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‘जीरो वेस्ट’ का बढ़ा चलन

दो वक्त की रोटी के लिए आदमी दिन-रात काम करता है। वह खून-पसीना बहाता है ताकि उसे और उसके परिवार को सिर्फ दो वक्त की रोटी मिल सके। लेकिन अब यह रोटी कुछ ही सालों में खत्म होने वाली है और दुनिया में खाने का ऐसा संकट आने वाला है कि इंसान के लिए 1 वक्त का भी खाना मुश्किल हो जाएगा, 2 वक्त की तो फिर बात ही छोड़ दें। हो सकता है कि करोड़ों रुपये दिए जाने के बाद भी कोई व्यक्ति खाना न खरीद पाए। एक तरह लोगों द्वारा शादियों पार्टियों में खाने की बर्बादी की जाती है वहीं दूसरी तरफ मौजूदा वक्त में देश में उत्पादित अनाज और फल सब्जियों का 40% हिस्सा थाली में पहुंचने से पहले ही नष्ट हो जाता है। भारत में भी धीरे-धीरे पश्चिमी देशों की तरह फल या सब्जी के एक हिस्से को खाने और बाकी को फेंक देने का चलन तेजी से बढ़ा है।

हम सभी जानते हैं कि चींटी जैसे छोटे-छोटे जीव भी बुरे वक्त के लिए एक-एक दाना इकट्ठा कर भोजन संग्रह करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ इंसान हैं कि हर दिन भोजन की बर्बादी करते रहते हैं। लेकिन अगर हम वर्तमान के संभावित खतरे को समझें तो हमें अभी से इसके लिए तैयार होना होगा और भोजन की बर्बादी बंद करनी होगी। रिपोर्ट के अनुसार आने वाले दिनों में स्थितियां भयावह हो सकती हैं।

अनाज और समुद्री भोजन दोनों की हो रही कमी 

 

यह ज्यादा पुराना समय नहीं है जब देश में चोकर वाली रोटी और आम की गुठली की सब्जी खाई जाती थी, लेकिन अब ये चीजें ‘फूड वेस्ट’ की श्रेणी में आ गई हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह स्थिति ज्यादा दिनों तक नहीं रहेगी। आने वाले समय में उन्नत मशीनों और रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से अधिक फसल उगाना पृथ्वी के लिए संभव नहीं होगा। धरती की अनाज पैदा करने की शक्ति और समुद्र की मछलियाँ दोनों ही कम होती जा रही हैं। ऐसे में थाली तक पहुंचने से पहले बर्बाद हो जाने वाला 40 फीसदी अनाज दुनिया का पेट भरने में मददगार साबित हो सकता है। यही कारण है कि इन दिनों दुनिया भर में उन चीजों को खाने का चलन बढ़ गया है, जिन्हें पिछले कुछ दशकों के दौरान ‘खाने लायक न समझ कर फेंक दिया जाता है। इसी क्रम में बीयर बनाने के बाद बचे हुए अनाज के आटे को समुद्री काई और छिलकों को खाद्य पदार्थ में बदलने की बात चल रही है।

मादक पेय बियर जौ और मक्का जैसे अनाजों से बनाई जाती है। बियर बनाने के बाद बचा हुआ ‘माल्टेड अनाज’ आमतौर पर फेंक दिया जाता है। अब अमेरिका और यूरोप की कुछ कंपनियां ऐसे बचे हुए अनाज से आटा बनाने लगी हैं। इस आटे से रोटी, केक, बिस्कुट और चिप्स जैसी चीजें बनाई जा रही हैं। आहार विशेषज्ञों की राय में बीयर के उपोत्पाद से बना आटा कई मायनों में अधिक बेनिफिशियल साबित हो सकता है। इसमें आटे का अधिकांश कार्बोहाइड्रेट बियर बनाने के दौरान निकल जाता है। बचा हुआ आटा प्रोटीन युक्त होता है। यही कारण है कि इस आटे को ‘सुपर आटा’ कहा जा रहा है। आलम यह है कि अब यह आटा पश्चिमी देशों में आम आटे से भी ऊंचे दाम पर बिक रहा है।

 

वर्तमान में अधिक देर तक गुठली चूसना भी दरिद्रता की निशानी माना लिया जाता है। लेकिन अब गुठली की सब्जी और गुठली के आटे की वापसी इस पीढ़ी को किसी बुरे सपने जैसी नहीं लगनी चाहिए। क्योंकि दुनिया भर में अनाज, सब्जियों, डेयरी उत्पादों और मांस की उत्पादकता बढ़ी तो है साथ ही इनकी बर्बादी भी बढ़ी है। लोग सब्जी का सबसे पसंदीदा हिस्सा खाते हैं और बाकी को फेंक देते हैं। आजकल अमीर माने जाने वाले पश्चिमी देशों में ‘चिकन ब्रेस्ट’ का कॉन्सेप्ट आ गया है। इसमें केवल चिकन ब्रेस्ट का मांस ही खाया जाता है। बाकियों को कम अच्छा समझा जाता है। इसी तरह मछली के चुनिंदा हिस्सों को खाकर बाकी को फेंक देने का चलन बढ़ गया है। दूसरी ओर, दुनिया भर की कई नदियाँ मछलियों से खत्म हो गई हैं।

UN की रिपोर्ट में खुलासा: वर्ष 2019 में दुनियाभर में व्यर्थ हुआ 93 करोड़ टन भोजन

 

हर हिस्सा खाने का बढ़ा चलन

 दुनियाभर में खाने की बढ़ती बर्बादी के बीच ‘जीरो वेस्ट रेस्टोरेंट’ भी खुलने लगे हैं। ये रेस्तरां बिना किसी बर्बादी के खाना पकाने का दावा करते हैं। ऐसे रेस्तरां शाकाहारी लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं के बीच विशेष रूप से लोकप्रिय हो रहे हैं। बेंगलुरु में ‘अराकू कॉफी’ रेस्तरां चलाने वाले राहुल शर्मा बचे हुए ब्रेड के टुकड़ों से पापड़ बनाते हैं। यहां आलू-प्याज के छिलके भी नहीं फेंके जाते। यहां हर खाने योग्य चीज से कोई न कोई व्यंजन बनाया जाता है। खाने की बर्बादी से बने स्वादिष्ट व्यंजन भी लोगों को खूब पसंद आते हैं। ऐसे रेस्तरां के बाहर बड़े गर्व से बताया जाता है कि यहां के व्यंजन खाने के कचरे से बनाए जाते हैं। मांस की बर्बादी को रोकने के लिए आजकल पश्चिमी देशों में ‘नोज़ टू टेल पॉलिसी’ चलन में है। इसका उद्देश्य जानवर के शरीर के अधिकतम हिस्से का उपयोग करना और मांस की बर्बादी को रोकना है।

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