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इस अटल को कितना जानते हैं

मेरा अनुभव कहता है कि जनसंघ या भाजपा में वाजपेयी ने अपने प्रतिस्पर्धी को बहुत ही चतुराई से प्रतिस्पर्धा से बाहर किया। जो अटपटे सवाल उठाते थे, उनको भी बाहर किया। जब वे प्रधानमंत्री नहीं बने थे तब भी वे ऐसा करने में सफल हुए थे। 1968 में जब पं. दीनदयाल उपाध्याय की हत्या हुई तब यह सवाल आया था कि जनसंघ का नेतृत्व कौन करेगा। वाजपेयी के समान या कहें उनसे कई मामलों में क्षमतावान प्रोफेसर बलराज मधोक थे। प्रो. मधोक की दावेदारी भी थी। मगर कुछ दिनों तक ही यह ऊहापोह चला। अंततः वाजपेयी जनसंघ के अध्यक्ष बने
अटल बिहारी वाजपेयी मूलतः राजनी तिक प्राणी थे। उनकी जीवन यात्रा को गौर से देखें तो 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में वे शामिल हुए। जेल भी गए। आर्य समाज की युवक आर्य सभा और आरएसएस के संपर्क में वाजपेयी बचपन से थे। आर्य समाज और संघ के संपर्क में कब आए, इसका अलग- अलग अनुमान लगाया जाता है। श्रद्धांजलि सभा में चित्रपट पर उनकी जीवन यात्रा दिखाई जा रही थी। जिसमें लिखा था कि 1932 में वाजपेयी युवक आर्य सभा और आरएसएस के संपर्क में आए। दो लोगों बाबा साहेब खांडुलकर और नारायण टरकेत के कारण वाजपेयी संघ में आए। यदि यह सही है तो आठ साल की उम्र में ही उन्होंने शाखा में जाना शुरू कर दिया होगा। इतनी छोटी उम्र में उनका युवक आर्य सभा और संघ से जुड़ना दिखाता है कि वाजपेयी बचपन से ही सक्रिय थे।
सन् 1942 में नौ अगस्त के बाद पूरे देश में आग लगी हुई थी। उस दौरान बटेश्वर में हुए एक जुलूस में वाजपेयी भी शामिल हुए थे और पकड़े गए थे। उन्हें तब जेल हुई थी। इस पर भी बहुत दिनों तक विवाद चलता रहा। कई लोग कहते हैं कि वाजपेयी ने अंग्र्रेजों से माफी मांगी। 1999 में मैंने इस पर खूब रिसर्च की। उस दौरान के दस्तावेजों को खंगाला। अध्ययन किया। उसके बाद जनसत्ता में एक लेख लिखा। उस लेख की लाखों प्रतियां वाजपेयी के चुनाव क्षेत्र लखनऊ में उनके चुनाव प्रबंधकों ने बंटवाई। इसकी जानकारी मुझे और प्रभाष जोशी जी को लखनऊ दौरे पर मिली थी। उस लेख में मैंने प्रमाण सहित लिखा था कि अंग्रेजां से माफी मांगने का विवाद कैसे शुरू हुआ। शशिभूषण वाजपेयी कांग्रेस के नेता हुआ करते थे। वे कांग्रेस में वामपंथी विचार के लोगों में से एक थे। वे वाजपेयी नहीं सिर्फ शशिभूषण लिखते थे। 1971 में जब वाजपेयी जी ग्वालियर से चुनाव लड़ रहे थे तब शशि भूषण ने उन पर आरोप लगाया कि 1942 में अंग्रेजों से माफी मांगकर जेल से बाहर आए। वाजपेयी ने कुछ क्रांतिकारियों को भी पहचाना। मगर वास्तविकता यह नहीं थी। वे जेल गए। जब वे जेल में थे, उस समय वायसराय के काउंसिल मे केएस वाजपेयी एक शख्स हुआ करते थे। केएस वाजपेयी की उनके पिता से संभवतः दोस्ती थी। उन्हें जब पता चला तो उन्होंने  वायसराय एवं अन्य अंग्रेज अधिकारियों के सामने यह बात रखी कि वाजपेयी बलिग नहीं हैं। इसलिए इन्हें जेल में रखना ठीक नहीं होगा। वायसराय काउंसिल के केएस वाजपेयी ने उन्हें छुड़ाया। वे माफी मांगकर बाहर नहीं आए। मगर कुछ लोगों ने उनके खिलाफ अफवाह फैलाई।
