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इफ्तार दावत नहीं पाॅलिटिकल स्टंट

जिन राज्यों में चुनाव नजदीक होते हैं, या जिन राज्यों में सरकारों की हालत खराब है, वहां पर इफ्तार पार्टियों का आयोजन बड़े स्तर पर होता है। जहां चुनाव दूर हैं वहां कुछ खास आयोजन नहीं होते

रमजान का पाक महीना हो और राजनीतिक दलों में इफ्तार देने की होड़ न हो, ऐसा हो नहीं सकता। मगर यह रवायत अब थमती या कहें कुछ कम होती दिख रही है। वर्ष 2014 में देश के राजनीतिक शिखर पर नरेंद्र मोदी का पदार्पण, इस बदलाव का कारण माना जा सकता है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र ने अपनी छवि एक हिन्दुवादी नेता की गढ़ी है। परिणामस्वरूप इनके दूसरी तरफ के नेताओं की छवि मुस्लिम तुष्टिकरण के रूप में गहराती चली गई। ऐसे में सियासी भय ने इन नेताओं को इफ्तार से ही दूर कर दिया।

खासकर कांग्रेस अभी भी अपनी छवि को लेकर उधेड़बुन में है। उनके रणनीतिकार समझ नहीं पा रहे हैं कि अध्यक्ष राहुल गांधी को मंदिरों में भेजे या इफ्तार देने की सलाह दें। उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा की बड़ी जीत और सपा से गठबंधन के बावजूद कांग्रेस की बुरी हार ने उन्हें अपनी छवि नए ढंग से गढ़ने को मजबूर कर दिया। उसके बाद गुजरात के विधानसभा चुनाव में राहुल गांधी मंदिर-मंदिर जाने लगे। यही नहीं उनका जनेऊ वाला फोटो भी मीडिया के सामने लाया गया। गुजरात के बाद कर्नाटक में राहुल ने कई मठों का भ्रमण किया। यह कांग्रेस की बनती जा रही हिन्दू विरोधी इमेज को तोड़ने के लिए जरूरी माना गया।

बुधवार यानी 13 जून को कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चा ने नई दिल्ली ताज होटल में इफ्तार पार्टी दी। जिसमें 18 अलग-अलग पार्टियों को न्योता भेजा गया था। राजनीतिक टिप्पणीकार मानते हैं, ‘यह इफ्तार भी अगले साल होने वाले आम चुनाव को देखते हुए विपक्षी एकजुटता दर्शाने के लिए थी। नहीं तो कांग्रेस इस बार इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं करती।’ कांग्रेस ने अंतिम बार 2015 में इफ्तार पार्टी दी थी। तब सोनिया गांधी ने इसका नेतृत्व किया था। सोनिया गांधी इफ्तार देती रही हैं।

इफ्तार पार्टियां एक प्रकार का राजनीतिक उपकरण रही हैं। जिसमें मुस्लिम के कुछ अभिजात वर्ग के माध्यम से अल्पयंख्यक वोटरों को लुभाया जा सके। कांग्रेस के साथ मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करने वाले क्षेत्रीय दल इसकी अगुवाई करते रहे हैं। कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है, इसलिए वह कभी नहीं चाहेगी कि उस पर हिन्दू विरोधी पार्टी का ठप्पा लगे। इसलिए वह अपने में बदलाव कर रही है। अन्यथा पहले पार्टी आलाकमान के अलावा नेतागण भी इफ्तार पार्टी देते थे। जिसमें अब कमी आ गई है, पर क्षेत्रीय पार्टी को (जिनका मुस्लिम वोट बैंक हैं) इसकी चिंता नहीं है।

अखिलेश यादव की इफ्तार पार्टी

उत्तर प्रदेश में सपा, बिहार में राजद, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस आज भी इफ्तार दे रहे हैं। हालांकि इनके जोश-खरोश में अंतर जरूर देखा जा रहा है। इनकी इफ्तार अब उतनी सुर्खियां नहीं बटोरती, जितना कभी बटोरा करती थी। कुछ राजनीतिक टिप्पणीकार इसके दूसरे पहलू की ओर ध्यान दिलाते हैं। उनके मुताबिक, ‘जिन राज्यों में चुनाव नजदीक होते हैं, या जिन राज्यों में सरकारों की हालत खराब है, वहां पर इफ्तार पार्टियों का आयोजन बड़े स्तर पर होता है। जहां चुनाव दूर हैं वहां कुछ खास आयोजन नहीं होते।’ मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान ने इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था। इस साल के अंत में वहां चुनाव होने हैं।

