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टूट की कगार पर ‘इंडिया’ गठबंधन

मिशन 2024 के आम चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिशों के लिए बना विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ शुरू से ही हिचकोले खाता नजर आया है। गत् सप्ताह विपक्षी गठबंधन की हुई चौथी बैठक में कई दल नाराज नजर आए जिसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि गठबंधन चुनाव से पहले ही टूट सकता है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार के साथ ममता बनर्जी और अरिवंद केजरीवाल ने खेला कर दिया है। विपक्ष को एकजुट करके नीतीश अपने दिल में प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए हुए थे, जबकि उन्हें अभी तक गठबंधन का संयोजक तक नहीं बनाया गया है। कहा जा रहा है कि दिल्ली बैठक से एक बात तय हो गई कि गठबंधन में रहकर नीतीश का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में विपक्षी गठबंधन के बंधन पर भी खतरा मंडराने लगा है

आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को टक्कर देने के लिए बने विपक्ष गठबंधन इंडिया का कुनबा बिखरने लगा है। हिंदी पट्टी यानी राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिली पराजय के बाद से ही विपक्षी गठबंधन की एकता में दरार नजर आने लगी थी जो 19 दिसंबर को हुई विपक्षी दलों की बैठक में भी देखने को मिली। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरिवंद केजरीवाल ने खेला कर दिया है। विपक्ष को एकजुट करके नीतीश कुमार अपने दिल में प्रधानमंत्री बनने का सपना संजोए हुए थे, जबकि उन्हें अभी तक गठबंधन का संयोजक तक नहीं बनाया गया है। कहा जा रहा है कि दिल्ली बैठक से एक बात तय हो गई कि इस गठबंधन में रहकर नीतीश कुमार का ख्वाब कभी पूरा नहीं हो सकता। ऐसे में विपक्षी गठबंधन के बंधन पर भी खतरा मंडराने लगा है।

दिल्ली बैठक में ममता बनर्जी ने मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की वकालत की तो अरविंद केजरीवाल ने एक कदम आगे जाकर प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का प्रस्ताव रख दिया। केजरीवाल ने कहा कि अगर खड़गे का नाम आगे बढ़ाया गया और जीत हासिल हुई तो आजादी के बाद पहली बार कोई दलित देश का प्रधानमंत्री बनेगा। इस मुद्दे को फिलहाल अभी के लिए भले ही टाल दिया गया हो लेकिन ये तय है कि भविष्य में भी नीतीश कुमार इस रेस में शामिल नहीं हो सकेंगे। अगर गठबंधन की जीत होती है और कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आती है तो खड़गे की लॉटरी लग सकती है। गौरतलब है कि जब ‘इंडिया गठबंधन’ अस्तित्व में भी नहीं था उस वक्त विपक्षी दलों में इतना ज्यादा मतभेद था कि कोई भी एक-दूसरे का मुंह तक देखना नहीं चाहता था। ऐसी परिस्थितियों में नीतीश कुमार ने ये जिम्मेदारी संभाली। एनडीए से अलग होने के बाद उन्होंने ही बीजेपी के खिलाफ विपक्षी गठबंधन की नींव रखी थी। सभी विपक्षी नेताओं से मुलाकात की और पटना में सभी को एक छत के नीचे खड़ा किया। 2018 के बाद पहली बार विपक्ष एक मंच पर साथ दिखा था। इसके बाद कांग्रेस ने उनकी मेहनत को हाइजैक कर लिया।

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार से नीतीश कुमार की उम्मीदों को बल मिला था। दिल्ली बैठक से पहले जेडीयू नेता काफी उत्साहित थे। उन्होंने नीतीश कुमार के समर्थन में पटना की सड़कों को पाट दिया था। लेकिन 19 दिसंबर की बैठक में खड़गे का नाम आगे किए जाने से नीतीश कुमार को तगड़ा झटका लगा है। इससे वह नाराज भी बताए जा रहे हैं। जानकारी के अनुसार अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए ही वह बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल नहीं हुए। अब देखना होगा कि नीतीश कुमार क्या करेंगे? क्या अभी भी वह इस गठबंधन में बने रहेंगे या फिर से कोई विकल्प खोजेंगे? कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार कई मुद्दों पर इंडिया गठबंधन के फैसले से नाराज हैं और उनकी नाराजगी के बीच 29 दिसंबर को होने जा रही जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक पर सबकी नजरें हैं। आशंका जताई जा रही है कि इस बैठक में नीतीश कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। दूसरी तरफ इस बैठक के बाद से ही गठबंधन के लिए बुरे संकेत आते दिखाई दे रहे हैं। पहले तो जेडीयू के सांसद ने इस बैठक को चाय और बिस्किट तक सीमित बताया था। वहीं अब अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी पंजाब की 13 और दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर अकेले ही चुनाव मैदान में उतरना चाहती है। इसके बाद से ‘इंडिया अलायंस’ में दरार की आशंका और ज्यादा बढ़ गई है। इसी तरह शिवसेना ने भी अपने मुखपत्र ‘सामना’ में यह कहकर कांग्रेस पर टिप्पणी की थी कि इंडिया गठबंधन में 28 घोड़े तो हैं, लेकिन इसका कोई सारथी नहीं है। यह दबाव नेता के रूप में किसी चेहरे पर सहमति बनाने के लिए था।

