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दक्षिण कोरिया में फैमेनिज्म के खिलाफ सड़कों पर उतरे पुरुष 

‘नारीवाद’ ये शब्द भारत में तो आपने कई बार सुना होगा। लेकिन अब दुनियाभर में ‘नारीवाद’ के इर्द-गिर्द अपनी राजनीति चमकाने वाले लोगों के विरोध में आवाजें उठने लगी हैं। हालिया दिनों में लिंग भेद को लेकर एक नए तरह के आंदोलन की हलचल होने लगी है। दक्षिण कोरिया की सड़कों पर काले कपड़ों में पुरुषों के एक समूह ने ‘आदमी से नफरत करने वालों, ये नारीवाद एक मानसिक बीमारी है’ का नारा लगाते हुए सियोल शहर की सड़कों पर बड़ी रैली निकाली। इस रैली के साथ ही सोशल मीडिया पर भी नारीवाद विरोधी भावनाएं तूल पकड़ने लगी। खुद को नारीवादी बताने वाले पुरुषों की इस रैली के जरिए आलोचना की गई विरोध में नारे बाजी की गई।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक दक्षिण कोरिया में नारीवाद विरोधी एक ऑनलाइन समूह के प्रमुख बे इन-क्यू का कहना है कि महिलाओं से हमें कोई परेशानी या घृणा नहीं है। हम उनसे स्नेह की भावना रखते हैं। लेकिन हम नारीवाद को एक सामाजिक बुराई के रूप में देखते हैं। बे इन-क्यू के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यू-ट्यूब पर करीब 5 लाख फॉलोअर्स हैं और लगातार बढ़ते जा रहे हैं। उनका मानना है कि नारीवाद के नाम पर अतिवाद इतना हो चुका है कि देश के पुरुष खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं। उन्होंने कुछ महीने पहले दक्षिण कोरिया में हुए एक सर्वे का हवाला देते हुए बताया कि 20 की उम्र वाले 79 फीसदी पुरुषों ने बताया है कि वे कभी न कभी लैंगिक भेदभाव का निशाना बने हैं। इस बात को लेकर उन सबमें गुस्सा पनप रहा है।

दुनियाभर में तेजी से फैला ऑनलाइन अभियान

दुनियाभर में नारीवाद के विरोध में खड़ा ये पुरुषों का समूह सोशल मीडिया के जरिए चर्चा का विषय बनता जा रहा है। नारीवाद का ढोंग करने वालों और उनके समर्थन में रैली करने वाले पुरुषों पर नया समूह  तंज कसता है और अपना गुस्सा जाहिर करता है। सामाजिक मनोविज्ञान के जानकारों के मुताबिक सियोल की सड़क पर ऐसे समूहों के विरोध को खारिज करना भले ही आसान माना जा रहा हो, लेकिन दक्षिण कोरिया में ऑनलाइन बढ़ रही नारीवाद विरोधी भावनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसके गंभीर सामाजिक परिणाम सामने आ सकते हैं। यह अभियान दुनिया के दूसरे देशों में भी फैलने से नहीं रोका जा सकता है।

दूसरी ओर एक बड़ा पुरुष वर्ग इस कथित नारीवाद विरोधी समूह के समर्थन में उभरता जा रहा है। इस वर्ग का मानना है कि नारीवादी के मुद्दे को समाज और राजनीति पर तेजी से थोपा जा रहा है। इसे रोकने और संतुलित करने की आवश्यकता है  समूह से जुड़े पुरुष एक्टिविस्ट्स ने हर उन तमाम जगहों को निशाना बनाने की कोशिश की है, जिनमें नारीवाद का मुद्दा नजर आता है। देश की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में दुराचार फैलने के खिलाफ लेक्चर देने वाली महिला एक्सपर्ट को बोलने से रोक दिया गया वहीं, टोक्यो ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाली एन सैन की बाल कटवाने पर आलोचना की गई।

राष्ट्रपति चुनाव तक अभियान

चर्चा है कि इस नए समूह का अगला कदम दक्षिण कोरिया के उन कारोबारियों को चेतावनी देने का है, जो नारीवादी तरीके से अपने प्रचार को चला रहे हैं।वहीं इनके एजेंडे में नारीवाद को बढ़ावा देने वाली नीतियों के लिए सरकार को भी आड़े हाथ लिए जाने की बात शामिल हैं। इस समूह ने आंदोलन चलाकर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों से वादे लिए हैं कि वे 20 साल पुराने देश के लैंगिक समानता और परिवार सुधार मंत्रालय में सुधार करेंगे। देश में इस साल ही राष्ट्रपति चुनाव हो सकते हैं।

भारत में भी पीड़ित पुरुष

भारत में पारिवारिक मसलों को सुलझाने के मकसद से चलाए जा रहे तमाम परामर्श केंद्रों की मानें तो घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायतों में करीब चालीस फीसदी शिकायतें पुरुषों से संबंधित होती हैं। इसका मतलब पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं और उत्पीड़न करने वाली महिलाएं होती हैं। आम तौर पर ऐसी शिकायतों का विश्वास नहीं किया जाता या सुनकर हंसी में उड़ा दिया जाता हैं। सामाजिक संरचनाओं की वजह से अमूमन ऐसी शिकायते बाहर भी नहीं आ पाती। सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन और माई नेशन नाम की गैर सरकारी संस्थाओं की एक स्टडी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत में नब्बे फीसदी से ज्यादा पति तीन साल के रिश्ते में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके होते हैं।

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NCRB के आंकड़े

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर एक-आध मिनट में एक पुरुष वैवाहिक या आर्थिक दबाव की वजह से आत्महत्या का सहारा लेता है। इसका कारण है कि समाज में पुरुषों का पालन पोषण इस तरह से किया गया है कि वो बलशाली है उन्हें किसी के सामने झुकना नहीं है, रोना नहीं हैं। वरना वह कमजोर माने जाएंगे। भारत के कई राज्यों में पीड़ित पुरुषों का संगठन हैं। इस तरह के संगठन दिल्ली के जंतर-मंतर पर आंदोलन और डॉक्यूमेंट्रीज बनाकर लोगों में जागरूकता लाने का प्रयास करते रहते हैं। इसलिए दक्षिण कोरिया में शुरू नारीवाद विरोधी अभियान के इन लोगों तक पहुंच होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है।

क्या है नारीवाद ?

नारीवाद या स्त्रीवाद राजनैतिक आंदोलनों, विचारधाराओं और सामाजिक आंदोलनों की एक श्रेणी है। इसके आंदोलनकारी दुनिया भर में राजनीतिक, आर्थिक, व्यक्तिगत, सामाजिक और लैंगिक समानता को परिभाषित करने, स्थापित करने और प्राप्त करने के एक लक्ष्य को साझा करते हैं। इसमें महिलाओं के लिए पुरुषों के समान शैक्षिक और पेशेवर अवसर स्थापित करना शामिल है। नारीवादी विमर्श संबंधी आदर्श का मूल कथ्य यही रहता है कि कानूनी अधिकारों का आधार लिंग न बने। लैंगिक भेदभाव की राजनीति और शक्ति संतुलन के सिद्धांतों पर असर की व्याख्या के साथ ही महिलाओं के समान अधिकारों पर जोर इसका सकारात्मक पक्ष है।

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