मैं उन्हें एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में ही देखता हूं। कवि आदि तो उनका स्वभाव था। वे बचपन में ही राजनीति में आना चाहते थे। 1942 के आंदोलन में शामिल होना और जेल जाना भी इसी ओर इशारा करता है। 1948 के आस-पास वाजपेयी जी, देवेंद्र स्वरूप बनारस आ गए थे। वहां दोनों ‘चेतना’ नामक पत्रिका निकालते थे। उस समय वाजपेयी खुद से सवाल करते थे कि हमें राम कृष्ण मिशन में जाना है या पॉलिटिक्स में। यह बात देवेंद्र स्वरूप ने भी अपने संस्मरण में लिखी है। जब संघ से प्रतिबंध हटा तो संघ की मीटिंग में वाजपेयी जाते थे। वहां वे सवाल पूछवाते थे। उनके सवाल का अर्थ होता था कि हमें पॉलिटिक्ल पार्टी बनानी है, कब बनानी है।
5 जून 1973 में मैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में था। उस दिन परिषद के कुछ कार्यकताओं का ट्रेनिंग शिविर लगाया गया था। कैंप शुरू ही होने वाला था कि खबर आई कि संघ के सर संघचालक गुरू जी का निधन हो गया। उनके निधन के कारण मुझे वह शिविर स्थगित करना पड़ा। हम लोग सोच रहे थे कि क्या करें। नागपुर तुरंत पहुंच नहीं सकते थे। बहुत सोचने के बाद मैं और मेरे साथ कुछ और लोग झूंसी चले गए। इलाहाबाद के उस पार झूंसी है। वहां प्रभुदत्त ब्रह्मचारी रहते थे। वे ऊंचे संत और राजनीतिक व्यक्ति थे। 1952 में उन्होंने जनसंघ से जवाहर लाल नेहरू के खिलाफ चुनाव लड़ा था। मेरा उनसे थोड़ा मिलना-जुलना था। मैंने सोचा उन्हीं से मिलने चलते हैं। वहां जाने के मेरे दो आकर्षण थे। एक तो वहां खाना मिल जाता है। दूसरा, प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी से बातचीत हो जाती। हम लोग वहां गए। उनसे मुलाकात हुई। मैंने उन्हें कहा गुरू जी के बारे में आप अपने संस्मरण हम लोगों को बताएं। मैं पूछता गया। वे बताते गए। उस बातचीत में वाजपेयी और जनसंघ के बारे में एक बात जानी। यहां वह बतानी जरूरी लगती है। जो यह भी साबित करेगी कि वे राजनीतिक पुरूष थे। उन्होंने बताया, गुरू जी पॉलिटिक्ल पार्टी और दल की राजनीति के विरूद्ध थे। तो गुरू जी को कौन समझाए। वाजपेयी और दीनदायल उपाध्याय प्रभुदत्त ब्रह्मचारी के पास गए। उनसे कहा, ‘राजनीतिक दल बनाना बहुत जरूरी है।’ क्यों जरूरी है। इस पर दोनों ने अपना तर्क दिया और कहा कि आप गुरू जी को समझाएं। आपकी बात वे सुनेंगे। