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हाईकोर्ट ने UP सरकार को एक सप्ताह में दो बार लगाई फटकार, बताया ग्रामीण चिकित्सा व्यवस्था राम भरोसे

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 6 दिन में उत्तर प्रदेश सरकार को दूसरी फटकार लगाई है। जिसमें हाई कोर्ट इलाहाबाद ने गांवो में फैल रहे कोरोना का नियंत्रण करने में राज्य सरकार को विफल बताया है। साथ ही सरकार से न्यायालय ने इस पर चिंता जाहिर की है। गत 11 मई को भी हाईकोर्ट ने इस मामले पर उत्तर प्रदेश सरकार से सख्त लहजे में कहा था कि वह गांव में कोरोना नियंत्रण हेतु सभी जिलों में एक कमेटी बनाएं जो कोरोना पर कंट्रोल करने के लिए जमीनी स्तर पर काम कर सके। इसके बाद एक बार फिर हाईकोर्ट में ने उत्तर प्रदेश सरकार को कोरोना मामले में लापरवाह बताते हुए कहा है कि गांव में चिकित्सा व्यवस्था राम भरोसे हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के गांवों और कस्बे में कोरोना संक्रमण फैलने और चिकित्सा सुविधाओं की कमी को लेकर चिंता जाहिर की है। कोर्ट ने कहा है कि जिस तरह से चिकित्सा व्यवस्था है, उसमें कहा जा सकता है कि लोगों का स्वास्थ्य भगवान भरोसे है। कोर्ट ने कहा है कि यदि संक्रमण का पता लगाकर इलाज करने में हम विफल रहे तो हम तीसरी लहर को निश्चित ही आमंत्रण दे रहे हैं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज सिद्धार्थ वर्मा और अजित कुमार ने एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि गांवों कस्बों में बहुत, कम टेस्टिंग की जा रही है। इसके मद्देनजर टेस्टिंग बढ़ाई जाए और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करायी जाए।

याचिका में मेरठ मेडिकल कॉलेज से 64 वर्षीय संतोष कुमार के लापता होने के मामले में दाखिल की गई रिपोर्ट में बताया गया कि मरीज को भर्ती किया गया था। लेकिन उसकी पहचान नहीं हो सकी थी। वह बाथरूम में गए और वहां बेहोश हो गए। वहां से उन्हें स्ट्रेचर पर लाया गया। काफी प्रयास के बावजूद भी उनको बचाया नहीं जा सका और लावारिश शव का दाह संस्कार कर दिया गया। इसे न्यायालय ने घोर लापरवाही माना है। इस पर न्यायालय ने अपर मुख्य सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य को इस संबंध में कड़ी कार्रवाई का निर्देश देते हुए हलफनामा मांगा है।

इसी के साथ न्यायालय ने बिजनौर जिले की आबादी और वहां के अस्पतालों की स्थिति का उदाहरण लेते हुए कहा है कि जो भी सुविधा है वह नाकाफी है। 32 लाख की आबादी पर 10 हॉस्पिटल है ।लोगों को चिकित्सा सुविधा बमुश्किल मिल पा रही है। अभी तक सरकार ने 1200 सौ टेस्ट प्रतिदिन किए हैं जो बहुत ही कम है। 32 लाख की आबादी पर कम से कम चार या पांच हजार टेस्ट प्रतिदिन होना चाहिए। यही नहीं बल्कि न्यायालय ने कहा है कि बिजनौर बहराइच बाराबंकी श्रावस्ती जौनपुर मैनपुरी मऊ अलीगढ़ एटा इटावा फिरोजाबाद व देवरिया के जिला जज नोडल अधिकारी नियुक्त करें और सभी नोडल अधिकारी अपनी रिपोर्ट पेश करें। अदालत ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य को सेंट्रलाइज मॉनिटरिंग सिस्टम में कोविड व आइसीयू वार्डों का 22 मई को ब्यौरा पेश करने का निर्देश दिया है।

गौरतलब है कि 11 मई को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रसार और रोकथाम के उचित इंतजाम ना होने का पर चिंता जताई थी। हाईकोर्ट ने कोरोना की रोकथाम के लिए योगी सरकार को सभी जिलों में तीन सदस्यीय कमेटी गठित करने का आदेश दिया था।

इस कमेटी में सीजेएम रैंक के ज्यूडिशियल ऑफिसर, मेडिकल कॉलेज या किसी बड़े सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और एडीएम रैंक का कोई अफसर नामित किया जाएगा। तीन सदस्यों की यह कमेटी ग्रामीण इलाकों में कोरोना के बढ़ते संक्रमण की निगरानी करेगी। शिकायतों को दूर करेगी और स्थानीय प्रशासन व सरकार को अपने सुझाव देगी। इस संबंध में हाईकोर्ट ने सरकार से दो दिनों के अंदर कमेटी बनाने को कहा था।

इसी के साथ हाईकोर्ट ने दवा व सही इलाज ना मिलने की शिकायतों को दूर करने के लिए भी कमेटी गठित करने का आदेश दिया था। साथ ही कोर्ट ने सरकार से ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं और टेस्टिंग का ब्योरा भी तलब किया था। न्यायालय ने कहा था कि ग्रामीण इलाकों की पीएचसी और सीएचसी में अब भी कोरोना का इलाज की व्यवस्था नहीं है। इलाज के अभाव में लोगों की मौतें हो रही हैं। ग्रामीण इलाकों में पीड़ित लोग सीधे एसडीएम से शिकायत कर सकते हैं। एसडीएम इन शिकायतों को खुद दूर करेंगे या शिकायत समिति को भेजेंगे।

लेकिन देखने में आ रहा है कि ऐसा नहीं हो रहा है। कल ही एक आडियो वायरल हुआ है । जिसमें दादरी के भाजपा विधायक तेजपाल नागर यह कहते हुए सुने जा रहे हैं कि वह कोरोना मामले में एक मरीज को ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध करवाने के लिए एसडीएम से फोन कर रहे हैं। लेकिन एसडीएम फोन नहीं उठा रहे हैं। जब भाजपा के विधायकों के फोन नहीं उठाए जा रहे हैं तो आम आदमी के साथ क्या न्याय हो रहा होगा यह सोचने वाली बात है?

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