इंडिया गठबंधन के एक नेता ने कहा कि कुछ नेताओं के मन में स्वयं को पीएम पद का उम्मीदवार बनाने की लालसा हो सकती है, लेकिन कई दल ऐसे भी हैं जिनकी ओर से इस पद के लिए अभी कोई दावेदारी नहीं है। लालू प्रसाद यादव, उमर अब्दुल्ला, स्टालिन, वाम दल और कई अन्य पार्टियों-नेताओं की ओर से इस पद के लिए कोई दावेदार नहीं है। ऐसे में उन्हें किसी नाम के प्रस्ताव के साथ सामने आना चाहिए, जिससे एक नाम पर सहमति बने और गठबंधन को एक नेता दिया जा सके। लेकिन ऐसा नहीं किया जा रहा है, तो इसके पीछे भी राजनीति हो सकती है। कई दल साथ में अवश्य हैं, लेकिन प्रधानमंत्री पद की बात आते ही उनकी आपसी खटास सतह पर आ सकती है। इससे पहले मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के बीच हुई खटपट सबके सामने है। कहा जा रहा है कि इसका असर भले ही अभी नजर नहीं आ रहा हो लेकिन इसके दूरगामी परिणामों से इनकार नहीं किया जा सकता है। इसके संकेत उस बीच दिए गए सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के बयान से मिलते भी हैं। एमपी में एक भी सीट नहीं दिए जाने से नाराज अखिलेश यादव ने कहा था कि कांग्रेस के साथ भी यूपी में वैसा ही सलूक किया जा सकता है जैसा उसने एमपी में किया। जाहिर है लोकसभा चुनाव में यही रवैया सपा की ओर से भी अपनाया जा सकता है।

राजनीतिज्ञों का कहना है कि कांग्रेस का यह रुख लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन को लेकर की जा रही पहलकदमियों और बैठकों में गिनाया जाएगा। साथ ही सीटों के बंटवारे के फॉर्मूले पर भी समस्या आएगी। कांग्रेस को विधानसभा चुनावों में अकेले उतरने के संबंध में कम से कम इंडिया अलायंस के सहयोगियों को विश्वास में जरूर लेना चाहिए था।
तीन राज्यों में मिली हार के बाद टीएमसी नेता और सीएम ममता बनर्जी ने कहा था कि कांग्रेस की चुनाव में रणनीति ही सही नहीं थी। कांग्रेस जो बात कहती है उसे व्यवहार में भी लाने की जरूरत है। वहीं कांग्रेस ने भी टीएमसी नेता के ऐसे बयानों पर प्रतिक्रिया देते हुए लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के सांसद अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि ममता बनर्जी का रवैया चुनाव से पहले भी ऐसा ही था। उन्होंने कहा कि पांच राज्यों में चुनाव होने के बावजूद, ममता ने कभी भी लोगों से भाजपा को हराने के लिए विपक्ष को वोट देने की अपील नहीं की।

कांग्रेस ने भी दिए हैं अकेले लड़ने के संकेत
पंजाब में अकेले चुनाव लड़ने को लेकर कांग्रेस की ओर से भी संकेत आ चुके हैं। कुछ ही दिनों पहले पंजाब अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग ने कहा था कि पार्टी आलाकमान ने राज्य की सभी 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी करने को कहा है। उन्हें किसी भी अन्य दल से गठजोड़ करके 2024 का चुनाव लड़ने के लिए आलाकमान से कोई संकेत नहीं मिले हैं।

गौरतलब है कि मिशन 2024 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के खिलाफ एक राजनीतिक विकल्प खड़ा करने की कोशिशों में बनाए गए विपक्षी गठबंधन इंडिया शुरू से ही हिचकोले खाता नजर आया है। इस बीच विपक्षी गठबंधन की चौथी बैठक में कई दल नाराज दिखे जिसके बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि इंडिया गठबंधन चुनाव से पहले ही टूट सकता है।

19 दिसंबर को हुई विपक्षी दलों की बैठक में पीएम चेहरे को लेकर भी चर्चा हुई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने विपक्षी गठबंधन की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव दिया। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे ने कहा कि सबसे पहले जीतना अहम है बाकी चीजों पर बाद में फैसला किया जा सकता है। मैं वंचितों के लिए काम करता हूं। पहले जीतें, फिर देखेंगे। इस मीटिंग के बाद 28 दलों के नेताओं ने अपने विचार रखे जिसमें दलों के नेताओं की बैठक में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि इंडिया गठबंधन को कैसे आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ‘चाहे तमिलनाडु हो, केरल, तेलंगाना, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली या पंजाब, सीट बंटवारे संबंधी मुद्दों को सुलझा लिया जाएगा। मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि देशभर में 8 से 10 जनसभाएं होंगी।’

राजनीतिक पंडितों का कहना है कि दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक बेशक खत्म हो गई हो, लेकिन अभी भी कई ऐसे सवाल है जिन्हें चार बैठकों के बाद भी सुलझाया नहीं जा सका है। इन्हीं सवालों में से एक है कि इंडिया गठबंधन में नीतीश कुमार की भूमिका क्या होगी? जदयू के नेता भी लगातार दावा कर रहे थे कि नीतीश कुमार की भूमिका इंडिया गठबंधन में बड़ी होनी चाहिए। लेकिन जब बैठक खत्म हुई तो जदयू को सबसे ज्यादा निराशा हाथ लगी क्योंकि नीतीश कुमार की भूमिका को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार कई मुद्दों पर इंडिया गठबंधन के फैसले से नाराज हैं और उनकी नाराजगी के बीच 29 दिसंबर को होने जा रही जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक पर सबकी नजरें हैं।

बैठक में ये नेता रहे शामिल
दिल्ली के अशोका होटल में हुई इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पार्टी नेता राहुल गांधी और संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल, जनता दल (यू) से नीतीश कुमार और पार्टी अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, तृणमूल कांग्रेस से ममता बनर्जी और पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी, राष्ट्रीय जनता दल से लालू प्रसाद और तेजस्वी यादव, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार, सपा प्रमुख अखिलेश यादव तथा शिवसेना (यूबीटी) से उद्धव ठाकरे और आदित्य ठाकरे बैठक में शामिल थे।

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