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी ने गुरूजी से बात की। कई और फैक्टर ने जनसंघ बनाने में काम किया होगा। मगर दो फैक्टर महत्वपूर्ण थे। एक तो श्यामा प्रसाद मुखर्जी कांग्रेस से बाहर आ गए थे। वे खुद एक पार्टी बनाना चाहते थे। मगर उनके पास संगठन नहीं था। डॉ मुखर्जी ने भी गुरू जी से बात की। दूसरी तरफ वाजपेयी, दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोगों ने भी अपने स्तर से प्रयास किया। जिसके बाद जनसंघ का निर्माण हुआ। अखबार निकालना, कविता आदि वाजपेयी जी का लक्ष्य नहीं था। उनका लक्ष्य राजनीति में आना था।
संगठन के भीतर या उसके दायरे में रहकर कोई काम करता है तो व्यक्तित्व का दायरा सीमित हो जाता है। जैसे ही आप लोगों के बीच जाते हैं। आप सीमित दायरे से मुक्त होते हैं। जनता के बीच जाना अपने आप में नए विश्वविद्यालय में दाखिला लेना होता है। लेनिन भी अपने लोगों को आवाम के बीच जाने को कहते हैं। वाजपेयी एक सीमित दायरे में रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे पब्लिक के आदमी थे। इसलिए 1952 में तो वे चुनाव नहीं जीते मगर 1957 में जीत गए। तब से लेकर 2004 तक लगभग लगातार संसद में रहे। दो बार राज्यसभा से रहे। नहीं तो हमेशा लोकसभा से जीतकर आते थे। उनके संसदीय जीवन में उनका विकास हुआ। उनके व्यक्तित्व के दो पहलू हैं। एक पहलू यह कि कुछ हद तक वे स्वतंत्र होकर सोचते थे। जिसमें संगठन की मर्यादा, संगठन की राजनीति से कई बार टकराव होता है। इसके कई उदाहरण हैं। मगर एक भी उदाहरण ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी दल के निर्णय की अवहेलना कर रहे हों। कहा जा सकता है कि यह उनके अंदर द्वैत जैसा था। शायद यही उनकी ताकत भी थी। इसी कारण से ज्यादातर दूसरे लोग मानते हैं कि वे जनसंघ या भाजपा के नेता नहीं थे, बल्कि सबसे घुलमिल जाने वाले व्यक्ति थे। श्रद्धांजलि सभा में भी पांच-छह लोगों ने यही बात कही।
मेरा अनुभव कहता है कि जनसंघ या भाजपा में वाजपेयी ने अपने प्रतिस्पर्धी को बहुत ही चतुराई से प्रतिस्पर्धा से बाहर किया। जो अटपटे सवाल उठाते थे, उनको भी बाहर किया। जब वे प्रधनमंत्री नहीं बने थे तब भी वे ऐसा करने में सफल हुए थे। 1968 में जब पं दीनदयाल उपाध्याय की हत्या हुई। तब यह सवाल आया था कि जनसंघ का नेतृत्व कौन करेगा। वाजपेयी के समान या कहें उनसे कई मामलों में क्षमतावान प्रोफेसर बलराज मधोक थे। प्रो ़ मधोक की दावेदारी भी थी। मगर कुछ दिनों तक ही यह ऊहापोह चला। अंततः वाजपेयी जनसंघ के अध्यक्ष बने।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी

