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26 मई के बाद किसान आंदोलन को किस दिशा में ले जाएंगे टिकैत?

आज से करीब 15 दिन बाद किसान आंदोलन को पूरा आधा साल बीत जाएगा। यानी कि यह आंदोलन अपने 6 महीने पूरे कर लेगा। इस दौरान इस आंदोलन में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और दूसरी तरफ दिल्ली के लाल किला पर विवादास्पद झंडा फहराने तथा ट्रैक्टर रैली निकालने के साथ ही जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन हुए। दिल्ली बॉर्डर से निकलकर आंदोलन देश के कोने – कोने तक पहुंचा । यहां तक की पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी इस आंदोलन के प्रमुख नेता राकेश टिकैत ने अपनी दस्तक दी। आज बंगाल में भाजपा की हार के पीछे टिकेत किसान नेताओं की जीत बता रहे हैं।

इसी के साथ ही वह आगामी 26 मई के बाद आंदोलन को नई दिशा देने का संदेश भी दे रहे हैं। 2 दिन पहले प्रेस के सामने उन्होंने जो अपने तीखे तेवर दिखाए हैं उनसे लग रहा है कि इस बार किसान नेता आर या पार के मूड में है। अब तक दर्जनों बार सरकार से वार्ता करके परिणाम बेनतीजा ही रहे हैं। लेकिन अब हो सकता है कि किसान नेता अपनी नई रणनीति के तहत किसान आंदोलन को दूसरी तरफ मोड़ दें । 26 मई को आंदोलन की अर्धवार्षिकी के बाद यह मोड़ कैसा होगा यह देखना बाकी होगा।

दो दिन पूर्व भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि तीनों कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलनरत किसान 26 मई के बाद कोई बड़ा फैसला लेंगे। टिकैत ने दिल्ली के टिकरी बॉर्डर पर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि किसान आंदोलन को छह महीने पूरे होने वाले हैं लेकिन केन्द्र सरकार की ओर से कोई सकारात्मक पहल नहीं की गई है।

जब तक तीनों कृषि कानूनों को सरकार वापस नहीं लेगी, किसान आंदोलन जारी रहेगा। बकौल टिकेत किसानों ने यहां सर्दी देखी अभी गर्मी में तप रहे हैं बरसात देखेंगे और फिर सर्दी के लिये भी तैयार हैं। इससे लगता है कि किसान नेता अपने पूर्व घोषणा के अनुसार इस आंदोलन को नवंबर दिसंबर तक ले जाने के मूड में है।

इसी के साथ ही टिकेत केंद्र सरकार की घेराबंदी करना नहीं भूले। वह बोले कि केन्द्र सरकार को लेकर आम जनता सहित किसानों में गुस्सा है। इसका असर बंगाल चुनाव में भी दिखा । इसके साथ ही उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि अगर केन्द्र सरकार किसानों से बातचीत कर समाधान नहीं निकालेगी तो भाजपा को उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पराजय का सामना करना पड़ेगा।

गौरतलब है कि साढे पांच माह पहले दिल्ली के सिंघु और टिकरी बॉर्डर से किसानों का आंदोलन शुरू हुआ था। इसके बाद दिल्ली यूपी के गाजीपुर बॉर्डर से आंदोलन को बडा रूप दे दिया गया। कुल मिलाकर 26 नवंबर 2020 को शुरू हुआ यह आंदोलन अब अपनी ताप पर हैं। फिलहाल गाजीपुर बॉर्डर आंदोलन के प्रमुख केंद्र के रूप में है। जिसका नेतृत्व पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान नेता राकेश टिकैत कर रहे हैं।

पिछले साढे पांच माह के दौरान 40 किसान संगठनों के संयुक्त किसान मोर्चा के प्रतिनिधियों के साथ केंद्र सरकार की कम से कम 12 दौर की लंबी बातचीत हुई, लेकिन दोनों पक्षों में कृषि कानूनों को वापस लेने के मुद्दे पर बात रुक गई। 21 जनवरी को हुई आखिरी दौर की बातचीत हुई थी। जिसमें केंद्र सरकार ने तीन कानूनों को डेढ़ साल तक रोकने और विवाद सुलझाने के लिए संयुक्त समिति बनाने का प्रस्ताव दिया था। लेकिन 22 जनवरी को कानूनों को वापस लेने से कम कुछ भी नहीं कहकर किसान संगठनों से सरकार के प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

इस दौरान करीब 250 किसानों की मौत भी हो चुकी है। ज्यादातर लोगों की मौत सर्दी के मौसम में हार्ट अटैक की वजह से हुई है। किसान संगठन कृषि कानूनों को वापस लिए बिना अपने घर वापस लौटने के लिए तैयार नहीं है। दूसरी ओर सरकार ने बार-बार स्पष्ट कर दिया है कि अगर संशोधन चाहते हैं तो वह तैयार है, इसपर अमल भी वह डेढ़ साल तक रोक सकती है। लेकिन उसका दावा है कि ये कानून किसानों के हित में ही बनाए गए हैं, इसलिए वह किसी भी सूरत में इसे वापस नहीं ले सकती। एक बार तो ऐसा लगने लगा था कि आंदोलन खत्म होने ही वाला है लेकिन टिकैत के आंसुओं ने किसानों में जमकर जनसैलाब लाने को मजबूर कर दिया।

इन आंदोलनकारियों ने बारिश और ओले भी झेले हैं तो कड़ाके की ठंड का भी सामना किया है और अब तपती गर्मी को भी झेलते हुए आंदोलन को परिणाम तक ले जाने की भी तैयारी शुरू कर चुके हैं। वह भी ऐसे समय में जब कोरोना महामारी के बढते प्रकोप के चलते लोग अपने अपने घरों में कैद है।

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