भारतीय राजनीति में इफ्तार पार्टियों का खेल और महत्व क्या है, इसका एक और उदाहरण देखिए। 2015 में महागठबंधन बनाकर बिहार विधानसभा चुनाव फतह करने वाले नीतीश कुमार की नजर 2016 आते-आते राष्ट्रीय राजनीति पर अटक गई। तब उन्होंने उस साल पटना में नहीं बल्कि दिल्ली में 29 जून को इफ्तार पार्टी दी थी। जिसमें सोनिया गांधी और केजरीवाल समेत कई एनडीए विरोधी नेता शामिल हुए थे। जाहिर है उस वक्त नीतीश भी इफ्तार पार्टी के जरिए सियासी गोटियां बिठाना चाहते थे। एक बार फिर वे एनडीए के हिस्सा हैं तो इस बार की इफ्तार उन्होंने पटना में दी।

और तो और 2017 में उत्तरप्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए एआईएमआईएम के चीफ बैरिस्टर असुदउद्दीन ओवैसी 2016 में हैदराबाद से चलकर यूपी आ गए। उस वर्ष उन्होंने यूपी में इफ्तार की दावतें दी, जिसमें कई सपा नेता शामिल हुए थे।

वर्ष 2016 में नीतीश कुमार ने दिल्ली में दी थी इफ्तार पार्टी

दिल्ली के फतेहपुरी मस्जिद के शाही इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम अहमद कहते हैं, ‘सियासतदां अपने वोटों और समर्थकों और सियासी नफे-नुकसान को ध्यान में रखकर इफ्तार देते हैं। पहले बहुत से उलेमा ने फतवे भी दिए हैं कि राजनीतिक इफ्तार में नहीं जाना चाहिए। क्योंकि उनका मकसद सवाब कमाना नहीं होता है, बल्कि सियासी होता है।’

भाजपा और संघ सियासी दलों के इफ्तार पार्टी को मुस्लिमों का तुष्टीकरण माध्यम मानते रहे हैं। इसलिए 2014 के बाद से प्रधानमंत्री ने कोई इफ्तार नहीं दी है। इस बार राष्ट्रपति भवन में भी इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं किया गया। पर वहीं दूसरी ओर पिछले कुछ सालों से संघ से जुड़ा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बड़े पैमाने पर इफ्तार पार्टी आयोजित कर रहा है।

शाही इमाम मौलाना मुफ्ती मुकर्रम बताते हैं, ‘सारी राजनीतिक पार्टियों का एक ही मामला है। कोई भी पार्टी अलग नहीं है। इन सब पार्टियों के अपने-अपने एजेंडे होते हैं। ये उसी पर काम करते हैं और उसी हिसाब से इफ्तार देने या नहीं देने का फैसला करते हैं।

इफ्तार का इतिहास

राजनीति में इफ्तार देने की प्रथा पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने शुरू की। हालांकि, नेहरू ने इफ्तार पार्टियों को कभी भी एक आधिकारिक मुद्दा नहीं बनाया। वे अपने मुस्लिम दोस्तों को देश के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं बल्कि एक व्यक्तिगत नेता के रूप में निजी इफ्तार के लिए आमंत्रित किया करते थे। तब कांग्रेस कार्यालय 7, जंतर-मंतर में यह आयोजित होती थी।

नेहरू के देहांत के बाद सियासी इफ्तार पार्टियों की प्रकृति में काफी बदलाव आ गया। लाल बहादुर शास्त्री ने इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। बताया जाता है कि 1974 में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखकर लखनऊ में इफ्तार का आयोजन कर इसे राजनीति में पुनर्जीवित किया। इनके बाद इंदिरा गांधी ने इनके नुस्खे को इस्तेमाल किया।

इंदिरा गांधी प्रतिवर्ष दिल्ली में इफ्तार पार्टी देना शुरू की। 1977 में जनता पार्टी की सरकार में भी यह प्रथा चली। हालांकि बताया जाता है, मोरारजी देसाई इसमें शामिल नहीं हुए। इनके बाद राजीव गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने इस प्रथा को बनाए रखा। जिसे 2014 में मोदी ने फिर से तोड़ा है।

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