अध्यक्ष बनने पर उनके खिलाफ संघर्ष तेज हुआ। मधोक ने हार नहीं मानी। वह संघर्ष 5 साल 1973 तक चला। 1973 में कानपुर में जनसंघ का अधिवेशन हुआ। उस अधिवेशन में वर्किंग कमिटी ने प्रो. मधोक के खिलाफ कार्यवाही की। मधोक के विपक्ष में अटल बिहारी वाजपेयी को लाल कृष्ण आडवाणी मिल गए थे। 1973 से लेकर हाल-हाल तक आडवाणी वाजपेयी के विश्वस्त सहयोगी बने रहे। 1973 के बाद दोनों के साथ रहने से पार्टी आगे बढ़ने लगी। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी, सुंदर सिंह भंडारी, नानाजी देशमुख, जेपी माथुर जनसंघ के राष्ट्रीय नेता थे। उनमें वाजपेयी ने आडवाणी को आगे लाकर उनसे तालमेल बिठाना शुरू किया। संघ की दोहरी सदस्यता के मामले पर जब जनता पार्टी टूट रही थी तब वाजपेयी उन लोगों में से थे जो जनता पार्टी के टूटने के खिलाफ थे। पार्टी जब टूटने के कगार पर पहुंच गई तो उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस में दो लेख लिखे। उसमें एकता की अपील की। वाजपेयी उस समय जनसंघ के लोगों के सामने खलनायक थे। मगर वाजपेयी की यह खूबी है कि निर्णय हो जाने के बाद वे उस निर्णय के बाहर नहीं जाते। जब पार्टी का टूटना तय हो गया (तय करने में सुंदर सिंह भंडारी, नानाजी देशमुख शायद थे।) उस दौरान हर नेता को भी तय करना था कि वे कहां रहेंगे। तब वाजपेयी ने पुराने साथियों के साथ ही रहना सही समझा। यह उनकी कार्यशैली थी। जब संकट खड़ा होता था तब वे मन की बात करते थे। लेकिन जब फैसला हो जाता था, तब वे फैसले के साथ हो जाते थे। ये कोई पहली बार नहीं हुआ था। कई बार हुआ। पार्टी का अध्यक्ष कौन बनेगा, इसमें उनकी दिलचस्पी रहती थी। जब कभी उनके मन के विपरीत कोई पार्टी अध्यक्ष बनता था। कुछ दिनों तक उनसे वाजपेयी नाराज रहते थे। कुछ दिनों बाद वे पुराने अंदाज में आ जाते थे। सिर्फ एक बार उन्होंने पार्टी अधिवेशन का बहिष्कार किया।

शायद वह अधिवेशन सन् 1965 या 66 का था। मगर यह पक्की बात है कि बछराज व्यास जब जनसंघ के अध्यक्ष बनाए गए तो वाजपेयी उनके खिलाफ थे। प्रोटेस्ट में वह अकेला अधिवेशन है, जिसमें वाजपेयी नहीं गए। अपनी नाराजगी प्रकट की। न केवल नाराजगी प्रकट की बल्कि बछराज व्यास को जाना पड़ा। उन्होंने अपना कार्यकाल तो पूरा किया मगर जनसंघ की राजनीति में आगे नहीं बढ़ पाए। मतलब जब कोई कभी कुछ थोपने जैसी बात होती थी तो वाजपेयी उसके खिलाफ हो जाते थे।
वाजपेयी ने जनता पार्टी के कांट्युनिटी में भारतीय जनता पार्टी को मजबूत करने पर काम किया। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी  में गांधियन समाजवाद का नारा दिया। भारतीय जनता पार्टी में जाने वाले ज्यादातर उनके करीबी थे। अन्य दलों से भी वे नेता भाजपा में लाए। कांग्रेस संगठन से वे सिंकदर बख्त को लाए। सिंकदर बख्त कांग्रेस संगठन के प्रतिनिधि के रूप में जनता पार्टी में आए थे। उनकी वाजपेयी से मित्रता हो गई थी। जब भाजपा बनी तो वाजपेयी सिंकदर बख्त को अपने साथ ले आए। एमसी छावला राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे। फिर भी उन्हें भाजपा में लाए। उसी तरह केरल के एक शिक्षाविद्, जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति रहे बी जार्ज को भी वे भाजपा के मंच पर लाए।
