिश का हिस्सा थी।  जहां  उन्होंने काबुल के नेताओं से मुलाक़ात की थी।  ईरान के साथ भारत  के रिश्ते और चाबहार बंदरगाह को अफ़ग़ानिस्तान तक जोड़ने की विकास की रणनीति भी इसके पीछे एक अहम वजह रही।

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