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आलोचकों की नजर से ओझल रहे हिमांशु

हिंदी के मशहूर कथाकार हिमांशु जोशी के निधन से हिंदी साहित्य में एक ऐसा खालीपन आया है जो शायद लंबे समय तक भरा नहीं जा सकेगा। वे प्रेम, संघर्ष और मानवीय संवेदना के कथाकार थे जिनकी कथा भूमि के केंद्र में मार्मिकता थी। विस्थापन, परिवार, शोषण, स्नेह से रंगी उनकी रचनाएं यथार्थ की वर्णमाला रचती हैं।
उत्तराखण्ड में अल्मोड़ा जिले के स्यूडा गांव में 4 मई 1938 को जन्मे हिमांशु जोशी ने 21 साल की उम्र में हिंदी पत्रकारिता में पदार्पण किया। उस दौर के कई पत्रकारों की तरह इनके भीतर भी साहित्य का वायरस था और वह लेखक बनना चाहते थे। महात्मा गांधी की हत्या पर महज 13-14 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी थी। वह लंबे समय तक साप्ताहिक हिन्दुस्तान पत्रिका से जुड़े रहे। इसी पत्रिका में इनके कई मशहूर उपन्यास धारावाहिक रूप में प्रकाशित होते रहे थे। इन्होंने इसके अलावा आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए भी काम किया।
हिमांशु जोशी के 17 कहानी संग्रह, 8 उपन्यास, 2 यात्रा वृतांत, तीन काव्य संग्रह, संस्मरण समेत करीब 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके प्रमुख उपन्यास हैं- छाया मत छूना मन, समय साक्षी है, तुम्हारे लिए, कगार की आग, सुराज। सुराज, उपन्यास पर फिल्म बनी। तुम्हारे लिए को आधार बनाकर दूरदर्शन ने धारावाहिक बनाया।
जोशी ने शरत चंद के उपन्यास चरित्रहीन पर आधारित रेडियो धारावाहिक का निर्देशन किया। विपुल साहित्य रचने के बाद हिमांशु जोशी हिंदी साहित्य के आलोचकों की नजरों से ओझल रहे। उनके कथा साहित्य का सही ढंग से मूल्यांकन नहीं हो पाया। इस बात का मलाल खुद हिमांशु जोशी को भी था। लेकिन अपने इस दुख को कभी वह सार्वजनिक रूप से अभिव्यक्त नहीं करते थे। उन पर शायद ही किसी शीर्ष आलोचक ने कलम चलाई। जबकि उनकी कहानियों उपन्यास के अनुवाद अंग्रेजी, नेपाली, वर्मा, चीनी, जापानी, इटेलियान, कोरियाई, नौर्वेजियान, चैक भाषाओं में भी हुए। लंबे समय तक वह नॉर्वे से प्रकाशित पत्रिका ‘शांतिदूत’ के विशेष सलाहकार भी रहे।

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