वाजपेयी खिलाड़ी आदमी भी थे। उन्होंने जब गांधियन समाजवाद का नारा दिया तो लोगों के मन में उत्सुकता पैदा हुई। एक दिन मैं दिल्ली आया तो अपने दो-चार मित्रों के साथ संसद गया। मित्रों में जनार्दन ठाकर, देवदत्त, दीनानाथ मिश्र, रजत शर्मा थे। जब हम सब लोग संसद पहुंचे। वहां पत्रकारों ने वाजपेयी से सेंट्रल हॉल में सवाल पूछना शुरू किया। पत्रकारों ने बड़े आदर और उत्सुकता से पूछा कि जरा गांधियन समाजवाद के बारे में बताएं। इस पर वाजपेयी जी ने जवाब दिया कि आप लोगों ने कुछ ज्यादा ही पढ़ लिया है। इससे ज्यादा कुछ नहीं कहा। यह कहकर वे जोर से हंसे। कुछ दिनों बाद लोग समझ गए कि गांधियन समाजवाद वाजपेयी जी का कोई दर्शन नहीं है, बल्कि यह केवल एक नारा है। परिस्थितियां भी ऐसी बनी की किसी को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था। न बीजेपी के लोगों को, न बीजेपी से बाहर के लोगों को। उन्होंने एक नई बात कह दी थी। सर्वोदय के लोग भी उत्सुकतावश उनसे मिलने गए। वे भी जब वहां से निकलते तो उनका भी उत्साह ठंडा था। गांधियन समाजवाद कुछ दिनों तक नारे के तौर पर चलता रहा।
1984-85 के चुनाव ने यह बता दिया था कि बीजेपी को अपने बारे में कुछ सोचना पड़ेगा। उन दिनों बीजेपी की ताकत बहुत कम हो गई थी। संगठन के तौर पर ताकत रही होगी मगर संसद और विधानसभा में ताकत बहुत घट गई थी। उन्हीं दिनों आगरा में बीजेपी ने गांधियन समाजवाद को त्याग दिया। संभवतः 1987 के बाद लाल कृष्ण आडवाणी अध्यक्ष बने। तब बीजेपी जनसंघ के रास्ते पर धीरे-धीरे चलने लगी। 1986-87 के करीब भी बीजेपी एकदम कमजोर थी। विपक्ष में उसका कोई स्थान नहीं था। बोफोर्स मामले में भी बीजेपी कहीं नहीं थी। उस वक्त, देवीलाल, बीपी सिंह, सुरजीत सिंह वामपंथी नेता ही विपक्ष के चेहरा हुआ करते थे। लेकिन उस वक्त भी वाजपेयी नेता के रूप में लोकप्रिय थे। मतलब बीजेपी कमजोर भले ही रही हो मगर वाजपेयी मजबूत थे।
कुछ लोग जनसंघ से बलराज मधोक को निकालने और गोविंदाचार्य  को भाजपा छोड़ने की घटना को एक जैसा मानते हैं। मगर ऐसा नहीं है। मधोक जी अपने कार्यों के कारण जनसंघ से निकाले गए। उन्होंने वाजपेयी को अध्यक्ष बनाए जाने का विरोध किया। न केवल विरोध किया, बल्कि पार्टी के बाहर गलत शब्दों का प्रयोग भी करते रहे उन्हें लग रहा था कि नानाभाई देशमुख ने वाजपेयी को अध्यक्ष बनाया। मगर ऐसा नहीं था। अध्यक्ष को लेकर जब प्रतिद्वंदिता थी तो उस वक्त संघ के बाबा साहेब देवरस सह कार्यवाहक थे। भाजपा के वे प्रभारी भी थे। खुद बाबा साहेब देवरस दिल्ली आए। उन्होंने जनसंघ के लोगों को बुलाया और कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी जन संघ के अध्यक्ष होंगे। यह बात प्रो. बलराज मधोक को मालूम नहीं थी। जब प्रो ़ मधोक को मालूम हुआ तो उन्होंने बाबा साहेब देवरस, नानाभाई देशमुख सबके खिलाफ अभियान चला दिया। उस अभियान में उन्होंने यहां तक कहा कि दीनदयाल उपध्याय की हत्या नानाभाई देखमुख और वाजपेयी ने करवाई। यह बात उन्होंने अपनी जीवनी तक में लिख दी। जबकि इसमें सच्चाई नहीं थी।
गोविंदाचार्य का मामला अलग है। बीजेपी में गोविंदाचार्य आए तो पार्टी का उद्धार हुआ। नहीं तो बीजेपी की हालात बहुत खराब थी। जब पार्टी बढ़ने लगी तो फिर से नेतृत्व का सवाल उठा। हालांकि वाजपेयी चेहरा थे। गोविंदाचार्य जितना कोई नेता पार्टी में सक्रिय नहीं था। वे दिन-रात काम करते थे। उन्हें लोकसभा, राज्यसभा जाना नहीं था। उनकी स्वीकार्यता बीजेपी से बाहर भी बहुत थी। वह उस समय थी जब बीजेपी को कोई छूना भी नहीं चाहता था। वीपी सिंह का भाजपा से कोई संबंध नहीं था, पर गोविंदाचार्य का संबंध उनसे मजबूत था। उनके संबंधों के कारण ही 1989 के चुनाव में जनता दल और भाजपा का तालमेल हुआ। गोविंदाचार्य के बगैर वह तालमेल संभव ही नहीं था। तब पहली बार भाजपा संसद में 86 सीट लाई।
गोविंदाचार्य बीजेपी में लगातार काम करते रहे। 1991 के चुनाव में जब सब लोग मान रहे थे कि भाजपा 40-42 पर सिमट जाएगी। यहां तक कि वाजपेयी भी यही मानते थे। तब पार्टी 120 पर पहुंची। जैसे-जैसे पार्टी मजबूत होती गई, उनके नेतृत्व को लेकर प्रश्न पार्टी के अंदर उठते थे। गोविंदाचार्य आडवाणी के साथ थे। वह उनको नेता बनाना चाहते थे। पर पब्लिक के सामने वाजपेयी चेहरा थे। जब वाजपेयी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने दो नेताओं को साइड लाइन किया। एक कुशा भाई ठाकरे। उनको हटाकर बंगारू लक्ष्मण को अध्यक्ष बनाया गया। बंगारू लक्ष्मण की वर्किंग कमिटी को गोविंदाचार्य ने बनाया था। एक दिन मैं गोविंदाचार्य के साथ बैठा था। तब बंगारू लक्ष्मण आए। उन्होंने कहा वाजपेयी जी के पास जाना है। वर्किंग कमिटी की लिस्ट दे दीजिए। उन्होंने दे दी। वे और कुशा भाई ठाकरे वाजपेयी के पास गए। वाजपेयी जी ने लिस्ट देखी तो सब कुछ ठीक था। मगर गोविंदाचार्य प्रधान महासचिव या जो भी पद उन्हें था, उसे देखकर उन्होंने कहा आप लोग आडवाणी जी के पास जाइए और उनसे कहिए संघ से बात करें और इन्हें संघ में वापस लें। उस वक्त गोविंदाचार्य के साथ बीजेपी भी थी, संघ भी था और अन्य लोग भी। तब संघ ने कहा था कि गोविंदाचार्य बीजेपी में रहेंगे। आपको उनका जो करना है करें। वाजपेयी के हस्तक्षेप के बाद गोविंदाचार्य को वर्किंग कमेटी में लिया गया। यह उनका अपमान था। सुनते हैं, गोविंदाचार्य ने ही रास्ता निकाला। वे अध्ययन अवकाश पर चले गए। वाजपेयी के अंतिम संस्कार और श्रद्धांजलि सभा दोनों जगह गोविंदाचार्य पहुंचे थे। यही वाजेपयी की खूबी थी।
(गुंजन कुमार से बातचीत पर आधारित)

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